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बिहार की राजनीति हमेशा अप्रत्याशित रही है — कभी गठबंधन पलटता है, कभी जनादेश।

2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के एग्जिट पोल्स सामने आने लगे हैं — एनडीए को बढ़त, महागठबंधन को उम्मीद और जनता के मन में सवाल — “क्या नीतीश कुमार एक बार फिर सीएम बनेंगे?”

डेस्क:बिहार की राजनीति हमेशा अप्रत्याशित रही है — कभी गठबंधन पलटता है, कभी जनादेश। और अब जब बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का मतदान पूरा हो चुका है, तो पूरा राज्य निगाहें टिकाए बैठा है एग्जिट पोल्स पर।एग्जिट पोल्स के शुरुआती नतीजों ने फिर से एक बार नीतीश कुमार को केंद्र में ला दिया है। सवाल अब यही है — “सीटें कोई भी जीते, क्या आखिर में नीतीश ही फिर से सीएम बनेंगे?”

2025 के एग्जिट पोल क्या बता रहे हैं?

इस बार के एग्जिट पोल्स में एनडीए गठबंधन को फिर से बहुमत की सीमा पार करते हुए दिखाया गया है। कई प्रमुख एजेंसियों जैसे Axis My India, C-Voter, और Chanakya ने अपने सर्वे में एनडीए को 130 से 160 सीटों तक का अनुमान दिया है। वहीं, महागठबंधन (RJD + कांग्रेस + वाम दल) को 70 से 90 सीटों तक सीमित दिखाया गया है।

हालांकि, कुछ सर्वेक्षणों में यह भी देखने को मिला कि कुछ इलाकों में तेजस्वी यादव का जनाधार मजबूत हुआ है, खासकर युवाओं और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर। लेकिन नीतीश कुमार का “अनुभव” और गठबंधन समीकरणों की समझ अभी भी उन्हें आगे रखती दिख रही है।

मतदान प्रतिशत ने बढ़ाई दिलचस्पी

बिहार में इस बार रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया गया है। चुनाव आयोग के अनुसार, 66.9% से अधिक वोटिंग हुई — जो अब तक का सबसे अधिक आंकड़ा है।राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह उच्च मतदान प्रतिशत बदलाव की ओर इशारा भी कर सकता है। लेकिन बिहार में बदलाव की हवा अक्सर अंतिम नतीजों से पहले थम जाती है — यह हमने 2015 और 2020 दोनों में देखा।

पिछले चुनावों में एग्जिट पोल्स का रिकॉर्ड

2020 में लगभग हर एग्जिट पोल ने महागठबंधन को बहुमत का अनुमान दिया था, लेकिन वास्तविक नतीजों में एनडीए ने 125 सीटों के साथ सरकार बना ली थी। वहीं 2015 में एग्जिट पोल्स ने एनडीए को बढ़त दी थी, पर परिणाम इसके उलट रहे और महागठबंधन (जेडीयू + आरजेडी + कांग्रेस) ने भारी जीत दर्ज की थी। इससे साफ है कि बिहार में एग्जिट पोल्स की सटीकता हमेशा संदिग्ध रही है। यहाँ का मतदाता अंतिम क्षण तक फैसला बदल सकता है।


नीतीश कुमार: अनुभव बनाम एंटी-इन्कम्बेंसी

इस चुनाव में भले ही मुद्दे बेरोजगारी, महंगाई और शिक्षा रहे हों, लेकिन हर चर्चा के केंद्र में नीतीश कुमार ही रहे।उनके लिए यह चुनाव “राजनीतिक अस्तित्व” का भी सवाल था। वे अब तक बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल हो चुके हैं।

“नीतीश फैक्टर” यानी स्थिरता और शासन का अनुभव एनडीए के लिए इस बार सबसे बड़ा प्लस पॉइंट बनता दिख रहा है।
हालांकि, युवा मतदाताओं में परिवर्तन की चाह भी उतनी ही स्पष्ट नजर आई है — जो आने वाले परिणामों को रोमांचक बना सकती है।

महागठबंधन की उम्मीदें अब भी ज़िंदा

तेजस्वी यादव ने अपनी सभाओं में “10 लाख नौकरियों” और “युवा बिहार” जैसे नारों से जनता का ध्यान खींचा है। कुछ एग्जिट पोल्स के मुताबिक, शहरी इलाकों में एनडीए को बढ़त है, जबकि ग्रामीण बिहार में महागठबंधन का असर अब भी बरकरार है। अगर एग्जिट पोल्स गलत साबित हुए — तो यह बिहार की राजनीतिक कहानी को एक बार फिर पलट सकता है।

जनता का मूड क्या कहता है?

सड़क पर बातचीत करने पर एक आम राय सामने आती है — “बदलाव तो चाहिए, लेकिन नीतीश से बेहतर कौन?” यह एक ऐसी भावना है जो बताती है कि भले ही असंतोष मौजूद हो, लेकिन जनता स्थिरता और अनुभव के नाम पर फिर से नीतीश को मौका दे सकती है।

निष्कर्ष:

एग्जिट पोल्स ने एक बार फिर बिहार की सियासत को चर्चा में ला दिया है। हालांकि नतीजे 14 नवंबर को आएंगे, लेकिन अभी के हालात में नीतीश कुमार एक बार फिर “किंग” या “किंगमेकर” बनने की स्थिति में हैं। इतिहास बताता है — बिहार में चुनाव सिर्फ वोटों का नहीं, बल्कि भावनाओं और भरोसे का भी खेल होता है।
अब देखना यह है कि एग्जिट पोल्स की भविष्यवाणी हकीकत बनती है या बिहार फिर एक नई राजनीतिक कहानी लिखता है।

PRAGATI DIXIT
Author: PRAGATI DIXIT

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