Premanand Maharaj Pravachan: सनातन धर्म में बड़ों के चरण स्पर्श करना सम्मान और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। लेकिन कई लोग सोचते हैं कि अगर कोई हमारे पैर छू ले, तो हमारा अच्छा कर्म या पुण्य कम हो जाता है। इस भ्रम को दूर करने के लिए वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचन में आसान शब्दों में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि पैर छूना गलत नहीं, बल्कि यह हमारी सोच पर निर्भर करता है। अगर भगवान का भाव रखें, तो पुण्य बढ़ता है, न कि घटता। प्रेमानंद महाराज का यह प्रवचन लाखों भक्तों के लिए मार्गदर्शन है। यह बात उन लोगों के लिए खास है जो धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर दुविधा में रहते हैं।
Premanand Maharaj Pravachan: पैर छूने का मतलब क्या है?

प्रवचन के दौरान एक भक्त ने पूछा कि क्या किसी के पैर छूने से हमारा पुण्य नष्ट हो जाता है? प्रेमानंद महाराज ने मुस्कुराते हुए कहा, “पैर छूना और प्रणाम करना एक ही चीज है।” उन्होंने समझाया कि सनातन संस्कृति में बड़ों के पैर छूना अनुभव और ज्ञान का सम्मान है। छोटे-बड़े का फर्क तो मन में होता है, लेकिन भगवान सबमें समाया है। अगर कोई सम्मान में पैर छूता है, तो हमें खुशी होनी चाहिए। लेकिन अगर हम अहंकार में कहें कि ‘मेरा पुण्य कम हो जाएगा’, तो वही सोच हमें नुकसान पहुंचाती है।
प्रेमानंद महाराज ने जोर देकर कहा कि लाखों लोग रोज प्रणाम करते हैं। क्या हर बार पुण्य घटेगा? नहीं। यह सब मन की कल्पना है। उन्होंने उदाहरण दिया कि अगर हम भगवान को सबमें देखें, तो कोई हानि नहीं। यह प्रवचन वृंदावन के एक सत्संग में हुआ, जहां सैकड़ों लोग जमा थे।
पुण्य कम होने का भ्रम क्यों?
कई लोग सोचते हैं कि पैर छूवाना पाप का भागी बनना है। प्रेमानंद महाराज ने इसे खारिज किया। उन्होंने कहा, “अगर इच्छा न हो, तो पहले ही प्रणाम कर दें। लेकिन जबरदस्ती हो, तो भगवत भाव से स्वीकार करें।” उनका मानना है कि पुण्य कर्म से बनता है, न कि बाहरी क्रिया से। अगर मन साफ हो, तो सम्मान लेना पुण्य बढ़ाने वाला है। लेकिन अगर श्रेष्ठता का अहंकार हो, तो भजन (भक्ति) कमजोर पड़ जाता है। यह बात ग्रामीण इलाकों के लोगों के लिए आसान है, जहां रीति-रिवाज रोजमर्रा का हिस्सा हैं।
प्रेमानंद महाराज का संदेश: सोच बदलें, पुण्य बचेगा
महाराज जी ने स्पष्ट किया कि कोशिश यही होनी चाहिए कि कोई पैर न छुए। लेकिन अगर हो जाए, तो प्रणाम मानकर खुश हों। उन्होंने कहा, “सोच बदल गई, तो पुण्य नष्ट हो सकता है। सही भाव रखें, तो बढ़ेगा।” यह संदेश युवाओं के लिए भी उपयोगी है, जो आधुनिक जीवन में पुरानी परंपराओं से कतराते हैं। प्रेमानंद महाराज के प्रवचन से लोग सीख रहे हैं कि धर्म सरल है, जटिल नहीं।



