Jharkhand News: झारखंड के देवघर जिले में एक दैनिक वेतनभोगी माली की लंबी कानूनी लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट ने न्याय का नया अध्याय लिखते हुए जीत दिलाई है। शीर्ष अदालत ने देवघर मार्केटिंग बोर्ड की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी और झारखंड हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें मोती राम की सेवा को नियमित करने का निर्देश दिया गया था। मोती राम पिछले 24 वर्षों से महज 51 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी पर माली के पद पर कार्यरत थे। यह फैसला उन हजारों दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए मिसाल बन सकता है, जो वर्षों से अस्थायी स्थिति में काम करते आ रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए बोर्ड की अपील को खारिज किया। अदालत ने माना कि लंबे समय तक निरंतर सेवा देने वाले कर्मचारी को नियमित करने से इनकार न्यायोचित नहीं है। यह निर्णय श्रमिकों के अधिकारों और समानता के सिद्धांत को मजबूती प्रदान करता है।
मोती राम की कहानी: 2001 से शुरू हुई यात्रा

देवघर के बंपास टाउन निवासी मोती राम की नियुक्ति जून 2001 में देवघर मार्केटिंग बोर्ड में दैनिक वेतनभोगी माली के रूप में हुई थी। उन्हें प्रशासनिक भवन के पास लगाए गए 10 आम के पौधों की देखभाल का जिम्मा सौंपा गया था। उस समय उनकी दैनिक मजदूरी मात्र 51 रुपये निर्धारित की गई थी, जो मासिक रूप से लगभग 1,500-1,600 रुपये के आसपास आती थी।
वर्षों बीतते गए, लेकिन मजदूरी में मामूली बढ़ोतरी ही हुई। 2015 में मोती राम ने मजदूरी बढ़ाने के लिए आवेदन दिया, जिसमें उन्होंने अपनी मासिक कमाई मात्र 4,346 रुपये बताई। तत्कालीन उपायुक्त ने मार्च 2015 में उनकी मजदूरी बढ़ाकर 7,593 रुपये मासिक करने का आदेश दिया। इसके बावजूद सेवा नियमित नहीं हुई।
2020 में जिला प्रशासन ने 10 वर्ष या उससे अधिक समय से कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की सेवा नियमित करने संबंधी सूचना जारी की। मोती राम ने भी आवेदन किया, लेकिन कोई निर्णय नहीं होने पर उन्होंने झारखंड हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की।
कानूनी संघर्ष का सफर
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान मार्केटिंग बोर्ड और प्रशासन की ओर से तर्क दिया गया कि मोती राम दैनिक वेतनभोगी थे और नियमितीकरण की कोई शर्त पूरी नहीं होती। फरवरी 2023 में एकल पीठ ने याचिका खारिज कर दी।
मोती राम ने खंडपीठ में अपील दायर की। अपील पर सुनवाई में यह तथ्य उभर कर सामने आया कि वे 24 वर्षों से लगातार काम कर रहे थे, सेवा संतोषजनक थी और नियमितीकरण के लिए आवेदन भी मांगे गए थे। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने उनकी सेवा नियमित करने का आदेश पारित किया।
इस आदेश को चुनौती देते हुए देवघर मार्केटिंग बोर्ड सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शीर्ष अदालत ने मामले की गहन सुनवाई के बाद बोर्ड की एसएलपी खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक निरंतर सेवा से कर्मचारी में नियमितीकरण की वैध अपेक्षा पैदा होती है।
दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के अधिकार और सुप्रीम कोर्ट का रुख
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के उन कई निर्णयों की कड़ी में शामिल है, जहां लंबे समय तक अस्थायी आधार पर काम करने वाले कर्मचारियों को नियमित करने पर जोर दिया गया है। अदालत ने पहले भी कहा है कि ‘उमा देवी’ मामले के फैसले का दुरुपयोग कर शोषण नहीं किया जा सकता। यदि कर्मचारी स्वीकृत पदों पर वर्षों से काम कर रहा है और उसकी सेवा संतोषजनक है, तो नियमितीकरण से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 16 (सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता) का उल्लंघन है।
झारखंड में ऐसे हजारों दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी हैं, जो सफाईकर्मी, माली, चपरासी आदि पदों पर काम करते हैं। कई मामलों में सरकार ने नियमितीकरण की नीति बनाई है, लेकिन क्रियान्वयन में देरी आम बात है। यह फैसला ऐसे कर्मचारियों के लिए राहत लेकर आया है और भविष्य में समान मामलों में मजबूत आधार प्रदान करेगा।
मोती राम के लिए न्याय की जीत
मोती राम की यह जीत न केवल व्यक्तिगत है, बल्कि उन सभी मेहनतकशों के लिए प्रेरणा है जो वर्षों से कम वेतन और असुरक्षा में काम करते आ रहे हैं। 24 साल की सेवा के बाद उन्हें अब नियमित कर्मचारी का दर्जा मिलेगा, जिसमें पेंशन, ग्रेच्युटी, छुट्टियां और अन्य लाभ शामिल होंगे।
देवघर मार्केटिंग बोर्ड को अब हाई कोर्ट के आदेश का पालन करना होगा। बोर्ड के अधिकारियों ने कहा है कि अदालत के फैसले का सम्मान किया जाएगा और आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
Jharkhand News: झारखंड में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की स्थिति
झारखंड राज्य में हजारों दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी विभिन्न विभागों में कार्यरत हैं। राज्य सरकार ने समय-समय पर नियमितीकरण की योजनाएं चलाई हैं, लेकिन कई मामलों में अदालती हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उम्मीद है कि सरकार स्वतः ऐसे मामलों का निपटारा करेगी, ताकि कर्मचारियों को न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई न लड़नी पड़े।
यह मामला श्रमिकों के अधिकारों, सरकारी संस्थाओं की जिम्मेदारी और न्यायिक सक्रियता का उत्कृष्ट उदाहरण है। मोती राम की मेहनत और लगन ने साबित कर दिया कि न्याय की राह भले लंबी हो, लेकिन अंत में सत्य की जीत होती है।



