Top 5 This Week

Related Posts

West Bengal Politics: बंगाल में SIR ने फंसाया बड़ा पेंच, 7 मई तक नहीं बनी नई सरकार तो पक्का लगेगा राष्ट्रपति शासन, राज्यपाल के इस्तीफे ने बढ़ाई टेंशन

West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में इस वक्त सियासी माहौल बेहद गर्म है और एक के बाद एक ऐसी घटनाएं हो रही हैं जो राज्य को एक बड़े संवैधानिक संकट की तरफ धकेल रही हैं। एक तरफ SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविजन का काम इतनी धीमी रफ्तार से चल रहा है कि चुनाव की तारीख कब घोषित होगी यह कहना मुश्किल हो गया है। दूसरी तरफ राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने गुरुवार रात अचानक इस्तीफा दे दिया जिसने राष्ट्रपति शासन की अटकलों को और हवा दे दी है। बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को खत्म हो रहा है और अगर उससे पहले नई सरकार नहीं बन पाई तो राष्ट्रपति शासन लागू होना लगभग तय माना जा रहा है। यह सब मिलकर बंगाल की राजनीति में एक ऐसा उलझा हुआ जाल बना रहे हैं जिसे सुलझाना आसान नहीं दिख रहा।

SIR की रफ्तार इतनी धीमी कि चुनाव की तारीख भी अधर में

पूरे मामले की जड़ में SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविजन की प्रक्रिया है जो हाईकोर्ट की निगरानी में चल रही है। इस काम को पूरा किए बिना बंगाल में चुनाव कराना मुमकिन नहीं है। लेकिन यह काम जिस रफ्तार से हो रहा है उसे देखकर लग रहा है कि इसे पूरा होने में अभी और काफी वक्त लगेगा।

असल दिक्कत यह है कि अंतिम मतदाता सूची तो जारी हो चुकी है लेकिन अभी भी करीब 60 लाख नामों के दस्तावेजों का सत्यापन बाकी है। इन 60 लाख में से अब तक सिर्फ 6 लाख 15 हजार मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच हो पाई है। यानी अभी भी करीब 54 लाख दस्तावेज पेंडिंग हैं। अनुमान के मुताबिक अगर अतिरिक्त जज भी लगा दिए जाएं तो भी इन 54 लाख दस्तावेजों को देखने में बहुत लंबा वक्त लगेगा।

और फिर दस्तावेज सत्यापन के बाद चुनाव कराने में भी वक्त चाहिए। इन सब बातों को जोड़कर देखें तो साफ लगता है कि 7 मई से पहले पूरी प्रक्रिया खत्म करके चुनाव कराना और नई सरकार बनाना बेहद मुश्किल काम है। यही वजह है कि राज्य में संवैधानिक संकट की आशंका तेजी से बढ़ रही है।

West Bengal Politics:राज्यपाल सीवी आनंद बोस का अचानक इस्तीफा

West Bengal Politics
West Bengal Politics

इस पहले से उलझी हुई स्थिति में राज्यपाल सीवी आनंद बोस के अचानक इस्तीफे ने और पेंच डाल दिया। गुरुवार की रात उन्होंने इस्तीफा दे दिया। सूत्रों के मुताबिक उन्हें अचानक दिल्ली बुलाया गया जिसके बाद यह इस्तीफा हुआ। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सोशल मीडिया पोस्ट से यह जानकारी सामने आई कि आरएन रवि नए राज्यपाल होंगे।

इस बदलाव के बाद से अटकलें और तेज हो गई हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस नाजुक वक्त में बंगाल को एक ऐसे राज्यपाल की जरूरत है जिनके पास मजबूत प्रशासनिक कौशल, संवैधानिक समझ और राजनीतिक अनुभव हो। माना जा रहा है कि सीवी आनंद बोस इन जरूरतों पर खरे नहीं उतरे और इसीलिए यह बदलाव किया गया। आरएन रवि का नाम सामने आने के बाद से यह चर्चा और गर्म हो गई है कि आने वाले दिनों में बंगाल में क्या होने वाला है।

भाजपा पहले से कर रही थी राष्ट्रपति शासन की मांग

यह पहली बार नहीं है जब बंगाल में राष्ट्रपति शासन की बात उठ रही हो। करीब एक साल पहले जब मुर्शिदाबाद में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी तब विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने खुलकर यह मांग की थी कि बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाया जाए और उसके तहत चुनाव कराए जाएं। उनका तर्क था कि बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में सिर्फ चुनाव आयोग के भरोसे चुनाव कराना मुमकिन नहीं है। उनका कहना था कि राष्ट्रपति शासन लगने के बाद ही सभी लोग बिना डर के मतदान कर सकेंगे।

अब SIR की स्थिति और राज्यपाल के इस्तीफे के बाद वही पुरानी मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है। भाजपा के नेता इसे एक मौके की तरह देख रहे हैं और उनका कहना है कि अगर 7 मई तक नई सरकार नहीं बन पाती तो राष्ट्रपति शासन लगाना ही एकमात्र रास्ता बचेगा।

TMC का तर्क, कार्यवाहक सरकार चल सकती है छह महीने तक

इस पूरे मामले पर तृणमूल कांग्रेस की राय अलग है। TMC नेता जयप्रकाश मजूमदार का कहना है कि यह जो स्थिति पैदा हुई है वह चुनाव आयोग की वजह से है। उनका तर्क है कि नियमों के मुताबिक कार्यवाहक सरकार कम से कम छह महीने तक सत्ता में रह सकती है इसलिए राष्ट्रपति शासन की जरूरत नहीं पड़ेगी। TMC यह भी कह रही है कि आयोग को एक तटस्थ संस्था माना जाता है और इस स्थिति की जिम्मेदारी उसी पर है।

लेकिन राजनीतिक जानकार TMC के इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि चाहे नियम जो भी कहें, जमीनी हकीकत यह है कि अगर 7 मई तक नई सरकार नहीं बनी तो बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगना तय है। कार्यवाहक सरकार का ऑप्शन तो है लेकिन उसके लिए भी हालात अनुकूल होने चाहिए और अभी जो माहौल है उसमें यह रास्ता आसान नहीं दिखता।

7 मई की डेडलाइन और संवैधानिक संकट की आशंका

पश्चिम बंगाल विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 7 मई को खत्म हो रहा है। यानी अब सिर्फ दो महीने का वक्त बचा है। इन दो महीनों में SIR की बची हुई प्रक्रिया पूरी करनी है, चुनाव की तारीख घोषित करनी है, चुनाव कराने हैं और नई सरकार बनानी है। इतने कम वक्त में इतना कुछ करना लगभग नामुमकिन लग रहा है।

अगर 7 मई तक नई सरकार नहीं बन पाई तो संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन लागू करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा। यह बंगाल की राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ होगा और इसका असर सिर्फ राज्य तक नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा। आने वाले कुछ हफ्ते बंगाल के लिए बेहद अहम होने वाले हैं और पूरे देश की नजर इस पर टिकी है।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles