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दोहा शिखर सम्मेलन में गढ़ी जा रही ‘अरब NATO’ की कहानी! आखिर क्या है मकसद ?

डेस्क: कतर की राजधानी दोहा में सोमवार को अरब और इस्लामी देशों के नेताओं की आपात बैठक हुई। मकसद था कतर में हमास नेताओं पर इज़रायली हमलों के खिलाफ रणनीति तय करना। हालांकि, मतभेदों के चलते ठोस नतीजे नहीं निकल सके, लेकिन मिस्र के प्रस्ताव ने ‘अरब NATO’ के विचार को फिर जिंदा कर दिया है।

बैठक में मिस्र ने सबसे बड़ी सेना होने के नाते सामूहिक रक्षा गठबंधन की पैरवी की। पाकिस्तान और तुर्की भी शामिल हुए। पाकिस्तान ने क्षेत्र में इज़रायल की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जॉइंट टास्क फोर्स बनाने का सुझाव दिया, जबकि तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने इज़रायल पर आर्थिक दबाव डालने की अपील की। इराक ने नाटो जैसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का समर्थन किया।

सऊदी अरब की अगुवाई में आतंकवाद विरोधी इस्लामी गठबंधन की घोषणा 2015 में हुई थी, लेकिन यह ठंडे बस्ते में चला गया। अब दोहा हमले, जिसमें पांच हमास नेता और एक कतरी अधिकारी मारे गए, के बाद इस पहल को गति मिली है। मिस्र ने 20,000 सैनिक देने और गठबंधन का मुख्यालय काहिरा में बनाने की पेशकश की है। सऊदी अरब को फंडिंग और आधुनिक क्षमताओं के लिए अहम भागीदार माना जा रहा है।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि ‘अरब NATO’ फिलहाल प्रतीकात्मक है। खाड़ी देशों की संयुक्त रक्षा संधि सक्रिय करने की चर्चा हुई, लेकिन ठोस सैन्य प्रतिबद्धता नहीं आई। मिस्र और ईरान अलग-अलग एजेंडे लेकर चलते दिखे। लेखक हुसैन अबूबक्र ने कहा, “यह विचार ज़्यादा भ्रम पैदा करता है, क्योंकि इसमें स्पष्टता और साझा लक्ष्य का अभाव है।”

जॉन्स हॉपकिन्स के अर्थशास्त्री स्टीव हेन्के ने शिखर सम्मेलन को “सिर्फ शोर मचाने वाला” बताया। फिर भी, अगर अरब NATO साकार होता है, तो यह न सिर्फ इज़रायल बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को भी नया रूप दे सकता है और अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भरता घटा सकता है।

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