Jharkhand HC Order: झारखंड में जले हुए मरीजों को अब तक जो इलाज मिलता था वह न सिर्फ अपर्याप्त था बल्कि कई बार जानलेवा भी साबित होता था। राज्य के अधिकांश जिला अस्पतालों में बर्न यूनिट या तो थी ही नहीं या फिर सिर्फ कागजों पर थी। इसी समस्या को लेकर ओंकार विश्वकर्मा नाम के एक व्यक्ति ने झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि राज्य के सभी सदर अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में आधुनिक सुविधाओं से लैस बर्न यूनिट शुरू की जाए। 26 मार्च को इस मामले की सुनवाई पूरी हुई और कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब वह फैसला सामने आ गया है और यह झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा, साफ और सख्त आदेश
चीफ जस्टिस एम एस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने इस मामले में बेहद स्पष्ट और सख्त आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ अस्पताल की इमारत खड़ी कर देना काफी नहीं है। जब तक वहाँ जरूरी मशीनें, प्रशिक्षित डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ न हों तब तक उस यूनिट का कोई मतलब नहीं है।
कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश की तारीख से 120 दिनों के भीतर राज्य के सभी जिला अस्पतालों और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बर्न यूनिट पूरी तरह से चालू करने का निर्देश दिया। यह यूनिट सिर्फ नाम के लिए नहीं बल्कि पूरी सुविधाओं के साथ काम करने वाली होनी चाहिए।
जीवन का अधिकार, कोर्ट ने दी व्यापक व्याख्या

इस फैसले में हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन के अधिकार की एक बहुत जरूरी व्याख्या भी की। कोर्ट ने कहा कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है। इसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार और समय पर सही इलाज पाने का अधिकार भी शामिल है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी नागरिक को समय पर सही इलाज नहीं मिलता तो यह उसके मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। यह टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह साफ होता है कि स्वास्थ्य सेवा देना सरकार की जिम्मेदारी है न कि कोई एहसान।
बर्न इंजरी, एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या
खंडपीठ ने अपने फैसले में यह भी माना कि भारत में जलने की चोट यानी बर्न इंजरी एक बहुत गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है। हर साल देश में हजारों लोगों की मौत जलने की वजह से होती है और लाखों लोग स्थायी रूप से विकलांग हो जाते हैं।
कोर्ट ने खासतौर पर महिलाओं का जिक्र किया और कहा कि उनमें इस तरह की घटनाओं का खतरा सबसे ज्यादा होता है। घरेलू हिंसा, रसोई में दुर्घटना या अन्य कारणों से महिलाएं सबसे अधिक इस समस्या की शिकार बनती हैं। ऐसे में राज्य की जिम्मेदारी है कि वह उनके लिए बेहतर इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करे।
अलग बर्न यूनिट क्यों जरूरी, कोर्ट ने समझाया कारण
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि जले हुए मरीजों का इलाज सामान्य वार्ड में नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे मरीजों के लिए अलग और सुरक्षित बर्न यूनिट होना बेहद जरूरी है। इसकी मुख्य वजह यह है कि जले हुए मरीजों को संक्रमण का खतरा बहुत ज्यादा होता है और सामान्य वार्ड में इस खतरे को काबू में रखना मुश्किल होता है।
कोर्ट ने कहा कि बर्न यूनिट में 24 घंटे इलाज की सुविधा और इमरजेंसी सेवा हर हाल में उपलब्ध होनी चाहिए। दवाओं और जरूरी चिकित्सा सामग्री की कमी किसी भी हालत में स्वीकार नहीं की जाएगी।
90 दिनों में होगा स्टाफ का प्रशिक्षण
