“सच्ची भक्ति वही, जिसमें कपट न हो”आचार्य श्री राजेश कृष्ण जी महाराज
जमशेदपुर।साकची में श्री श्री रामलीला उत्सव समिति के तत्वावधान में रामलीला मैदान में श्रीरामकृष्ण मंडल द्वारा आयोजित संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के छठे दिन राष्ट्रीय कथा प्रवक्ता आचार्य श्री राजेश कृष्ण जी महाराज ने भक्तों को गिरिराज अवतरण, गोवर्धन पूजा, रासलीला, उद्धव ज्ञान, कृष्ण-रुक्मिणी विवाह सहित कई दिव्य प्रसंगों का श्रवण कराया। कथा सुनने के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी और पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।

गिरिराज अवतरण और गोवर्धन पूजा
आचार्य श्री ने कहा कि गोवर्धन साक्षात् श्रीकृष्ण का ही स्वरूप हैं। भगवान के दाहिने वक्षस्थल से गोवर्धन प्रकट हुए और बाएं वक्षस्थल से श्रीराधा जी। जब ब्रजवासियों ने श्रीकृष्ण के कहने पर इंद्र की पूजा छोड़ दी, तो इंद्र ने कुपित होकर मूसलधार वर्षा कर ब्रज को जलमग्न करने का प्रयास किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका (छोटी उंगली) पर सात दिन-सात रात तक गोवर्धन पर्वत को उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की। इस कारण प्रभु का नाम “गिरिधारी” पड़ा। जब इंद्र को यह ज्ञात हुआ कि स्वयं नारायण ही गोवर्धन को उठा रहे हैं, तो वे ऐरावत हाथी पर सवार होकर भगवान के चरणों में क्षमा मांगने आए।

काम विजय लीला एवं रासलीला का मार्मिक प्रसंग
भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला की, परंतु वे वास्तव में अपने ही प्रतिबिंब के साथ नृत्य कर रहे थे। जब गोपियों को अपने सौंदर्य और स्वरूप का अहंकार हुआ, तो भगवान अंतर्ध्यान हो गए। गोपियों ने विरह वेदना में गोपी गीत गाया, जिससे भगवान प्रकट हुए और कहा—
“निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा।”
भगवान ने भक्तों को संदेश दिया कि सच्चे और निष्कपट हृदय से की गई भक्ति ही उन्हें प्राप्त कर सकती है।

कंस वध एवं मथुरा विजय
भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी कंस का वध कर अपने माता-पिता वसुदेव और देवकी को कारागार से मुक्त कराया तथा उग्रसेन को पुनः मथुरा का राजा बनाया। उन्होंने उद्धव को गोपियों के प्रेम की महिमा समझाने के लिए ब्रज भेजा, जहाँ उद्धव को वास्तविक प्रेम का अर्थ ज्ञात हुआ।

जरासंध से संघर्ष और द्वारका की स्थापना
जरासंध ने सत्रह बार मथुरा पर आक्रमण किया, लेकिन हर बार पराजित हुआ। तब श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़कर समुद्र के मध्य में द्वारका नगरी की स्थापना की, जिसे विश्वकर्मा ने निर्मित किया। इसके बाद वे द्वारकाधीश कहलाए।

श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह एवं सोलह हजार कन्याओं का उद्धार
भगवान श्रीकृष्ण ने साक्षात् लक्ष्मी स्वरूपा रुक्मिणी जी से विवाह किया। इसके अलावा, उन्होंने जाम्बवती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रविंदा, नग्नजीती, भद्रा, और लक्ष्मणा से भी विवाह किया। साथ ही, नरकासुर के कारागार से 16,100 कन्याओं को मुक्त कर उन्हें अपनाकर समाज में सम्मान दिलाया।

भक्तों का समर्पण एवं समिति का सम्मान
कथावाचक आचार्य श्री राजेश कृष्ण जी महाराज ने भागवत कथा समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों को अंगवस्त्र और माला पहनाकर आशीर्वाद दिया और उनके निस्वार्थ सेवा कार्य की सराहना की। इस अवसर पर पशुपतिनाथ पांडे, राजेश अवस्थी, राजेश शुक्ला, ब्रिजेश वाजपेई, राजेंद्र प्रसाद सहित कई भक्तों ने यजमान के रूप में पूजा-अर्चना की।
इस आयोजन में सुभाष चंद्र शाह, रामगोपाल चौधरी, गया प्रसाद चौधरी, पवन अग्रहरि, रोहित मिश्रा, डॉक्टर डीपी शुक्ला, शंकर लाल सिंघल, राम केवल मिश्र, अवधेश मिश्रा, दिलीप तिवारी, मगन पांडे, मनोज कुमार मिश्रा, मनोज तिवारी, गौरी शंकर बसंत सहित अनेक श्रद्धालु भक्तों का योगदान रहा।

समापन एवं अगली कथा की घोषणा
कथा के अंत में भक्तों को भव्य भंडारे का प्रसाद वितरित किया गया। आयोजकों ने बताया कि अगले वर्ष भी यह दिव्य कथा आयोजित की जाएगी और श्रद्धालुओं को भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का पुनः श्रवण कराया जाएगा।

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