Shah Bano Case: बॉलीवुड की आने वाली फिल्म ‘हक’ ने शाह बानो केस को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। यह फिल्म यामी गौतम और इमरान हाशमी की है, जो 7 नवंबर को रिलीज होगी। शाह बानो केस 1985 का एक ऐतिहासिक मामला है, जिसमें मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद गुजारा भत्ता मिलने का हक मिला। यह केस धर्म, कानून और महिलाओं के अधिकारों पर बड़ा बहस छेड़ने वाला था। फिल्म में शाह बानो की कहानी को दिखाया गया है, लेकिन शाह बानो की बेटी ने परमिशन न लेने पर कोर्ट में केस कर दिया है। यह फिल्म सेकुलरिज्म, अल्पसंख्यक अधिकारों और यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर चर्चा जगाएगी।
शाह बानो केस का इतिहास: एक गरीब महिला की न्याय की लड़ाई

शाह बानो बेगम इंदौर की रहने वाली थीं। 1978 में, 62 साल की उम्र में उनके पति मोहम्मद अहमद खान ने उन्हें तलाक दे दिया। शादी को 43 साल हो चुके थे। खान ने तीन तलाक दिया और कहा कि मुस्लिम कानून के मुताबिक, इद्दत पीरियड (तलाक के बाद तीन महीने) तक ही गुजारा देना है। उन्होंने कुछ महीने पैसे दिए, फिर बंद कर दिए। शाह बानो के पास पांच बच्चे थे और कोई कमाई नहीं। उन्होंने CrPC की धारा 125 के तहत कोर्ट में गुजारा भत्ता मांगा। यह कानून सभी धर्मों के लिए एक जैसा है, जो पत्नी को भूखा न रहने का हक देता है।
लोकल कोर्ट ने 25 रुपये महीना गुजारा देने का आदेश दिया। खान ने अपील की, तो मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 179 रुपये कर दिया। फिर सुप्रीम कोर्ट गया। 23 अप्रैल 1985 को चीफ जस्टिस वाई.वी. चंद्रचूड़ की बेंच ने फैसला दिया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को इद्दत के बाद भी गुजारा मिलेगा। कोर्ट ने कहा, कुरान में भी पति का फर्ज है। यह कानून धर्म से ऊपर है। कोर्ट ने UCC पर दुख जताया कि यह संविधान का आर्टिकल 44 है, लेकिन लागू नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और मुस्लिम संगठनों का विरोध
- फैसले पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह मुस्लिम कानून पर हमला है। बड़े-बड़े प्रोटेस्ट हुए।
- राजीव गांधी सरकार पर दबाव पड़ा। 1986 में मुस्लिम वुमन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट पास किया गया। इसने कहा कि गुजारा सिर्फ इद्दत तक। उसके बाद रिश्तेदारों या वक्फ बोर्ड की जिम्मेदारी। यह फैसले को पलटने जैसा था।
- शाह बानो के वकील डैनियल लतीफी ने 1986 एक्ट को चुनौती दी। 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इद्दत में ‘फेयर प्रोविजन’ का मतलब लाइफटाइम गुजारा के लिए एकमुश्त रकम। इससे शाह बानो का मूल फैसला बचा रहा।
- 2024 में मोहम्मद अब्दुल समद केस में कोर्ट ने साफ कहा कि 1986 एक्ट CrPC के अलावा है। महिलाएं दोनों चुन सकती हैं।
मुस्लिम महिलाओं के लिए क्या मतलब? आज के कानूनों से कनेक्शन
- शाह बानो केस ने दिखाया कि सेकुलर कानून और पर्सनल लॉ में टकराव होता है। इससे मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद आर्थिक सुरक्षा मिली।
- 1986 एक्ट ने पहले सीमित किया, लेकिन 2001 और 2024 के फैसलों ने मजबूत किया। अब तलाकशुदा महिला CrPC के तहत सीधे गुजारा मांग सकती है।
- यह केस बाबरी मस्जिद विवाद और राजनीति से जुड़ा, जहां UCC की बात हुई।
- 2019 के ट्रिपल तलाक कानून ने तलाक रोकने में मदद की, लेकिन गुजारा अभी भी अहम है।
महिलाओं को मिलने वाले फायदे और भविष्य की उम्मीद
इस केस से गरीब मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिला। दुर्दशा रोकने का कानून मजबूत हुआ। UCC अगर आया, तो सभी धर्मों में एक कानून बनेगा। लेकिन अभी महिलाएं CrPC चुन सकती हैं। शाह बानो की कहानी सिखाती है कि हक के लिए लड़ना जरूरी है। फिल्म ‘हक’ देखकर लोग सोचेंगे कि कानून सबके लिए बराबर हो।
शाह बानो केस आज भी प्रासंगिक है। यह महिलाओं के अधिकारों की मिसाल है। उम्मीद है कि फिल्म से जागरूकता बढ़ेगी। अगर आप भी ऐसी समस्या झेल रही हैं, तो कोर्ट जाएं। न्याय मिलेगा।
Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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