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The Lancet Report 2025: खतरे की घंटी! 83% भारतीय मरीजों पर बेअसर हो रहीं एंटीबायोटिक दवाएं, मामूली चोट भी बन सकती है जानलेवा

The Lancet Report 2025: भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र ने पिछले कुछ दशकों में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन अब एक ऐसा संकट सामने आया है जो इस सारी प्रगति पर पानी फेर सकता है। मेडिकल जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द लांसेट’ (The Lancet) की एक ताज़ा रिपोर्ट ने भारत के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के आंकड़े इतने चौंकाने वाले हैं कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में मामूली संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकते हैं।

इंडिया टीवी की रिपोर्ट और एआईजी हॉस्पिटल्स हैदराबाद के नेतृत्व में किए गए अध्ययन के अनुसार, भारत में 83% रोगियों के शरीर में ऐसे बैक्टीरिया पाए गए हैं जिन पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं हो रहा है। इसे चिकित्सकीय भाषा में ‘मल्टीड्रग रेसिस्टेंस ऑर्गनिज्म’ (MDRO) या ‘सुपरबग’ (Superbug) का खतरा कहा जा रहा है। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है बल्कि एक ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी’ की ओर इशारा करती है।

The Lancet Report 2025: क्या कहती है लांसेट की रिपोर्ट?

यह अध्ययन भारत, इटली, नीदरलैंड और अमेरिका सहित चार देशों में किया गया था। इसमें पाया गया कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (AMR) के मामले में भारत की स्थिति सबसे खराब है।

  • भारत: 83% मरीजों में MDRO पाया गया।
  • इटली: 31.5% मरीज प्रभावित।
  • अमेरिका: 20.1% मरीज।
  • नीदरलैंड: केवल 10.8% मरीज।

इसका सीधा मतलब यह है कि भारत में 10 में से 8 मरीज ऐसे हैं जिनके शरीर में मौजूद बैक्टीरिया पर सामान्य या ‘फर्स्ट लाइन’ एंटीबायोटिक्स बेअसर हैं। ये मरीज किसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल नहीं आए थे, बल्कि रूटीन चेकअप या एंडोस्कोपी जैसी प्रक्रियाओं के लिए आए थे। इसके बावजूद उनके शरीर में इतने खतरनाक बैक्टीरिया का मिलना बताता है कि यह समस्या अब अस्पतालों से निकलकर हमारे समुदाय (Community) और पर्यावरण में फैल चुकी है।

क्यों हो रहा है ऐसा? (Why is this Happening?)

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ‘सुपरबग विस्फोट’ (Superbug Explosion) के केंद्र में है। इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं:

  1. दवाओं का दुरुपयोग (Misuse of Antibiotics): भारत में एंटीबायोटिक्स आसानी से ‘ओवर द काउंटर’ (बिना डॉक्टर की पर्ची के) मिल जाती हैं। हल्का बुखार, जुकाम या वायरल इन्फेक्शन होने पर भी लोग धड़ल्ले से एंटीबायोटिक्स खा लेते हैं।
  2. अधूरा कोर्स: कई बार मरीज डॉक्टर की सलाह के बिना दवा शुरू करते हैं और थोड़ा आराम मिलते ही कोर्स पूरा किए बिना दवा बंद कर देते हैं। इससे बैक्टीरिया मरते नहीं बल्कि और ताकतवर होकर वापस आते हैं।
  3. पोल्ट्री और खेती में उपयोग: मुर्गियों और जानवरों को तेजी से बड़ा करने और बीमारियों से बचाने के लिए उन्हें एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं। यह मांस और दूध के जरिए इंसानों के शरीर में पहुंचता है।
  4. स्वच्छता की कमी: गंदगी और संक्रमण के कारण बैक्टीरिया को पनपने का मौका मिलता है।

क्या है ‘सुपरबग’ का खतरा?

जब बैक्टीरिया पर दवाओं का असर होना बंद हो जाता है, तो उसे ‘रेजिस्टेंस’ कहते हैं। ऐसे बैक्टीरिया को ‘सुपरबग’ कहा जाता है।

  • इलाज मुश्किल: निमोनिया, यूरिन इन्फेक्शन (UTI) और टाइफाइड जैसी सामान्य बीमारियां भी लाइलाज हो सकती हैं।
  • सर्जरी में जोखिम: सिजेरियन डिलीवरी, कैंसर कीमोथेरेपी और अंग प्रत्यारोपण (Organ Transplant) जैसे इलाज बिना प्रभावी एंटीबायोटिक्स के असंभव हो जाएंगे, क्योंकि इसमें संक्रमण का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
  • महंगा इलाज: जब सस्ती और सामान्य दवाएं काम नहीं करतीं, तो मरीजों को महंगी और हाई-डोज़ दवाएं (Last Resort Antibiotics) देनी पड़ती हैं, जिससे इलाज का खर्च कई गुना बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों की चेतावनी

एआईजी हॉस्पिटल्स के अध्यक्ष डॉ. डी. नागेश्वर रेड्डी ने इस रिपोर्ट को भारत के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ बताया है। उनका कहना है, “जब 80% से अधिक स्वस्थ दिखने वाले लोगों में ड्रग-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया पाए जा रहे हैं, तो यह साबित करता है कि खतरा हमारे घरों तक पहुंच चुका है। हमें तत्काल राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत बदलाव करने होंगे।”

आईसीएमआर (ICMR) भी लगातार चेतावनी दे रहा है कि अगर हमने एंटीबायोटिक्स का बेजा इस्तेमाल नहीं रोका, तो हम ‘पोस्ट-एंटीबायोटिक युग’ में चले जाएंगे, जहाँ एक छोटी सी खरोंच भी इंसान की जान ले सकेगी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में हर साल लगभग 58,000 नवजात शिशुओं की मौत केवल इसलिए हो जाती है क्योंकि उन पर एंटीबायोटिक्स असर नहीं करतीं।

बचाव के लिए क्या करें?

अब सवाल यह है कि आम जनता क्या कर सकती है?

  • डॉक्टर की सलाह: कभी भी अपनी मर्जी से एंटीबायोटिक्स न खरीदें और न ही खाएं।
  • वायरल में ‘ना’: सर्दी-जुकाम और वायरल बुखार में एंटीबायोटिक्स काम नहीं करतीं, इसलिए इनका सेवन न करें।
  • कोर्स पूरा करें: अगर डॉक्टर ने दवा दी है, तो उसका पूरा कोर्स करें, बीच में न छोड़ें।
  • साफ-सफाई: हाथ धोने और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें ताकि संक्रमण से बचा जा सके।

लांसेट की यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि हमारे भविष्य की एक डरावनी तस्वीर है। भारत को ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ कहा जाता है, लेकिन अगर हम अपनी ही दवाओं के प्रति जिम्मेदार नहीं बने, तो यह उपलब्धि किसी काम की नहीं रहेगी। सरकार को सख्त नियम बनाने होंगे, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है कि हम और आप अपनी आदतों में सुधार करें। सेहत से जुड़ी यह लापरवाही अब बंद होनी चाहिए, वरना वह दिन दूर नहीं जब हमारे पास बीमारियों का इलाज करने के लिए कोई दवा नहीं बचेगी।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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