बर्न यूनिट बनाना काफी नहीं है। उसमें काम करने वाले डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को भी खास प्रशिक्षण की जरूरत होती है क्योंकि जले हुए मरीजों का इलाज बहुत अलग और जटिल होता है। इसे ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 90 दिनों के भीतर सभी संबंधित डॉक्टरों और स्टाफ के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरा करने का निर्देश दिया है।
यह कदम बेहद जरूरी है क्योंकि अगर प्रशिक्षित स्टाफ न हो तो यूनिट बनाने का कोई फायदा नहीं होगा। कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि इलाज की गुणवत्ता से कोई समझौता न हो।
निगरानी के लिए बनेगी राज्य स्तरीय कमेटी
हाईकोर्ट को पता है कि सिर्फ आदेश देने से काम नहीं चलता। इसीलिए कोर्ट ने एक राज्य स्तरीय मॉनिटरिंग कमेटी बनाने का भी आदेश दिया है। यह कमेटी हर तीन महीने में समीक्षा करेगी कि आदेश का पालन हो रहा है या नहीं।
झारखंड के डायरेक्टर इन चीफ हेल्थ सर्विसेज को इस पूरी व्यवस्था का नोडल अधिकारी बनाया गया है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी जिले में बर्न यूनिट सही तरीके से काम नहीं कर रही तो इसकी सीधी जिम्मेदारी उन पर होगी। इस तरह की जवाबदेही तय होना बहुत जरूरी है ताकि आदेश सिर्फ कागजों पर न रहे।
बजट और संसाधन, सरकार को देना होगा हिसाब
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया है कि बर्न यूनिट के लिए पर्याप्त बजट और प्रशासनिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। कोर्ट ने साफ कहा कि यह सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है और इसमें किसी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अब सरकार को यह बताना होगा कि किस जिले में कितनी राशि खर्च हो रही है, कितने स्टाफ की नियुक्ति हुई और कब तक यूनिट पूरी तरह काम करने लगेगी। यह पारदर्शिता न सिर्फ कोर्ट के लिए बल्कि आम जनता के लिए भी जरूरी है।
पीड़ितों को मिलेगा मुआवजा, DLSA करेगा मदद
इस फैसले में एक और अहम बात यह है कि हाईकोर्ट ने बर्न पीड़ितों को मुआवजा दिलाने की भी व्यवस्था की है। खंडपीठ ने कहा कि पीड़ित या उनके परिवार के सदस्य मुआवजे के लिए आवेदन कर सकते हैं और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण यानी DLSA उनकी इस प्रक्रिया में मदद करेगा।
यह कदम उन परिवारों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो इलाज के खर्च और नुकसान की वजह से आर्थिक तंगी में फंस जाते हैं। अब उन्हें न्याय पाने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा।
झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था, एक बड़ी चुनौती
झारखंड एक ऐसा राज्य है जहाँ आदिवासी और ग्रामीण आबादी बहुत ज्यादा है। दूर-दराज के इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से ही बहुत कम हैं। ऊपर से बर्न यूनिट जैसी खास सुविधा का न होना मतलब है कि जलने की गंभीर घटना में मरीज को या तो रांची रेफर किया जाता है या फिर वह बिना सही इलाज के तड़पता रहता है।
इस आदेश से यह उम्मीद है कि अब हर जिले में मरीज को शुरुआती और सही इलाज मिल सकेगा। समय पर सही इलाज मिलने से न सिर्फ जानें बचेंगी बल्कि स्थायी विकलांगता के मामले भी कम होंगे।
निष्कर्ष
झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकता है। 120 दिनों में बर्न यूनिट, 90 दिनों में स्टाफ प्रशिक्षण, मॉनिटरिंग कमेटी और पीड़ितों को मुआवजा, यह सब मिलकर एक मजबूत ढांचा तैयार करते हैं। अब असली परीक्षा सरकार की है कि वह इस आदेश को जमीन पर कितनी ईमानदारी से उतारती है। अगर यह सही तरीके से लागू हुआ तो झारखंड में हर साल सैकड़ों जिंदगियाँ बचाई जा सकेंगी।
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