Budget 2026: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को संसद में आम बजट पेश करने जा रही हैं। इस बजट से देश के विभिन्न क्षेत्रों को बड़ी उम्मीदें हैं। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच रक्षा बजट एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते समय और नई चुनौतियों को देखते हुए भारत को अपने रक्षा बजट में पर्याप्त वृद्धि करनी चाहिए। उनकी मांग है कि देश के कुल रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के कम से कम 3 प्रतिशत तक बढ़ाया जाना चाहिए।
बदल चुकी है आधुनिक युद्ध की तस्वीर
विशेषज्ञों का कहना है कि पारंपरिक युद्ध का स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। आज की जंग केवल सीमा पर सैनिकों और हथियारों तक सीमित नहीं रह गई है। तेजी से बढ़ रहे भू-राजनीतिक तनाव, प्रौद्योगिकी आधारित युद्ध और नई किस्म की चुनौतियां सामने आ रही हैं। भारत की सुरक्षा चिंताएं अब पारंपरिक खतरों से आगे बढ़कर साइबर युद्ध, अंतरिक्ष क्षेत्र की सुरक्षा और हाइब्रिड चुनौतियों तक विस्तारित हो गई हैं। ऐसे में रक्षा तैयारियों में निवेश बढ़ाना जरूरी हो गया है।
रक्षा बजट में लगातार हो रही है बढ़ोतरी

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत का कुल रक्षा खर्च लगातार बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2015-16 में कुल रक्षा खर्च करीब 2.94 लाख करोड़ रुपए था जो बढ़कर 2025-26 में 6.81 लाख करोड़ रुपए हो गया है। यह दोगुने से भी अधिक की वृद्धि है। इस आंकड़े से साफ है कि सरकार देश की रक्षा को प्राथमिकता दे रही है और लगातार इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रही है।
पूंजीगत खर्च में भी दर्ज हुई तेज वृद्धि
रक्षा पूंजीगत खर्च यानी कैपिटल एक्सपेंडिचर में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। यह वह खर्च है जो सेना के आधुनिकीकरण और नए हथियारों की खरीद के लिए किया जाता है। वित्तीय वर्ष 2015-16 में यह 83,614 करोड़ रुपए था जो 2025-26 में बढ़कर 1.92 लाख करोड़ रुपए हो गया। यह वृद्धि दर्शाती है कि सरकार सेना को आधुनिक हथियारों और उपकरणों से लैस करने पर जोर दे रही है।
जीडीपी के अनुपात में आई है कमी
हालांकि जब रक्षा खर्च को देश की अर्थव्यवस्था के आकार यानी जीडीपी के अनुपात में देखा जाता है तो एक चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। पिछले एक दशक में नॉमिनल जीडीपी के हिस्से के रूप में रक्षा खर्च में गिरावट आई है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में कुल रक्षा खर्च जीडीपी का करीब 2.4 प्रतिशत था। लेकिन 2024-25 के संशोधित अनुमान और 2025-26 के बजट अनुमान में यह अनुपात घटकर केवल 1.9 प्रतिशत रह गया है।
पूंजीगत व्यय का प्रतिशत रहा स्थिर
इसी अवधि के दौरान रक्षा पूंजीगत व्यय जीडीपी के लगभग 0.5 से 0.6 प्रतिशत के बीच स्थिर बना रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि जीडीपी के अनुपात में यह कमी चिंता का विषय है। देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ रक्षा खर्च का अनुपात भी बढ़ना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
विशेषज्ञों की चिंता और सुझाव
कई रक्षा विशेषज्ञों के लिए जीडीपी के अनुपात में रक्षा खर्च की गिरावट का यह रुझान गंभीर चिंता का कारण बन गया है। उनका कहना है कि भारत के रक्षा बजट को बढ़ाने के लिए बेहद मजबूत कारण मौजूद हैं। विशेष रूप से पूंजीगत खर्च में वृद्धि की तत्काल आवश्यकता है। विशेषज्ञों ने तर्क दिया है कि कुल रक्षा खर्च को नॉमिनल जीडीपी के कम से कम 3 प्रतिशत तक बढ़ाया जाना चाहिए और इस स्तर को बनाए रखना चाहिए।
सरकारी खर्च में बढ़नी चाहिए हिस्सेदारी
विशेषज्ञों का यह भी सुझाव है कि भारत सरकार के कुल खर्च में रक्षा पूंजीगत व्यय की हिस्सेदारी लगातार बढ़नी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जैसे जैसे जीडीपी बढ़ती है, एक स्थिर या थोड़े कम प्रतिशत का मतलब भी एक बड़े निरपेक्ष रक्षा बजट से हो सकता है। फिर भी उनका जोर इस बात पर है कि प्रतिशत के रूप में भी वृद्धि जरूरी है।
दुनिया में पांचवें नंबर पर भारत
सैन्य खर्च के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष 10 देशों में शामिल है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी सिप्री के आंकड़ों के अनुसार भारत ने 2024 में सेना पर 86 बिलियन डॉलर खर्च किए थे। यह रकम दुनिया में पांचवीं सबसे अधिक है। इससे पता चलता है कि भारत अपनी रक्षा तैयारियों पर गंभीर है और इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण निवेश कर रहा है।
क्यों जरूरी है रक्षा खर्च बढ़ाना
