West Bengal Election: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले कांग्रेस एक बार फिर गंभीर दुविधा में फंसी हुई है। पार्टी के भीतर तीखी बहस छिड़ी हुई है कि वामदलों के साथ चुनावी गठबंधन जारी रखा जाए या अकेले चुनाव लड़ा जाए। वर्षों से लेफ्ट के साथ साझा किए गए गठबंधन ने कांग्रेस को बंगाल में राजनीतिक तौर पर कमजोर ही किया है। पार्टी का वोट शेयर लगातार घट रहा है और संगठनात्मक अस्तित्व पर सवाल उठ रहे हैं।
यह केवल सीटों के बंटवारे या तात्कालिक चुनावी गणित का मामला नहीं है, बल्कि कांग्रेस के भीतर चल रही उस गहरी आत्म-चिंतन की प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें पार्टी के पुनरुत्थान और राजनीतिक प्रासंगिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
लेफ्ट गठबंधन में लगातार मिली हार
कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन 2016 से बंगाल में सक्रिय रहा है। हालांकि 2019 लोकसभा चुनाव में दोनों अलग हुए थे, लेकिन 2021 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में फिर साथ आए। लेकिन यह चुनावी साझेदारी कांग्रेस के लिए लगभग हर बार नुकसानदेह साबित हुई है।
2021 विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर 92 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका। एक भी सीट नहीं जीत पाई। इससे भी बड़ी चिंता की बात यह रही कि कांग्रेस का वोट शेयर घटकर महज 3 प्रतिशत रह गया।
यह आंकड़ा बताता है कि गठबंधन की राजनीति ने कांग्रेस को मजबूत करने की बजाय उसे कमजोर ही किया है। पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता और नेता इस स्थिति से चिंतित हैं।
1996 में 82 सीटें जीती थी कांग्रेस
इसके विपरीत, कांग्रेस का इतिहास बंगाल में कभी काफी मजबूत रहा है। 1996 में कांग्रेस बंगाल में मुख्य विपक्षी दल थी। उस समय पार्टी ने 294 में से 288 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। कांग्रेस ने 82 सीटें जीतकर 39.48 प्रतिशत वोट हासिल किया था। यह पार्टी की बंगाल में सबसे मजबूत स्थिति थी। उस दौर में कांग्रेस एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी थी।
- 2001 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ गठबंधन कर कांग्रेस ने 60 सीटों पर चुनाव लड़ा और 26 सीटें जीतीं। 2011 में टीएमसी के साथ सत्ता में आई और 42 सीटें जीतीं।
- 2016 में लेफ्ट के साथ मिलकर 44 सीटों पर जीत दर्ज की। लेकिन इसके बाद पार्टी का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा। लगातार गठबंधनों पर निर्भर रहने से कांग्रेस का अपना संगठन कमजोर होता गया।
दो तिहाई सीटों पर नहीं दिखा कांग्रेस का झंडा

कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग मानता है कि दो दशकों से गठबंधनों पर निर्भरता ने पार्टी को खोखला कर दिया है। राज्य के दो-तिहाई विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का झंडा और चुनाव चिह्न वर्षों तक दिखाई ही नहीं दिया।
जब पार्टी लगातार कई सीटें छोड़ती है और अपने उम्मीदवार नहीं उतारती, तो उन क्षेत्रों में संगठन स्वाभाविक रूप से कमजोर हो जाता है। नए कार्यकर्ता नहीं जुड़ते, पुराने कार्यकर्ता निराश हो जाते हैं।
ऐसे में संगठन विस्तार, नए कार्यकर्ताओं का जुड़ना और मतदाताओं के बीच पार्टी की पहचान कैसे बने, यह गंभीर सवाल है। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि राजनीतिक सुविधा छोड़कर कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लेना चाहिए, भले ही तात्कालिक नुकसान क्यों न हो।
केरल में दुश्मनी, बंगाल में दोस्ती का भ्रम
केरल का संदर्भ यहां बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। केरल में कांग्रेस का सीपीएम के साथ सीधा और कड़वा मुकाबला है। दोनों एक-दूसरे के सबसे बड़े राजनीतिक विरोधी हैं।
लेकिन बंगाल में कांग्रेस उन्हीं वामदलों के साथ गठबंधन करती है। यह दोहरी राजनीति कांग्रेस के लिए हमेशा परेशानी का सबब रही है। पार्टी को इस मुद्दे पर लगातार घेरा जाता रहा है।
हालिया लोकल बॉडी चुनावों में जीत के बाद कांग्रेस केरल में किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती। वहां पार्टी की स्थिति मजबूत है और वह सत्ता में लौटने के करीब है।
इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन राजनीति की सोच पर भी पड़ रहा है। कांग्रेस को लगता है कि केरल में लेफ्ट के खिलाफ खड़ा होकर वह मजबूत हुई है, तो बंगाल में भी शायद यही रास्ता अपनाना चाहिए।
अभी तक नहीं हुई कोई औपचारिक बातचीत
विपक्षी गठबंधन INDIA के दो प्रमुख घटक होने के बावजूद कांग्रेस और लेफ्ट ने बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर अब तक कोई औपचारिक बातचीत नहीं की है।
यह स्थिति 2021 से बिल्कुल उलट है। उस समय दिसंबर 2020 में ही दोनों दलों ने साथ चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था। संयुक्त मोर्चा बना और सीटों का बंटवारा भी जल्दी हो गया था।
लेकिन वह संयुक्त मोर्चा पूरी तरह विफल रहा। न कांग्रेस कोई सीट जीत पाई, न ही लेफ्ट को कोई खास फायदा हुआ। टीएमसी ने भारी बहुमत से सरकार बनाई।
इन कड़वे अनुभवों ने कांग्रेस को आत्ममंथन के लिए मजबूर किया है। पार्टी अब पुरानी गलतियों को दोहराना नहीं चाहती।
अकेले चुनाव लड़ने की आवाजें मजबूत
कांग्रेस के भीतर एक मजबूत धड़ा मानता है कि अगर बंगाल में फिर से राजनीतिक प्रासंगिकता हासिल करनी है तो लंबे समय तक संगठन निर्माण, जमीनी संघर्ष और स्वतंत्र पहचान पर काम करना होगा।
इसके लिए अकेले चुनाव लड़ना कठिन जरूर है लेकिन शायद यही एकमात्र रास्ता है। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि तात्कालिक नुकसान से घबराने की बजाय दीर्घकालिक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
अगर कांग्रेस 294 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारती है तो भले ही कम सीटें जीते, लेकिन हर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की उपस्थिति दर्ज होगी। कार्यकर्ता सक्रिय होंगे और संगठन मजबूत होगा।
West Bengal Election: राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का फैसला
अंतिम फैसला पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को लेना है। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की क्या सोच है, यह आने वाले हफ्तों में साफ होगा।
बंगाल कांग्रेस के नेता दिल्ली में अपनी बात रख चुके हैं। अब देखना है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व किस रास्ते को चुनता है। अगर कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ने का फैसला करती है तो यह बंगाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव होगा। इससे चुनावी समीकरण भी बदल सकते हैं।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। लेफ्ट के साथ गठबंधन ने पार्टी को कमजोर किया है और वोट शेयर लगातार घटा है। पार्टी के भीतर अकेले चुनाव लड़ने की आवाजें मजबूत हो रही हैं। केरल में लेफ्ट विरोधी रुख और बंगाल में गठबंधन की दोहरी नीति भी सवालों के घेरे में है। अब देखना होगा कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व बंगाल के लिए क्या रणनीति अपनाता है। अगले कुछ हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि 2026 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अकेले लड़ेगी या फिर एक बार गठबंधन की राह चुनेगी।



