डेस्क: यह फैसला महागठबंधन की एकजुटता को मजबूत करने के लिए लिया गया, जहां संतोष सहनी को आरजेडी प्रत्याशी के पक्ष में समर्थन देने का ऐलान किया गया। शुरू में यह फ्रेंडली फाइट के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन टाइट मुकाबले की आशंका में सहनी बंधुओं ने एकजुट होकर विपक्षी एनडीए को चुनौती देने का संकल्प लिया।
गौरा-बौराम सीट बिहार के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक है, जहां निषाद समुदाय की बड़ी आबादी रहती है। मुकेश सहनी, जो स्वयं निषाद समुदाय के प्रमुख चेहरे हैं, ने 2020 के चुनाव में इसी सीट से जीत हासिल की थी। इस बार उन्होंने अपने भाई संतोष को उतारा था, लेकिन मतदान से पहले सर्वे और फीडबैक ने संकेत दिया कि मुकाबला कांटे का हो सकता है। आरजेडी ने यहां अपने उम्मीदवार के रूप में स्थानीय नेता को उतारा था, और वीआईपी का समर्थन न मिलने से गठबंधन कमजोर पड़ सकता था।
मुकेश सहनी ने नाम वापसी के बाद संवाददाताओं से बातचीत में कहा, “हमारा परिवार हमेशा बिहार की जनता के हित में खड़ा रहा है। फ्रेंडली फाइट का इरादा था, लेकिन जब मैदान टाइट हो गया, तो हमने फैसला लिया कि गठबंधन की ताकत बढ़ानी होगी। संतोष भाई का नाम वापस लेना महागठबंधन के लिए एक मजबूत संदेश है। निषाद भाइयों का वोट एनडीए को नहीं जाने देंगे।” यह बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया, क्योंकि सहनी बंधुओं की यह चाल एनडीए के लिए झटका साबित हो सकती है।
इस सीट पर निषाद, मुस्लिम और यादव वोटरों का प्रभाव है, जो कुल 2.5 लाख मतदाताओं में से 60 प्रतिशत से अधिक हैं। 2020 में मुकेश सहनी ने बीजेपी के खिलाफ कड़ा मुकाबला लड़ा था, और इस बार भी एनडीए ने अपने मजबूत दावेदार उतारे हैं। लेकिन संतोष सहनी की नाम वापसी से आरजेडी को निषाद वोटों का बड़ा हिस्सा मिलने की उम्मीद है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम तेजस्वी यादव की रणनीति को मजबूत करेगा।
आरजेडी के प्रदेश प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने न्यूज मीडिया किरण से कहा, “मुकेश जी का यह फैसला महागठबंधन की एकता का प्रतीक है। गौरा-बौराम में हमारा प्रत्याशी अब निश्चिंत होकर प्रचार कर सकेगा। निषाद समाज का पूरा समर्थन हमें मिलेगा, और यह सीट महागठबंधन के खाते में आएगी।” वहीं, बीजेपी के स्थानीय नेता ने इसे ‘ड्रामा’ करार देते हुए कहा, “सहनी बंधु तो हमेशा ऐसे ही खेलते रहते हैं। वोटर बुद्धिमान हैं, वे गठबंधन की इन चालों को समझते हैं।”
गुरुवार को हुए मतदान में 68 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई, जो पिछले चुनाव से 5 प्रतिशत अधिक है। मतदान शांतिपूर्ण रहा, लेकिन कुछ जगहों पर EVM को लेकर मामूली विवाद की खबरें आईं। निर्वाचन आयोग के अनुसार, गौरा-बौराम में कुल 2,45,678 मतदाता हैं, जिनमें 1,28,456 पुरुष और 1,17,222 महिलाएं शामिल हैं। मतगणना 23 नवंबर को होगी, लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि नाम वापसी से आरजेडी का वोट शेयर 10-15 प्रतिशत बढ़ सकता है।
मुकेश सहनी की यह चाल बिहार की राजनीति में भाईचारे और रणनीति का अनोखा उदाहरण पेश करती है। वीआईपी पार्टी, जो 2020 में महागठबंधन का हिस्सा बनी थी, अब फिर से एकजुटता दिखा रही है। नीतीश कुमार सरकार के खिलाफ निषाद समाज में असंतोष बढ़ रहा है, और सहनी बंधु इसे भुनाने की कोशिश में हैं। संतोष सहनी ने नाम वापसी के बाद कहा, “भाई का फैसला मेरे लिए सम्मानजनक है। हमारा लक्ष्य बिहार को मजबूत विपक्ष देना है। आरजेडी के साथ मिलकर हम एनडीए को हरा देंगे।”
बिहार चुनाव में कुल 243 सीटों पर प्रचार का दौर समाप्त हो चुका है, और अब नतीजों का इंतजार है। गौरा-बौराम जैसे सीटें महागठबंधन के लिए ट्रेलर साबित हो सकती हैं। मुकेश सहनी की लोकप्रियता निषाद बेल्ट में मजबूत है, जहां 40 से अधिक सीटें प्रभावित हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह रणनीति कामयाब रही, तो वीआईपी को अन्य सीटों पर भी फायदा मिलेगा।
निष्कर्ष:गौरा-बौराम की यह घटना बिहार चुनाव को और रोचक बना रही है। मुकेश सहनी का भाई को नाम वापस कराना न केवल पारिवारिक एकजुटता दिखाता है, बल्कि राजनीतिक दूरदर्शिता का भी प्रमाण है। महागठबंधन को इससे मजबूती मिलेगी, जबकि एनडीए को नुकसान। अंततः, वोटर ही तय करेंगे कि यह एग्जिट किसके पक्ष में जाता है। बिहार की जनता बदलाव चाहती है, और ऐसे फैसले उस दिशा में कदम हैं। न्यूज मीडिया किरण लगातार अपडेट्स लाता रहेगा।