विशेषज्ञों के अनुसार रक्षा खर्च बढ़ाने की जरूरत कई कारणों से है। पहला, भारत की सीमाओं पर लगातार तनाव बना हुआ है। दूसरा, पड़ोसी देश अपनी सैन्य क्षमताएं बढ़ा रहे हैं। तीसरा, आधुनिक हथियार और तकनीक बेहद महंगी होती जा रही है। चौथा, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र की रक्षा के लिए नए निवेश चाहिए। पांचवां, सेना का आधुनिकीकरण जरूरी है ताकि भविष्य की चुनौतियों का सामना किया जा सके।
आधुनिकीकरण की चुनौती
भारतीय सशस्त्र बलों के सामने आधुनिकीकरण की बड़ी चुनौती है। पुराने हथियारों और उपकरणों को बदलने की जरूरत है। नई पीढ़ी के लड़ाकू विमान, टैंक, पनडुब्बियां, मिसाइल प्रणालियां और अन्य आधुनिक हथियारों की खरीद आवश्यक है। इन सबके लिए पर्याप्त बजट चाहिए। अगर पूंजीगत व्यय में पर्याप्त वृद्धि नहीं होती तो आधुनिकीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।
स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा
सरकार आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दे रही है। मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत देश में ही हथियारों और रक्षा उपकरणों का निर्माण किया जा रहा है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी बल्कि रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। लेकिन स्वदेशी रक्षा उत्पादन के लिए भी अनुसंधान और विकास में पर्याप्त निवेश चाहिए।
साइबर सुरक्षा पर ध्यान देना जरूरी
आधुनिक युद्ध में साइबर सुरक्षा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। दुश्मन देश साइबर हमलों से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकते हैं। इसलिए साइबर सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करना जरूरी है। इसके लिए विशेष बजट आवंटन और तकनीकी विशेषज्ञों की जरूरत है।
अंतरिक्ष क्षेत्र की सुरक्षा भी अहम
अंतरिक्ष तेजी से एक नया युद्ध क्षेत्र बन रहा है। उपग्रहों की सुरक्षा और अंतरिक्ष में निगरानी क्षमताएं विकसित करना जरूरी है। कई देश पहले ही अंतरिक्ष में सैन्य क्षमताएं विकसित कर चुके हैं। भारत को भी इस दिशा में तेजी से काम करना होगा और इसके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने होंगे।
सैनिकों के कल्याण पर भी जोर
रक्षा बजट में सैनिकों के वेतन, पेंशन और कल्याण पर भी पर्याप्त खर्च होता है। देश की सीमाओं पर कठिन परिस्थितियों में तैनात सैनिकों के लिए बेहतर सुविधाएं जरूरी हैं। उनके परिवारों के कल्याण पर भी ध्यान देना चाहिए। शहीद सैनिकों के परिवारों के लिए पर्याप्त मुआवजा और सुविधाएं सुनिश्चित करनी चाहिए।
रक्षा खर्च बनाम विकास खर्च
कुछ लोगों का तर्क है कि रक्षा पर अधिक खर्च करने से विकास कार्यों के लिए कम पैसा बचेगा। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षा और विकास दोनों साथ साथ चलने चाहिए। अगर देश सुरक्षित नहीं होगा तो विकास भी संभव नहीं है। इसलिए रक्षा और विकास दोनों क्षेत्रों में संतुलित निवेश जरूरी है।
पड़ोसी देशों का रक्षा खर्च
भारत के पड़ोसी देश भी अपने रक्षा खर्च में लगातार वृद्धि कर रहे हैं। चीन का रक्षा बजट दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा है और वह लगातार बढ़ रहा है। पाकिस्तान भी अपनी आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद रक्षा पर भारी खर्च कर रहा है। ऐसे में भारत को भी अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना जरूरी है।
रणनीतिक स्वायत्तता के लिए जरूरी
पर्याप्त रक्षा बजट रणनीतिक स्वायत्तता के लिए भी जरूरी है। अगर देश को हथियारों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ेगा तो संकट के समय दिक्कत हो सकती है। स्वदेशी रक्षा उत्पादन से रणनीतिक स्वायत्तता मिलती है लेकिन इसके लिए पर्याप्त निवेश चाहिए।
बजट 2026 से उम्मीदें
रक्षा विशेषज्ञों को उम्मीद है कि आगामी बजट में रक्षा क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाएगी। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव और सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए रक्षा बजट में पर्याप्त वृद्धि की उम्मीद है। विशेष रूप से पूंजीगत व्यय में बढ़ोतरी की जरूरत है ताकि सेना का आधुनिकीकरण तेज गति से हो सके।
Budget 2026: 1 फरवरी को होगा फैसला
अंततः यह देखना होगा कि 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रक्षा क्षेत्र के लिए कितना बजट आवंटित करती हैं। विशेषज्ञों की मांग है कि रक्षा बजट को जीडीपी के 3 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए लेकिन सरकार का फैसला विभिन्न कारकों को ध्यान में रखकर होगा। देश की सुरक्षा जरूरतों और आर्थिक स्थिति के बीच संतुलन बनाना होगा। बजट भाषण में इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकार का रुख साफ हो जाएगा।



