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बंगाल के ‘चाणक्य’ और TMC के दूसरे नंबर के नेता नहीं रहे, 73 साल की उम्र में कोलकाता के अस्पताल में तोड़ा दम, सिंगुर-नानदीग्राम से लेकर TMC की सत्ता तक ममता बनर्जी के भरोसेमंद सहयोगी

Bengal News: बंगाल की राजनीति के दिग्गज नेता और पूर्व रेल मंत्री मुकुल रॉय का रविवार रात 1:30 बजे कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे 73 साल के थे और लंबे समय से कई बीमारियों से जूझ रहे थे। मुकुल रॉय लंबे समय तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी और विश्वासपात्र रहे। अपनी संगठनात्मक कुशलता और रणनीतिक कौशल के लिए उन्हें बंगाल राजनीति का ‘चाणक्य’ कहा जाता था। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में उन्हें अक्सर दूसरे नंबर का नेता माना जाता था।

सिंगुर और नानदीग्राम आंदोलन के दिनों से लेकर पश्चिम बंगाल में पार्टी की सत्ता तक, रॉय ने ममता बनर्जी के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे दूसरी यूपीए सरकार में शिपिंग मंत्रालय और बाद में रेल मंत्रालय में राज्य मंत्री रहे। 2017 में उन्होंने TMC छोड़कर BJP ज्वाइन की, लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद फिर से TMC में लौट आए। 13 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने दलबदल के आधार पर उनकी विधायक सदस्यता समाप्त कर दी थी। उनके निधन के साथ बंगाल की राजनीति ने एक प्रभावशाली रणनीतिकार और TMC की संगठनात्मक शक्ति के प्रमुख वास्तुकार को खो दिया है।

बंगाल राजनीति के ‘चाणक्य’ का जाना

मुकुल रॉय को बंगाल राजनीति का ‘चाणक्य’ कहा जाता था। यह उपनाम उन्हें उनकी असाधारण संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक रणनीति बनाने के कौशल के कारण मिला था।

TMC के गठन और विकास में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। जब 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, तब से लेकर 2011 में पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करने तक, मुकुल रॉय हर कदम पर ममता के साथ थे।

सिंगुर-नानदीग्राम आंदोलन: 2006-2007 में सिंगुर में टाटा मोटर्स के नैनो कार प्लांट और नानदीग्राम में केमिकल हब के खिलाफ जो ऐतिहासिक आंदोलन हुए, उनमें मुकुल रॉय ने पर्दे के पीछे रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को संगठित किया और आंदोलन को राजनीतिक शक्ति में बदलने में मदद की।

इन आंदोलनों ने 34 साल से सत्ता में बैठी वाम मोर्चा सरकार की नींव हिला दी और अंततः 2011 में TMC की ऐतिहासिक जीत का मार्ग प्रशस्त किया।

संगठनात्मक कौशल: मुकुल रॉय TMC के संगठनात्मक ढांचे के मुख्य वास्तुकार थे। उन्होंने राज्य भर में पार्टी की जड़ें मजबूत कीं, कार्यकर्ताओं का एक मजबूत नेटवर्क बनाया और चुनावी रणनीति तैयार की।

उनकी संगठनात्मक कुशलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2011 में TMC ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 184 सीटें जीती थीं – एक भूस्खलन जीत।

रेल मंत्री के रूप में योगदान

मुकुल रॉय राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय रहे। दूसरी यूपीए सरकार (2009-2014) में उन्होंने पहले शिपिंग मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया। बाद में उन्हें रेल मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया। जब 2011 में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के लिए रेल मंत्री पद से इस्तीफा दिया, तो उन्होंने चाहा कि TMC के पास रेल मंत्रालय बना रहे।

ममता बनर्जी ने व्यक्तिगत रूप से तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुकुल रॉय को रेल मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार देने की सिफारिश की। हालांकि वे पूर्ण रेल मंत्री नहीं बने, लेकिन राज्य मंत्री के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। रेल मंत्रालय में रहते हुए मुकुल रॉय ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए और पश्चिम बंगाल के लिए कई रेल परियोजनाओं को मंजूरी दिलाई।

