डेस्क: कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर एक बार फिर अपने बयान से सुर्खियों में हैं। बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी के 98वें जन्मदिन पर थरूर ने सोशल मीडिया के जरिए उन्हें शुभकामनाएं दीं और उनकी लोक सेवा, विनम्रता तथा आधुनिक भारत निर्माण में भूमिका की खुलकर प्रशंसा की। लेकिन, नेहरू और इंदिरा गांधी से तुलना करते हुए दिए गए बयान ने राजनीतिक गलियारों में हंगामा मचा दिया है। आलोचकों ने थरूर पर आडवाणी की ‘विभाजनकारी राजनीति’ को सफेदपोश करने का आरोप लगाया है। न्यूज मीडिया किरण को मिली जानकारी के अनुसार, यह विवाद सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है, जहां थरूर के समर्थक और विरोधी दोनों ही अपनी-अपनी दलीलें दे रहे हैं।
थरूर का यह बयान 8 नवंबर को आया, जब आडवाणी अपना 98वां जन्मदिन मना रहे थे। थरूर ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए कहा, “आदरणीय एलके. आडवाणी को 98वें जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं! लोक सेवा के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता, उनकी विनम्रता और शालीनता और आधुनिक भारत की दिशा तय करने में उनकी भूमिका अविस्मरणीय है। वह एक सच्चे राजनेता हैं, जिनका सेवा-समर्पित जीवन अनुकरणीय रहा है।” इस प्रशंसा के साथ थरूर ने एक महत्वपूर्ण तुलना भी की। उन्होंने लिखा, “जैसे जवाहरलाल नेहरू की पूरी विरासत को सिर्फ 1962 के चीन युद्ध की हार से नहीं आंका जा सकता या इंदिरा गांधी की विरासत को सिर्फ इमरजेंसी से नहीं, उसी तरह आडवाणी की लंबी सेवा को सिर्फ 1990 की रथ यात्रा जैसे एक घटना तक सीमित करना अन्याय है।” थरूर का यह तर्क था कि किसी भी नेता की दशकों लंबी सार्वजनिक सेवा को एक-दो घटनाओं से परखना अनुचित है।
विवाद की आग को हवा देने वाले सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने थरूर के बयान पर तीखा प्रहार किया। हेगड़े ने एक्स पर लिखा, “इस देश में नफरत के बीज बोना किसी भी तरह से लोक सेवा नहीं है।” हेगड़े का यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और कई यूजर्स ने इसे रीट्वीट कर थरूर की आलोचना की। आलोचकों का कहना है कि थरूर ने आडवाणी की उस राजनीति को नजरअंदाज कर दिया, जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने का आरोप झेलती रही है। एक अन्य ट्वीट में हेगड़े ने इशारों में कहा कि लोक सेवा का मतलब नफरत फैलाना नहीं है, जो सीधे आडवाणी की रथ यात्रा पर कटाक्ष था।
कांग्रेस पार्टी की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन थरूर के इस बयान से पार्टी के अंदर भी असहजता की खबरें हैं। थरूर, जो अक्सर अपनी बेबाक राय के लिए जाने जाते हैं, पहले भी ऐसे बयानों से विवादों में फंस चुके हैं। याद रहे, 2019 में उन्होंने ‘हिंदू पाकिस्तान’ वाले बयान से हंगामा मचाया था। न्यूज मीडिया किरण के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, “थरूर का यह प्रयास राजनीतिक परिपक्वता दिखाने का था, लेकिन नेहरू-इंदिरा तुलना ने इसे भावनात्मक मुद्दा बना दिया।” बीजेपी की ओर से भी कोई प्रत्यक्ष टिप्पणी नहीं हुई, लेकिन पार्टी समर्थक थरूर की प्रशंसा को कांग्रेस की ‘नरमी’ के रूप में देख रहे हैं।
इस विवाद का व्यापक संदर्भ भारतीय राजनीति की ध्रुवीकरण वाली प्रकृति है। आडवाणी, जिन्होंने बीजेपी को मुख्यधारा में लाने में अहम भूमिका निभाई, अब सक्रिय राजनीति से दूर हैं। लेकिन उनकी विरासत आज भी बहस का विषय बनी हुई है। थरूर का बयान इसी बहस को ताजा कर देता है, जहां नेहरू की विदेश नीति (1962 युद्ध) और इंदिरा की इमरजेंसी को ऐतिहासिक संदर्भों में देखा जाता है। थरूर ने तर्क दिया कि आडवाणी की 70 वर्षों से अधिक की सेवा को केवल एक घटना से जोड़ना अन्यायपूर्ण है। लेकिन आलोचक मानते हैं कि रथ यात्रा जैसी घटनाओं ने समाज में गहरे निशान छोड़े हैं।
निष्कर्ष :शशि थरूर का यह बयान भारतीय राजनीति में नेताओं की विरासत को संतुलित नजरिए से देखने की मांग करता है, लेकिन यह भी साबित करता है कि ऐतिहासिक घटनाएं कितनी संवेदनशील हैं। विवाद से सबक यह है कि प्रशंसा भी ध्रुवीकरण पैदा कर सकती है। न्यूज मीडिया किरण ऐसी राजनीतिक बहसों को बिना पूर्वाग्रह के कवर करता रहेगा, ताकि पाठक सच्चाई से रूबरू हों।



