West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का सियासी सफर लगातार संकुचित होता जा रहा है। लोकसभा और विधानसभा में पहले ही उसका प्रतिनिधित्व खत्म हो चुका है। अब राज्यसभा में भी माकपा की उपस्थिति शून्य होने वाली है। बंगाल से माकपा का एकमात्र राज्यसभा सदस्य बिकास रंजन भट्टाचार्य का कार्यकाल 2 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रहा है। पार्टी की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह लगभग तय है कि अप्रैल में होने वाले राज्यसभा चुनाव में माकपा बंगाल से कोई सीट नहीं जीत पाएगी।
माकपा की यह स्थिति पार्टी के लिए गहरा संकट का संकेत है। एक समय बंगाल में वाम मोर्चे की सरकारें चलाने वाली पार्टी अब तीनों सदनों में बंगाल से पूरी तरह गायब होने की कगार पर है। लोकसभा में 2019 के बाद से माकपा का कोई सांसद नहीं है। 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। अब राज्यसभा में भी उसका प्रतिनिधित्व खत्म होने जा रहा है।
अप्रैल में खाली होंगी बंगाल की 5 राज्यसभा सीटें

अप्रैल 2026 में देशभर से राज्यसभा की कुल 37 सीटें रिक्त होने वाली हैं। इनमें से पश्चिम बंगाल की 5 सीटें शामिल हैं। इन सीटों पर वर्तमान में:
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तृणमूल कांग्रेस के सांसद: साकेत गोखले, सुब्रत बक्सी, ऋतब्रत बंद्योपाध्याय
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माकपा के सांसद: बिकास रंजन भट्टाचार्य
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एक सीट पहले ही रिक्त: मौसम बेनजीर नूर ने इस्तीफा देकर तृणमूल छोड़ दिया था और कांग्रेस में शामिल हो गईं
संख्या बल को देखते हुए इन 5 सीटों में से 4 पर तृणमूल कांग्रेस और 1 पर भाजपा की जीत लगभग तय मानी जा रही है। माकपा के पास विधानसभा में कोई विधायक नहीं है। ऐसे में पार्टी के लिए राज्यसभा में कोई प्रत्याशी उतारना और जीत हासिल करना नामुमकिन जैसा है।
भाजपा में मिथुन चक्रवर्ती या लॉकेट चटर्जी?
भाजपा के भीतर इस बार राज्यसभा की एक सीट को लेकर चर्चा तेज है। पार्टी के एक वर्ग मिथुन चक्रवर्ती को राज्यसभा भेजने के पक्ष में है। मिथुन पहले तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। चिटफंड घोटाले में नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था और 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हो गए थे।
वहीं पार्टी का दूसरा वर्ग पूर्व सांसद और तेज तर्रार नेता लॉकेट चटर्जी को राज्यसभा में मौका देने की मांग कर रहा है। लॉकेट चटर्जी भाजपा की महिला मोर्चा में सक्रिय हैं और पार्टी के लिए कई बार आक्रामक रुख अपनाती रही हैं। भाजपा नेतृत्व इस सीट पर अंतिम फैसला जल्द ले सकता है।
माकपा का लगातार घटता जनाधार
माकपा का बंगाल में जनाधार पिछले दो दशकों में तेजी से घटा है। 1977 से 2011 तक वाम मोर्चे की सरकार चलाने वाली पार्टी 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से हार गई। इसके बाद 2016 और 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन और खराब होता गया। 2021 में माकपा को बंगाल में शून्य सीट मिली। लोकसभा में भी पार्टी का कोई सांसद नहीं बचा।
राज्यसभा में बिकास भट्टाचार्य के कार्यकाल के खत्म होने के साथ ही बंगाल से माकपा की उपस्थिति पूरी तरह खत्म हो जाएगी। यह पार्टी के लिए ऐतिहासिक संकट है। माकपा अब बंगाल की राजनीति में हाशिए पर पहुंच चुकी है।
West Bengal Politics: तृणमूल और भाजपा की मजबूत स्थिति
संख्या बल के लिहाज से तृणमूल कांग्रेस को राज्यसभा की 4 सीटें लगभग तय मानी जा रही हैं। पार्टी विधानसभा में बहुमत में है। भाजपा को एक सीट मिलना तय है। माकपा और अन्य छोटे दलों की स्थिति इतनी कमजोर है कि वे किसी भी सीट पर असर नहीं डाल पाएंगे।
राज्यसभा चुनाव में विधायकों के मतदान से तय होने वाली इन सीटों पर संख्या बल ही निर्णायक होगा। तृणमूल और भाजपा दोनों ही अपनी स्थिति को मजबूत करने में जुटी हैं। माकपा की अनुपस्थिति से बंगाल की राज्यसभा प्रतिनिधित्व में वाम विचारधारा लगभग गायब हो जाएगी।
झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में वाम दलों का जनाधार तेजी से घट रहा है। माकपा की यह स्थिति वाम मोर्चे के भविष्य पर भी सवाल खड़े करती है। बंगाल में एक दौर में वाम दलों का गढ़ माने जाने वाले राज्य में अब उनकी स्थिति शून्य के करीब पहुंच गई है।



