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झारखंड भाजपा में टली बगावत, चंपई सोरेन के चहेतों को समर्थन नहीं मिला, सरायकेला जिला इकाई ने दिखाई ताकत

Jharkhand Politics: झारखंड में नगर निकाय चुनाव की सरगर्मी के बीच भारतीय जनता पार्टी के भीतर सरायकेला-खरसावां जिले को लेकर एक बड़ा राजनीतिक संकट टल गया है। पूर्व मुख्यमंत्री और 2024 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा में शामिल हुए चंपई सोरेन के चहेते प्रत्याशियों को पार्टी का औपचारिक समर्थन देने की कोशिश अंतिम समय में रुक गई। अगर यह समर्थन मिल जाता तो जिला इकाई में बगावती तेवर दिख सकते थे और कई नेता सामूहिक इस्तीफा देने की तैयारी में थे।

चंपई के पसंदीदा प्रत्याशी सानंद आचार्य और सुनीता लियांगी

Jharkhand Politics
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सरायकेला नगर पंचायत से सानंद आचार्य और आदित्यपुर नगर निगम से सुनीता लियांगी चुनाव लड़ रही हैं। दोनों ही चंपई सोरेन के करीबी माने जाते हैं। चंपई ने पिछले कुछ महीनों में इन दोनों को पार्टी टिकट और संगठनात्मक समर्थन दिलाने की पूरी कोशिश की। लेकिन सरायकेला जिला भाजपा इकाई ने साफ संकेत दे दिए कि अगर इन दोनों को आधिकारिक समर्थन दिया गया तो जिला कमेटी के अधिकांश पदाधिकारी इस्तीफा दे सकते हैं।

प्रदेश नेतृत्व तक यह संदेश मजबूती से पहुंचाया गया। एक कद्दावर नेता ने अपने समर्थकों के साथ मिलकर प्रदेश स्तर पर दबाव बनाया। उनका तर्क था कि चंपई सोरेन के गुट को ज्यादा तवज्जो देने से पार्टी का स्थानीय संगठन कमजोर होगा। जमीनी स्तर पर नुकसान होगा और कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ेगा।

प्रदेश नेतृत्व ने जिला इकाई की बात को तरजीह दी

प्रदेश भाजपा नेतृत्व ने स्थिति को भांपते हुए अंतिम समय में कदम पीछे खींच लिया। सानंद आचार्य और सुनीता लियांगी को औपचारिक रूप से भाजपा का समर्थन नहीं दिया गया। इससे चंपई सोरेन खेमे में नाराजगी की लहर दौड़ गई है। पार्टी में शामिल होने के बाद यह पहला बड़ा मौका था जब चंपई अपने समर्थकों को संगठन का पूरा बैकअप दिलाने की उम्मीद कर रहे थे।

चंपई सोरेन के लिए राजनीतिक विकल्प सीमित

चंपई सोरेन के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगे उनका राजनीतिक रास्ता क्या होगा? झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) में उनकी वापसी की संभावना लगभग खत्म मानी जा रही है। झामुमो में रहते हुए भी उन पर यह आरोप लगता रहा कि वे पार्टी अनुशासन से ज्यादा अपने व्यक्तिगत आधार को मजबूत करने पर ध्यान देते थे। कोल्हान क्षेत्र में झामुमो के कई नेताओं से उनके रिश्ते कभी सहज नहीं रहे।

भाजपा में आने के बाद भी चंपई सोरेन का रवैया ज्यादा नहीं बदला। वे एक गुट के साथ आगे बढ़ने में विश्वास रखते हैं। लेकिन भाजपा जैसी बड़ी पार्टी में यह तरीका कई नेताओं को रास नहीं आ रहा। नगर निकाय चुनाव में अपने चहेतों को समर्थन न दिला पाने से उनकी असंतुष्टि इसी टकराव का नतीजा मानी जा रही है।

Jharkhand Politics: नगर निकाय चुनाव में भाजपा की रणनीति

झारखंड में नगर निकाय चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं। भाजपा स्थानीय स्तर पर मजबूत प्रत्याशी उतारने की कोशिश में जुटी है। पार्टी नहीं चाहती कि चंपई सोरेन के गुट को ज्यादा तवज्जो देने से जिला इकाई में असंतोष फैले। सरायकेला जैसे संवेदनशील जिले में स्थानीय नेताओं की बात को महत्व देना पार्टी के लिए जरूरी हो गया।

इस फैसले से भाजपा में बगावत टल गई है। लेकिन चंपई सोरेन खेमे में नाराजगी बढ़ी है। आने वाले दिनों में यह असंतोष किस रूप में सामने आता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

झारखंड की राजनीति में चंपई सोरेन एक अहम नाम बने हुए हैं। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने कई मौकों पर पार्टी के लिए काम किया। लेकिन संगठनात्मक स्तर पर उन्हें वह जगह नहीं मिल पा रही है, जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे। नगर निकाय चुनाव इस मामले में एक टेस्ट केस साबित हुआ है।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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