TMC से BJP में बड़ा उलटफेर

मुकुल रॉय की राजनीतिक यात्रा में 2017 एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। ममता बनर्जी के इतने करीबी रहे मुकुल रॉय ने अचानक TMC से दूरी बना ली। 25 सितंबर 2017 को उन्होंने तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। पार्टी ने उन्हें पार्टी-विरोधी गतिविधियों के लिए छह साल के लिए निलंबित कर दिया। 11 अक्टूबर 2017 को उन्होंने अपनी राज्यसभा सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का फैसला किया। 2017 से 2021 तक वे BJP के साथ रहे।

TMC छोड़ने के कई कारण बताए गए:

  • ममता बनर्जी के साथ व्यक्तिगत मतभेद

  • पार्टी में उनकी घटती भूमिका

  • भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव से असंतोष

  • सारदा चिट फंड घोटाले में CBI पूछताछ का दबाव

BJP में शामिल होने के बाद मुकुल रॉय ने पश्चिम बंगाल में पार्टी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कई TMC नेताओं को BJP में शामिल होने के लिए राजी किया।

फिर TMC में वापसी

Bengal News - Mukul Roy Photo
Bengal News – Mukul Roy Photo

2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मुकुल रॉय ने BJP उम्मीदवार के रूप में कृष्णनगर उत्तर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। हालांकि, चुनाव परिणामों में BJP को TMC के मुकाबले करारी हार का सामना करना पड़ा। TMC ने 294 में से 213 सीटें जीतीं, जबकि BJP 77 सीटों पर सिमट गई। इस हार के बाद BJP में आंतरिक कलह शुरू हो गई।

चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद, 11 जून 2021 को मुकुल रॉय ने एक बड़ा राजनीतिक करवट लिया। वे अपने बेटे के साथ ममता बनर्जी की उपस्थिति में फिर से तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। यह घर वापसी बंगाल की राजनीति में एक बड़ी खबर थी। कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे BJP के लिए एक बड़ा झटका बताया।

मुकुल रॉय की TMC में वापसी के बाद, कई अन्य नेताओं ने भी BJP छोड़कर TMC में शामिल होने का फैसला किया।

हाईकोर्ट ने समाप्त की विधायक सदस्यता

13 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने दलबदल के आधार पर मुकुल रॉय की विधायक सदस्यता समाप्त कर दी। कोर्ट ने माना कि मुकुल रॉय ने BJP उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता था, लेकिन बाद में TMC में शामिल हो गए। यह दलबदल विरोधी कानून का उल्लंघन था।

यह फैसला मुकुल रॉय के लिए एक बड़ा झटका था। हालांकि, उस समय तक उनका स्वास्थ्य पहले से ही बिगड़ चुका था और वे सक्रिय राजनीति से लगभग दूर हो चुके थे।

सारदा चिट फंड मामले में CBI पूछताछ

मुकुल रॉय के राजनीतिक करियर में एक विवादास्पद पहलू सारदा चिट फंड घोटाले से उनका संबंध था। सारदा समूह एक पोंजी स्कीम चला रहा था जिसने लाखों निवेशकों को ठगा। जब यह घोटाला सामने आया, तो कई राजनेताओं के नाम उभरे जो कथित तौर पर इस कंपनी से फंडिंग ले रहे थे।

CBI ने इस मामले की जांच के दौरान मुकुल रॉय से कई बार पूछताछ की। हालांकि, उन पर कोई औपचारिक आरोप नहीं लगाया गया। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि CBI पूछताछ का दबाव भी मुकुल रॉय के TMC छोड़ने के कारणों में से एक था।

Bengal News: बंगाल राजनीति ने खोया एक रणनीतिकार

मुकुल रॉय के निधन के साथ पश्चिम बंगाल की राजनीति ने एक अनुभवी रणनीतिकार को खो दिया है। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने बंगाल की राजनीति को गहराई से समझा और उसे आकार देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उनकी संगठनात्मक क्षमता, रणनीतिक सोच और जमीनी स्तर पर काम करने की कला ने उन्हें एक अलग पहचान दी। TMC की सफलता में उनका योगदान अविस्मरणीय है। हालांकि उनके राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव आए, एक पार्टी से दूसरी पार्टी में गए, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ और कौशल पर कभी सवाल नहीं उठा।

मुकुल रॉय की मृत्यु के साथ एक युग का अंत हो गया है। बंगाल की राजनीति में उनकी जगह भरना आसान नहीं होगा।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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