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Emergency 1975: जब इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र पर लगाया था ताला, अभिव्यक्ति की आजादी पर था सबसे बड़ा खतरा

Emergency 1975: आज से ठीक 50 साल पहले, 25 जून 1975 को भारत के इतिहास में एक काला दिन आया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा की थी। इस दौरान 21 महीनों तक लोकतंत्र को कुचल दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगी, विपक्षी नेताओं को जेल में डाला गया, और आम लोगों के अधिकार छीन लिए गए। बिहार के जयप्रकाश नारायण (JP) ने इसके खिलाफ बड़ा आंदोलन चलाया।

Emergency 1975: आपातकाल क्यों लगाया गया?

1975 में इंदिरा गांधी की कुर्सी खतरे में थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 12 जून 1975 को उनके 1971 के रायबरेली चुनाव को गलत ठहराया। कोर्ट ने उन पर 6 साल तक चुनाव लड़ने की रोक लगा दी। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार और गुजरात में छात्र आंदोलन तेज हो गए। इंदिरा ने इसे “आंतरिक अशांति” बताया और राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लगवाया। रातों-रात बिजली काटकर अखबारों को छपने से रोका गया। जेपी, मोरारजी देसाई, और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं को जेल में डाल दिया गया।

प्रेस की आजादी पर हमला

आपातकाल में प्रेस की आवाज दबा दी गई। दिल्ली में अखबारों की बिजली काट दी गई। इंडियन एक्सप्रेस और स्टेट्समैन ने अपने संपादकीय पेज खाली छोड़कर विरोध जताया। 200 से ज्यादा पत्रकारों को जेल में डाला गया। चार न्यूज एजेंसियों को मिलाकर “समाचार” बनाया गया, जो सिर्फ सरकार की बातें छापता था। विदेशी पत्रकारों को देश छोड़ने को कहा गया। बिहार में भी प्रेस सेंसरशिप का बड़ा असर पड़ा, जहां जेपी के आंदोलन की खबरें छप नहीं पाईं।

जनता ने दिया जवाब

आपातकाल के दौरान संजय गांधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी और झुग्गी हटाने जैसे कदम उठाए गए। इससे लोग नाराज हो गए। 1977 में इंदिरा ने चुनाव कराए, लेकिन जनता ने उन्हें हराकर जवाब दिया। जनता पार्टी की सरकार बनी, और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। 44वें संशोधन ने आपातकाल के दुरुपयोग को रोकने के लिए संविधान बदला।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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