West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल में मदरसा शिक्षा के लिए बजट में भारी वृद्धि हुई है। जहां सत्ता में आने के समय मदरसों का बजट मात्र 472 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 5713 करोड़ रुपये हो गया है। यानी पिछले कुछ वर्षों में मदरसा बजट लगभग 12 गुना बढ़ चुका है। इस वृद्धि को लेकर भाजपा ने तीखा हमला बोला है। पार्टी का आरोप है कि ममता बनर्जी सरकार अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधने के लिए तुष्टिकरण की नीति अपना रही है।
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मदरसा शिक्षकों के नाम पर मस्जिदों में अजान देने वाले मुअज्जिनों का वेतन बढ़ाकर मुस्लिम समुदाय का समर्थन जुटाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर मुस्लिम बच्चों की शिक्षा बेहतर करने के लिए बजट बढ़ाया गया होता तो इसका स्वागत किया जाता। लेकिन सरकार ने शिक्षा के नाम पर केवल तुष्टिकरण किया है।
त्रिवेदी ने आगे कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने भी कुछ मदरसों पर सवाल उठाए थे। उन्होंने पाकिस्तान से संबंध और आपराधिक गतिविधियों का जिक्र किया था। लेकिन ममता सरकार राज्य की सुरक्षा को दांव पर लगाकर केवल वोट बैंक की राजनीति कर रही है। इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
बजट में कितनी वृद्धि हुई?
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सत्ता में आने के समय (2011): मदरसा बजट – 472 करोड़ रुपये
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वर्तमान (2026 अंतरिम बजट): मदरसा बजट – 5713 करोड़ रुपये
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वृद्धि: लगभग 12 गुना (1100 प्रतिशत से अधिक)
यह आंकड़ा पश्चिम बंगाल के हालिया अंतरिम बजट से सामने आया है। सरकार ने कुल 4.06 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया, जिसमें मदरसा शिक्षा पर भारी निवेश किया गया है।
भाजपा का मुख्य आरोप

भाजपा नेताओं का कहना है कि मदरसा बजट में इतनी बड़ी बढ़ोतरी चुनावी फायदे के लिए की गई है। पार्टी का दावा है कि ममता बनर्जी को राज्य के करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन चाहिए। 2021 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट लगभग एकतरफा टीएमसी की ओर गए थे। लेकिन अब स्थिति बदल रही है।
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हुमायूं कबीर (पूर्व सहयोगी) राज्य की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।
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असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम भी पश्चिम बंगाल में अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
भाजपा का अनुमान है कि अगर हुमायूं कबीर और ओवैसी मिलकर टीएमसी के 10 प्रतिशत वोट भी काट लेते हैं तो एसआईआर (स्पेशल इंटरेंसिव रिवीजन) के कारण बदली हुई परिस्थितियों में सत्ता परिवर्तन हो सकता है। इसी डर से ममता बनर्जी आक्रामक हो गई हैं और मुस्लिम समुदाय को लुभाने के लिए खजाना खोल रही हैं।
ममता सरकार के अन्य लोकलुभावन फैसले
5 फरवरी को पेश अंतरिम बजट में सरकार ने कई लोकलुभावन घोषणाएं कीं:
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लक्ष्मी भंडार योजना में लाभार्थी महिलाओं को 500 रुपये प्रति महीने अतिरिक्त सहायता।
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आशा कार्यकर्ताओं के वेतन में 1000 रुपये मासिक वृद्धि।
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बांग्लार युवा साथी योजना के तहत हर बेरोजगार युवा को 1500 रुपये मासिक देने का वादा।
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मदरसा शिक्षा पर 5713 करोड़ रुपये का प्रावधान।
ये सभी फैसले अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले किए गए हैं।
राजनीतिक विश्लेषण
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता बनर्जी की यह रणनीति मुस्लिम वोटों को बांधे रखने की है। पिछले चुनाव में टीएमसी को 48 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भाजपा को 38 प्रतिशत। अगर मुस्लिम वोट में 10 प्रतिशत भी सेंध लगती है तो टीएमसी के लिए मुश्किल हो सकती है।
विपक्ष का कहना है कि बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर कम ध्यान दिया गया। मदरसा बजट बढ़ाने से राज्य की समग्र शिक्षा व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
क्या कह रही है टीएमसी?
टीएमसी नेताओं का कहना है कि मदरसा शिक्षा अल्पसंख्यक समुदाय की जरूरत है। यह संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों को शिक्षा देने का अधिकार है। बजट बढ़ाना तुष्टिकरण नहीं, बल्कि समावेशी विकास का हिस्सा है।
West Bengal Politics: निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल में मदरसा बजट की 12 गुना वृद्धि अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। भाजपा इसे तुष्टिकरण बता रही है, जबकि सत्ताधारी दल इसे अल्पसंख्यक कल्याण से जोड़ रही है। आने वाले विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा कितना असर डालेगा, यह समय बताएगा। लेकिन फिलहाल राज्य की सियासत में यह बहस जोरों पर है।



