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भारत में शपथ की शुरुआत कैसे हुई? क्या ईस्ट इंडिया कंपनी ने लाई थी शपथ प्रथा? जानें पूरा इतिहास

General Knowledge: आजादी के बाद से हर नेता मंत्री या अफसर बनते ही संविधान की शपथ लेता है। लेकिन क्या आपको पता है कि भारत में शपथ लेने की यह परंपरा कहां से शुरू हुई? क्या यह प्रथा अंग्रेजों की देन है? या हमारे देश में पहले से ही शपथ का चलन था? आज हम बहुत आसान भाषा में बताएंगे कि भारत में शपथ की शुरुआत कब और कैसे हुई। यह बात हर भारतीय को जाननी चाहिए।

General Knowledge: प्राचीन भारत में भी होती थी शपथ, वेद-पुराण में मिलते सबूत

भारत में शपथ कोई नई चीज नहीं है। हजारों साल पहले वेदों और पुराणों में शपथ का जिक्र मिलता है। रामायण में भरत ने राम के चरण पादुका पर हाथ रखकर शपथ ली थी कि वे 14 साल तक सिर्फ खड़ाऊं रखकर राज करेंगे। महाभारत में भीम ने दुर्योधन को शपथ ली थी कि वे उसकी जांघ तोड़ेंगे। ऋग्वेद में सूर्य, अग्नि और वरुण देवता को साक्षी मानकर शपथ लेने का उल्लेख है। राजा बनते समय या युद्ध से पहले सैनिक अग्नि के सामने शपथ लेते थे। मतलब हमारे देश में सच बोलने और वचन निभाने की शपथ बहुत पुरानी है।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने शुरू की लिखित शपथ, 1726 से चला आ रहा नियम

जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में आई तो उसने अपने कर्मचारियों के लिए लिखित शपथ शुरू की। साल 1726 में कंपनी ने पहला नियम बनाया कि हर नया अफसर कंपनी के प्रति वफादारी की शपथ लेगा। यह शपथ अंग्रेजी में होती थी और बाइबिल पर हाथ रखकर ली जाती थी। हिंदू और मुस्लिम अफसरों के लिए गीता या कुरान पर शपथ का विकल्प था। 1833 में चार्टर एक्ट आया तो कंपनी के हर बड़े अफसर को लिखित शपथ लेनी पड़ती थी। यही से भारत में आधिकारिक शपथ की शुरुआत मानी जाती है। अंग्रेजों ने इसे इसलिए शुरू किया ताकि कोई अफसर बेईमानी न कर सके।

आजादी के बाद संविधान ने दी नई शपथ, अब देश पहले और धर्म बाद में

26 जनवरी 1950 को जब हमारा संविधान लागू हुआ तो शपथ को नया रूप दिया गया। अब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, जज, अफसर सब भारत के संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं। तीसरी अनुसूची में शपथ का पूरा फॉर्मेट लिखा है। अब बाइबिल या गीता पर शपथ जरूरी नहीं। सिर्फ “मैं शपथ लेता हूं” या “सत्यनिष्ठा से कहता हूं” बोलना काफी है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब पहले देश की शपथ आती है, धर्म की नहीं। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे इसलिए रखा ताकि हर धर्म और जाति का व्यक्ति बिना दबाव के शपथ ले सके।

आज भी संसद में नए सांसद शपथ लेते हैं तो पूरा देश देखता है। यह परंपरा हमारी पुरानी संस्कृति और आधुनिक संविधान का सुंदर मेल है। शपथ सिर्फ शब्द नहीं, देश के प्रति वचन है। अगली बार जब कोई नेता शपथ ले तो याद रखिए, यह परंपरा न अंग्रेजों की देन है और न सिर्फ आज की। यह हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है जिसे संविधान ने और मजबूत किया।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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