Jharkhand News: झारखंड के पलामू जिले के एक छोटे से गांव पंचपोखरी में रविवार की शाम एक खबर आई जिसने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया। झारखंड सशस्त्र पुलिस के जवान परशुराम कुमार सिंह, जो पश्चिम बंगाल में चुनाव ड्यूटी पर तैनात थे, की ब्रेन हेमरेज से मौत हो गई। वह 46 साल के थे। परिवार का आरोप है कि तबीयत खराब होने के बावजूद उन्हें न तो ड्यूटी से हटाया गया, न ही समय पर सही इलाज दिया गया। और यही लापरवाही उनकी जान ले गई।
यह खबर सिर्फ एक परिवार के दर्द की नहीं है। यह उन हजारों पुलिसकर्मियों की स्थिति पर सवाल उठाती है जो चुनाव के दौरान राज्य से बाहर भेजे जाते हैं और वहाँ उनकी सेहत और सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी की नहीं होती।
Jharkhand News: कौन थे परशुराम कुमार सिंह
परशुराम कुमार सिंह पलामू जिले के हैदरनगर थाना क्षेत्र के पंचपोखरी गांव के रहने वाले थे। वह जैप-8 लेस्लीगंज में पदस्थापित थे, यानी झारखंड आर्म्ड पुलिस की आठवीं बटालियन में काम करते थे। एक आम सरकारी जवान की तरह उनकी जिंदगी थी , ड्यूटी, परिवार और घर। लेकिन पिछले कुछ हफ्ते उनके लिए बेहद थकान भरे रहे।
चुनाव के मौसम में उन्हें पहले असम भेजा गया था। वहाँ से जब वह लौटे तो परिवार को साफ दिख रहा था कि वह ठीक नहीं हैं। लेकिन विभाग ने बिना ज्यादा वक्त दिए उन्हें फिर से पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में चुनाव ड्यूटी पर रवाना कर दिया। और बाद में उन्हें उत्तर 24 परगना में भी तैनात किया गया।
भाई: कहते रहे बीमार हूँ, कोई नहीं सुना
परशुराम के बड़े भाई जयराम सिंह ने बताया कि असम से लौटने के बाद से ही उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। वह खुद अपने अधिकारियों को यह बात बताते रहे। बार-बार कहा कि तबीयत खराब है, लेकिन न तो उन्हें बीमार छुट्टी दी गई, न ही ठीक से जाँच कराई गई।
जयराम सिंह के अनुसार रविवार दोपहर करीब दो बजे अचानक परशुराम का फोन बंद हो गया। घर वाले बार-बार कोशिश करते रहे लेकिन संपर्क नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद उनके साथ तैनात अन्य जवानों से पता चला कि उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा है। और शाम करीब तीन बजे फोन आया – डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया है।
जयराम सिंह का कहना है कि अगर समय पर इलाज मिला होता, अगर उनकी बीमारी को गंभीरता से लिया गया होता, तो शायद आज परशुराम जिंदा होते। वह परिवार के लिए मुआवजे और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।
Jharkhand News: पार्थिव शरीर लाने की तैयारी, परिवार टूटा हुआ है

जैसे ही गांव में खबर पहुँची, पंचपोखरी में शोक की लहर दौड़ गई। घर में रोने की आवाजें थमने का नाम नहीं ले रही थीं। पड़ोसी और रिश्तेदार सांत्वना देने के लिए जमा होने लगे, लेकिन जो चला गया वह वापस नहीं आने वाला था।
विभाग और संघ के सदस्य पार्थिव शरीर को पश्चिम बंगाल से लाने के लिए रवाना हो गए। परिजनों को वहाँ जाने से मना किया गया है। सोमवार को पार्थिव शरीर पहले जैप-8 लेस्लीगंज लाया जाएगा और उसके बाद पैतृक गांव पंचपोखरी भेजा जाएगा। सोमवार दोपहर बाद हैदरनगर में उनका अंतिम संस्कार किए जाने की संभावना है।
विभाग ने कारण बताया ब्रेन हेमरेज, परिवार माँग रहा है जाँच
सरकारी स्तर पर मौत का कारण ब्रेन हेमरेज बताया गया है। यह एक गंभीर चिकित्सीय स्थिति है जिसमें दिमाग की नसों में खून का रिसाव होता है। लेकिन परिवार का सवाल यह है कि जब परशुराम पहले से बीमार थे और इसकी जानकारी अधिकारियों को थी, तो उन्हें ड्यूटी पर क्यों रखा गया? उनकी मेडिकल जाँच क्यों नहीं कराई गई?
परिवार पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच की माँग कर रहा है। वह चाहते हैं कि यह साफ हो कि क्या किसी अधिकारी की लापरवाही ने परशुराम की जान ली। अगर ऐसा है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
Jharkhand News: यह पहला मामला नहीं है
चुनाव ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों की मौत या उनकी सेहत से जुड़ी शिकायतें नई नहीं हैं। हर बड़े चुनाव में देश के अलग-अलग राज्यों से पुलिस बल दूसरे राज्यों में भेजे जाते हैं। लंबी दूरी की यात्रा, नई जगह, बदला हुआ मौसम, खाने-पीने की अनिश्चितता और लगातार बिना आराम के काम यह सब मिलकर एक जवान की सेहत पर बड़ा असर डालते हैं।
अगर उस पर पहले से कोई बीमारी है तो खतरा और भी बढ़ जाता है। परशुराम के मामले में यही हुआ। वह असम से लौटकर थके हुए थे, बीमार थे और फिर भी उन्हें चुनाव ड्यूटी पर भेज दिया गया। यह सवाल सिस्टम पर उठता है कि क्या ड्यूटी पर जाने से पहले जवानों की स्वास्थ्य जाँच अनिवार्य नहीं होनी चाहिए?
परिवार की माँग मुआवजा और इंसाफ
जयराम सिंह और बाकी परिवार के लोग सिर्फ शोक में नहीं हैं, वह न्याय भी माँग रहे हैं। उनकी माँग है कि सरकार इस पूरे मामले की जाँच कराए। जो अधिकारी परशुराम की बीमारी को जानते हुए भी उन्हें ड्यूटी पर रखते रहे, उनके खिलाफ कार्रवाई हो।
साथ ही परिवार को उचित सरकारी मुआवजा मिलना चाहिए और परशुराम के परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए, यह भी परिवार की माँगों में शामिल है। यह माँग हर उस पुलिसकर्मी के परिवार की माँग है जो ड्यूटी पर शहीद होता है या किसी वजह से जान गँवाता है।
झारखंड सरकार और प्रशासन की चुप्पी पर नजरें टिकी हैं
अभी तक झारखंड सरकार की तरफ से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। पलामू के जिला प्रशासन ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। ऐसे में परिवार का दर्द और बढ़ जाता है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि सिस्टम उनकी बात नहीं सुन रहा।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों से भी उम्मीद की जा रही है कि वह इस मामले को उठाएंगे। परशुराम कुमार सिंह एक सरकारी जवान थे जिन्होंने ड्यूटी से कभी मुँह नहीं मोड़ा। उनकी मौत के बाद सरकार का यह फर्ज बनता है कि उनके परिवार को न्याय दिलाए।
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