Top 5 This Week

Related Posts

निजी स्कूल बसों की मनमानी फीस से अभिभावक परेशान, नियमों की मांग तेज

डेस्क: आज शिक्षा को हर माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य मानते हैं, लेकिन इसी शिक्षा से जुड़े खर्च अब लगातार आम आदमी की कमर तोड़ते जा रहे हैं। निजी स्कूलों की बढ़ती फीस के साथ-साथ अब स्कूल बसों की मनमानी फीस भी अभिभावकों के लिए एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। कई शहरों और कस्बों में अभिभावक यह शिकायत कर रहे हैं कि स्कूल बस का किराया हर साल बिना किसी स्पष्ट कारण के बढ़ा दिया जाता है, जबकि सुविधाओं में कोई खास सुधार नहीं दिखता।

बिना नियम के तय हो रही बस फीस

अभिभावकों का कहना है कि निजी स्कूल बसों की फीस तय करने के लिए कोई स्पष्ट सरकारी नियम या निगरानी व्यवस्था दिखाई नहीं देती। कई स्कूल दूरी के नाम पर मनमाना शुल्क वसूल रहे हैं। कुछ मामलों में तो एक ही इलाके के बच्चों से अलग-अलग बस फीस ली जा रही है। अभिभावकों को न तो किराया तय करने का आधार बताया जाता है और न ही कोई लिखित जानकारी दी जाती है।

हर साल बढ़ोतरी, सवाल वही

कई अभिभावकों ने बताया कि हर शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में स्कूल बस फीस में 10 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी जाती है। डीज़ल के दाम, मेंटेनेंस और स्टाफ वेतन का हवाला देकर फीस बढ़ाई जाती है, लेकिन जब ईंधन के दाम कम होते हैं, तब बस फीस में कोई कटौती नहीं की जाती। इससे यह साफ होता है कि बस सेवा कई स्कूलों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि कमाई का साधन बनती जा रही है।

अभिभावकों की मजबूरी का फायदा

शहरों में बढ़ते ट्रैफिक और सुरक्षा कारणों से अधिकांश माता-पिता बच्चों को खुद स्कूल छोड़ने में असमर्थ होते हैं। इसी मजबूरी का फायदा कई निजी स्कूल उठा रहे हैं। स्कूल बस लेना अनिवार्य जैसा बना दिया जाता है और वैकल्पिक व्यवस्था पर अप्रत्यक्ष दबाव डाला जाता है। कई अभिभावकों का कहना है कि यदि वे निजी वाहन से बच्चे को लाने-ले जाने की बात करते हैं, तो स्कूल प्रबंधन असहमति जताता है।

सुविधाओं पर भी उठ रहे सवाल

भारी बस फीस देने के बावजूद कई स्कूल बसों की हालत संतोषजनक नहीं है। पुराने वाहन, खराब सीटें, सही वेंटिलेशन की कमी और कई जगहों पर सुरक्षा मानकों का पालन न होना आम शिकायत है। कुछ बसों में महिला अटेंडेंट की व्यवस्था नहीं होती, जबकि छोटे बच्चों के लिए यह जरूरी मानी जाती है। अभिभावकों का कहना है कि जब सुविधाएँ अधूरी हैं, तो फिर इतना अधिक शुल्क क्यों लिया जा रहा है।

मध्यम वर्ग पर सीधा असर

निजी स्कूल बसों की बढ़ती फीस का सबसे ज्यादा असर मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है। पहले ही स्कूल फीस, किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्च अभिभावकों की आय पर दबाव डालते हैं। ऐसे में बस फीस में बढ़ोतरी परिवार के मासिक बजट को बिगाड़ देती है। कई माता-पिता बच्चों को बस की बजाय पैदल या साइकिल से भेजने को मजबूर हो रहे हैं, जो सुरक्षा की दृष्टि से जोखिम भरा हो सकता है।

शिकायतें, लेकिन समाधान नहीं

अभिभावकों का कहना है कि उन्होंने स्कूल प्रबंधन से कई बार बातचीत करने की कोशिश की, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं मिला। कुछ जगहों पर अभिभावक समूह बनाकर प्रशासन से शिकायत भी कर चुके हैं, लेकिन कार्रवाई धीमी है। शिक्षा विभाग और परिवहन विभाग के बीच जिम्मेदारी तय न होने के कारण मामला अधर में लटका रहता है।

सरकारी नियम और जमीनी हकीकत

सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार स्कूल बसों की फीस, सुरक्षा और संचालन पर निगरानी होनी चाहिए। बसों का फिटनेस प्रमाणपत्र, ड्राइवर का लाइसेंस और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े नियम अनिवार्य हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन नियमों का पालन कई जगह केवल कागजों तक सीमित रह गया है। अभिभावकों की मांग है कि बस फीस को नियंत्रित करने के लिए भी स्पष्ट नियम बनाए जाएँ।

अभिभावकों की मांगें

अभिभावक चाहते हैं कि स्कूल बस फीस दूरी और वास्तविक खर्च के आधार पर तय की जाए। हर साल होने वाली बढ़ोतरी का स्पष्ट कारण बताया जाए और स्कूलों को फीस संरचना सार्वजनिक करनी चाहिए। साथ ही, यह भी जरूरी है कि अभिभावकों को वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था चुनने की पूरी स्वतंत्रता मिले, बिना किसी दबाव या भेदभाव के।

समाधान की दिशा में कदम जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में यह और गंभीर रूप ले सकती है। शिक्षा विभाग, परिवहन विभाग और जिला प्रशासन को मिलकर निजी स्कूल बसों की फीस और संचालन पर सख्त निगरानी करनी होगी। अभिभावकों की शिकायतों के लिए एक प्रभावी तंत्र बनाना भी जरूरी है, ताकि उनकी आवाज सुनी जा सके।

निष्कर्ष

निजी स्कूल बसों की मनमानी फीस केवल एक आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है। जब शिक्षा को अधिकार माना गया है, तो उससे जुड़ी सेवाओं को भी पारदर्शी और न्यायसंगत होना चाहिए। अभिभावकों की शिकायतें इस बात का संकेत हैं कि अब इस मुद्दे पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है, ताकि बच्चों की पढ़ाई बोझ नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण का माध्यम बन सके।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles