Top 5 This Week

Related Posts

West Bengal News: ममता बनर्जी ने काटे 74 विधायकों के टिकट, 15 साल बाद वाम मोर्चे की राह पर TMC

West Bengal News: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 का बिगुल बज चुका है। राज्य में दो चरणों में मतदान होगा पहले चरण के लिए 23 अप्रैल और दूसरे चरण के लिए 29 अप्रैल की तारीख तय की गई है। चुनाव की तैयारियों के बीच सबसे बड़ी खबर यह है कि मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी ने एंटी-इनकंबेंसी के खतरे को भांपते हुए एक बड़ा और साहसी फैसला लिया है। उन्होंने अपनी ही पार्टी के 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए हैं और 15 उम्मीदवारों की विधानसभा सीटें बदल दी हैं।

यह कदम उस वक्त उठाया गया है जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) राज्य में लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादा किया है कि यदि बंगाल में BJP की सरकार बनती है तो भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी। ऐसे माहौल में ममता ने यह दांव खेलकर विपक्ष के हमले को कमजोर करने की कोशिश की है।

2011 का इतिहास जब वाम मोर्चे ने काटे थे 81 टिकट

यह कहानी पूरी तरह समझने के लिए 2011 के बंगाल चुनाव पर एक नजर डालनी होगी। उस समय 34 साल से सत्ता में बैठी वाम मोर्चा सरकार को भी एंटी-इनकंबेंसी का ठीक यही डर सता रहा था। तब वाम मोर्चे ने भी जनता के गुस्से को शांत करने की कोशिश में 81 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए थे।

लेकिन उस वक्त नंदीग्राम और सिंगूर में हुए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ ममता बनर्जी का आंदोलन इतना मजबूत था कि जनता का गुस्सा टिकट काटने से नहीं थमा। नतीजा यह रहा कि TMC और कांग्रेस के गठबंधन ने 294 में से 228 सीटें जीतकर बाम मोर्चे की 34 साल पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंका। अब 15 साल बाद ममता खुद उसी राह पर चल पड़ी हैं, जहाँ कभी उनके विरोधी खड़े थे।

SIR विवाद चुनाव का सबसे गर्म मुद्दा

इस बार के बंगाल चुनाव में एंटी-इनकंबेंसी से भी बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है मतदाता सूची का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR। राज्य में मतदाता सूची की इस खास समीक्षा प्रक्रिया के तहत करीब 7.66 करोड़ कुल मतदाताओं में से लगभग 91 लाख नाम हटाए गए हैं। यह मुद्दा इतना बड़ा बन चुका है कि चुनाव प्रचार की पूरी दिशा ही बदल गई है।

BJP का दावा है कि इन हटाए गए नामों में ज्यादातर बांग्लादेश से आए घुसपैठिए थे जो गैरकानूनी तरीके से मतदाता सूची में शामिल हो गए थे। वहीं दूसरी तरफ ममता बनर्जी की TMC का आरोप है कि असली और वैध मतदाताओं को जान-बूझकर उनके मताधिकार से वंचित किया गया है। इस विवाद ने राज्य के राजनीतिक माहौल को पूरी तरह गर्म कर दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR का यह मुद्दा एक तरह से ममता बनर्जी के लिए राहत की सांस बनकर आया है। उनके मुताबिक अगर SIR का विवाद न होता तो एंटी-इनकंबेंसी का असर ममता बनर्जी और TMC पर कहीं ज्यादा भारी पड़ता। SIR के मुद्दे ने चर्चा का केंद्र बदल दिया है।

मुस्लिम वोट और TMC का गणित

पश्चिम बंगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है और ये वोटर लगभग 120 विधानसभा सीटों पर सीधा असर डालते हैं। राजनीतिक जानकार कह रहे हैं कि SIR विवाद के कारण मुस्लिम मतदाताओं में यह भावना मजबूत हुई है कि उनके वोट छीने जा रहे हैं। इससे मुस्लिम वोट बैंक TMC की तरफ और मजबूती से एकजुट हो सकता है, जो पहले से ममता बनर्जी के साथ रहा है।

अगर ऐसा होता है तो यह TMC के लिए बड़ा फायदा होगा। वहीं दूसरी ओर BJP ने इसी मुद्दे को घुसपैठ-विरोधी नजरिए से पेश करके अपने परंपरागत हिंदू वोटरों को एकजुट करने की कोशिश की है।

मतुआ समुदाय और OBC मतदाता – अहम कड़ी

बंगाल की चुनावी राजनीति में मतुआ समुदाय हमेशा से एक अहम भूमिका निभाता आया है। यह समुदाय पहले BJP का पक्का समर्थक माना जाता था, लेकिन SIR की प्रक्रिया में इस समुदाय के भी कुछ सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटने की खबरें आई हैं। इससे मतुआ वोटों में बदलाव आने की संभावना जताई जा रही है।

इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में हिंदू OBC मतदाताओं पर BJP की पकड़ अभी भी काफी मजबूत बताई जा रही है। यह वर्ग BJP के लिए एक बड़ा आधार है और पार्टी इसे बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रही है।

बिखरा हुआ विपक्ष: TMC के लिए फायदेमंद?

इस बार बंगाल में विपक्ष एकजुट नहीं है। BJP, वाम दल और कांग्रेस तीनों अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी वोट बंट जाने से TMC को बड़ा फायदा मिल सकता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भी विपक्षी बिखराव का लाभ ममता बनर्जी को मिला था और उन्होंने BJP की जोरदार चुनौती के बावजूद सत्ता बरकरार रखी थी।

हालांकि 2011 में भी यही सोचकर वाम मोर्चे ने टिकट काटे थे, और फिर भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी की यह रणनीति उन्हें तीसरी बार सत्ता दिला पाएगी, या 2011 का इतिहास एक बार फिर दोहराया जाएगा?

आगे क्या होगा?

बंगाल चुनाव 2026 कई मायनों में बेहद दिलचस्प है। एक तरफ ममता बनर्जी की अनुभवी और मजबूत जमीनी पकड़ है, तो दूसरी तरफ BJP का केंद्र सरकार की ताकत और मोदी फैक्टर। SIR का विवाद, मुस्लिम वोट बैंक, मतुआ समुदाय का रुख, ग्रामीण OBC मतदाता और विपक्ष का बिखराव ये सभी मिलकर इस चुनाव को बेहद पेचीदा बना रहे हैं।

23 और 29 अप्रैल को डाले जाने वाले वोट ही तय करेंगे कि बंगाल की जनता ममता बनर्जी के बदलाव के दांव पर भरोसा करती है या फिर बदलाव की बयार चलती है। तब तक सभी की नजरें इस राज्य पर टिकी रहेंगी।

Read More Here:- 

तीन इंटरमीडिएट स्टूडेंट्स ने सुसाइड किया

KPL Jamshedpur 2026: बैसाखी की खुशी में जमशेदपुर में गूंजेगी सिख क्रिकेट की धमक, 17 से 19 अप्रैल को कोऑपरेटिव कॉलेज मैदान में होगा क्रिकेट का महाकुंभ

UP Board Result 2026: 15 से 20 अप्रैल के बीच आ सकता है 10वीं-12वीं का रिजल्ट, जानें मार्कशीट कब और कहां मिलेगी

बेंगलुरु में आगे भी गर्मी रहेगी, बारिश से कोई राहत नहीं

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles