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मालेगांव केस ने खोल दी जांच एजेंसियों की नाकामी की पोल

नई दिल्ली। साल 2006 में हुए मालेगांव बम धमाके के मामले में मुम्बई उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी दरअसल एक फैसला नहीं, बल्कि एक सख्त अभियोग है,हमारी जांच एजेंसियों के खिलाफ।अदालत ने साफ कहा कि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने “बिल्कुल नई कहानी” पेश कर दी, जो पहले महाराष्ट्र एंटी टेररिस्ट स्क्वायड और केंद्रीय जांच ब्यूरो की (सीबीआई) की जांच से पूरी तरह उलट थी।

एक ही घटना लेकिन तीन एजेंसियाँ और तीन अलग-अलग सच्चाइयाँ।यह केवल विरोधाभास नहीं है, यह विफलता का प्रमाण है।2006 के विस्फोट में 37 लोगों की जान गई। शुरुआती जांच में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया से जुड़े लोगों को आरोपी बताया गया, जिसे बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने भी पुष्ट किया।

फिर मामला नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी के पास गया और पूरी दिशा बदल गई। गवाह मुकर गए, बयान बदल गए, और कहानी भी बदल गई।अदालत ने इसे गंभीरता से लिया और कहा कि यह जांच “नए ठोस सबूतों” पर नहीं, बल्कि “मुकरे हुए बयानों” पर खड़ी है। यानी जांच नहीं, व्याख्या बदली गई

सबसे चिंताजनक बात अदालत की यह टिप्पणी है कि मामला “डेड एंड” पर पहुँच गया। इसका सीधा अर्थ है कि इतने बड़े आतंकी हमले के बाद भी, सिस्टम सच्चाई तक नहीं पहुँच पाया। यह सिर्फ एक केस की नाकामी नहीं है। यह उस पूरे ढांचे की कमजोरी है, जिसमें जांच एजेंसियाँ काम करती हैं।

क्या वजह है कि एक एजेंसी जिसको दोषी मानती है,दूसरी उसे पूरी तरह निर्दोष बताती है?क्या यह पेशेवर कमी है? या फिर दबाव, पूर्वाग्रह और एजेंडा?उच्च न्यायालय ने जिस तरह “सुनी-सुनाई बातों” और अविश्वसनीय गवाहों पर सवाल उठाया है, वह एक गहरी समस्या की ओर इशारा करता है कि हमारे यहां जांच अक्सर सबूत से नहीं, बल्कि कहानी से शुरू होती है। और जब कहानी बदलती है, तो “सत्य” भी बदल जाता है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान किसे होता है? उन परिवारों को, जिन्होंने अपने लोगों को खोया और आज तक यह नहीं जान पाए कि असली दोषी कौन है। और उससे भी बड़ा नुकसान उस भरोसे को होता है, जो नागरिक राज्य की संस्थाओं पर करते हैं।

क्योंकि अगर जांच एजेंसियाँ ही सच तक नहीं पहुँच पाएंगी, तो न्याय केवल एक प्रक्रिया बनकर रह जाएगा परिणाम नहीं।मालेगांव केस ने एक कड़वा सच सामने रखा है कि हमारी जांच एजेंसियाँ सिर्फ चुनौती से नहीं जूझ रहीं,वह अपनी विश्वसनीयता भी खो रही हैं।और जब जांच पर भरोसा खत्म होता है,तो न्याय अपने आप ही संदिग्ध हो जाता है।

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