West Bengal News: पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। विधानसभा चुनाव में अब महज दो से तीन महीने का वक्त बचा है और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस तथा विपक्षी भारतीय जनता पार्टी दोनों ने अपनी-अपनी तैयारियाँ तेज कर दी हैं। इस बार बंगाल की राजनीतिक हवा में ‘M’ फैक्टर हावी है महिला, मुस्लिम, मस्जिद, मंदिर, मटन, मछली, मनी पावर, मसल पावर और सबसे बड़े दो नाम ममता और मोदी।
राज्य की राजनीतिक तस्वीर दो ध्रुवों में बंटी नजर आती है, ठीक वैसे ही जैसे कोलकाता के दो सबसे मशहूर फुटबॉल क्लब मोहन बागान और ईस्ट बंगाल के समर्थक हमेशा दो खेमों में विभाजित रहते हैं। एक समय था जब बंगाल की लड़ाई कांग्रेस बनाम वाम मोर्चे की थी, फिर 34 वर्षों तक लेफ्ट का एकछत्र राज रहा। अब पिछले 15 वर्षों से तृणमूल कांग्रेस सत्ता में काबिज है और पिछले पाँच सालों से उसकी सीधी टक्कर भाजपा से है।
दीदी बनाम मोदी का फ्रेम
तृणमूल कांग्रेस की पूरी चुनावी रणनीति एक बार फिर इसी धुरी पर टिकी है चुनाव को ‘दीदी बनाम मोदी’ की लड़ाई बनाए रखना। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी डेढ़ दशक की सत्ता के बाद भी उतनी ही आक्रामक हैं जितनी वह वाम मोर्चे के 34 साल के ‘लाल किले’ को ध्वस्त करते वक्त थीं। ईडी की छापेमारी के बीच खुद फाइलें लेकर निकलना हो या सुप्रीम कोर्ट में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की लड़ाई लड़ना ममता हर मोर्चे पर सक्रिय हैं।
पार्टी के लिए जीत का फॉर्मूला अब भी वही है ममता का चेहरा, ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी जनकल्याणकारी योजनाएं और अल्पसंख्यक मतदाताओं का एकजुट वोट। इस समीकरण ने 2021 में भाजपा की आँधी को रोका था और तृणमूल का विश्वास है कि 2026 में भी यही काम आएगा।
ममता के भतीजे और सांसद अभिषेक बनर्जी इस बार दोहरी भूमिका निभा रहे हैं। एक तरफ वे भाजपा के आरोपों का मुँहतोड़ जवाब देते हैं, दूसरी तरफ पार्टी संगठन का समूचा प्रबंधन भी उन्हीं के हाथों में है।
SIR बना चुनावी रणभूमि
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर बंगाल में जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। कोलकाता के न्यू मार्केट से लेकर मुर्शिदाबाद के बेलडांगा और बर्धमान तक करीब 600 किलोमीटर के इलाके में यही मुद्दा सबसे गर्म है। तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि SIR के जरिए सवा करोड़ से अधिक बंगालियों के नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं। पार्टी ने इसे ‘बंगाली विरोधी षड्यंत्र’ करार दिया है।
इस मुद्दे ने एक तरह से तृणमूल के जमीनी कार्यकर्ताओं को नई ऊर्जा दे दी है। ममता की सड़क पर मौजूदगी और SIR पर उनकी आक्रामक लड़ाई से पार्टी का कैडर गाँव-गाँव, मोहल्ले-मोहल्ले सक्रिय हो उठा है। यही कारण है कि चुनाव से तीन महीने पहले ही तृणमूल पूरी तरह मैदान में उतर चुकी है।
ममता की चुनौतियाँ भी कम नहीं

हालाँकि ममता बनर्जी के लिए राह पूरी तरह साफ नहीं है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों की भर्ती घोटाले में गिरफ्तारी हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने 25,000 से अधिक नियुक्तियाँ रद्द कर दी हैं। आरजी कर अस्पताल में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने भी सरकार की छवि को नुकसान पहुँचाया। इसके अलावा डेढ़ दशक की सत्ता के बाद स्वाभाविक रूप से एंटी-इन्कंबेंसी की लहर भी बन रही है।
एक स्थानीय बंगाली पत्रकार की बात सुनें तो तस्वीर साफ हो जाती है “बंगाल में जो सड़क जीत लेता है, वही चुनाव जीत लेता है। और अभी सड़क पर ममता ही दिख रही हैं।”
भाजपा की तैयारी “बूथ से शुरू, दिल्ली तक का नेटवर्क”
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे, संगठन की ताकत और ‘डबल इंजन सरकार’ के नारे के साथ मैदान में है। पार्टी ने इस बार बूथ स्तर पर विशेष ध्यान देने की रणनीति बनाई है। हर विधानसभा सीट पर एक-एक वरिष्ठ नेता को तैनात किया गया है।
उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और उत्तराखंड समेत कई राज्यों के ये नेता अभी से डोर-टू-डोर अभियान चला रहे हैं। हर बूथ को मजबूत करना उनकी प्राथमिकता है। नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी सड़क पर मुखर रहते हुए घुसपैठ, भ्रष्टाचार और महिलाओं के खिलाफ अपराध के मुद्दों पर ममता सरकार को घेर रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य संगठन की बुनियाद मजबूत करने के साथ-साथ बंगाली ‘भद्रलोक’ यानी शिक्षित मध्यम वर्ग को साधने में जुटे हैं।
भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि राज्य में ममता के कद का कोई स्थानीय नेता उनके पास नहीं है। 2021 के चुनाव में भाजपा को 77 सीटें मिली थीं। अब लक्ष्य है 148 सीटें यानी दोगुने से भी ज्यादा। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पार्टी को ऐसे मुद्दे, अवसर और जमीनी चेहरे चाहिए जो वोटर को सीधे प्रभावित करें।
West Bengal News: फैसला अभी दूर, दावेदारी अभी से
बंगाल का चुनावी मैदान अभी भाषणों और रैलियों की आँधी से नहीं गूँज रहा, लेकिन सियासी हलचल पूरी तरह जारी है। वोटर लिस्ट ही अभी की असली रणभूमि है। जैसे-जैसे चुनाव करीब आएगा, दोनों प्रमुख दल और आक्रामक होंगे। ममता के पास अनुभव और जमीन की पकड़ है, भाजपा के पास केंद्र की शक्ति और संसाधन। दोनों के बीच यह मुकाबला 2026 के बंगाल को एक ऐतिहासिक चुनाव बना सकता है।



