Monsoon Session 2026: संसद का मॉनसून सत्र गुरुवार को विपक्ष के लगातार हंगामे के बीच संपन्न हो गया। करीब 25 दिनों तक चले इस सत्र के दौरान लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोंकझोंक देखने को मिली। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार कुल 12 महत्वपूर्ण बिलों को पारित कराने में सफल रही। सत्र समाप्त होने के तुरंत बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मीडिया के सामने पूरे सत्र का रिपोर्ट कार्ड पेश किया। उन्होंने कामकाज के लिहाज से सत्र को सफल बताया, लेकिन चर्चा और बहस के मोर्चे पर विपक्ष के रवैये को लेकर गहरी नाराजगी भी जताई।
Monsoon Session 2026: कामकाज के मामले में सफल रहा मॉनसून सत्र
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रेस ब्रीफिंग के दौरान कहा कि मॉनसून सत्र को दो अलग-अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक कामकाज और बिजनेस की दृष्टि से यह सत्र काफी सफल रहा, क्योंकि सरकार कुल 12 बिल पारित कराने में कामयाब रही। हालांकि उन्होंने साफ तौर पर स्वीकार किया कि चर्चा और बहस के लिहाज से यह सत्र उतना संतोषजनक नहीं रहा। रिजिजू ने कहा कि मॉनसून सत्र आज समाप्त हो गया है, और इसे बिजनेस के नजरिए से देखा जाए तो यह बहुत अच्छा सेशन साबित हुआ है, लेकिन चर्चा के लिहाज से स्थिति उतनी बेहतर नहीं रही।
लोकसभा और राज्यसभा की उत्पादकता के आंकड़े
पार्लियामेंट कॉम्प्लेक्स में आयोजित प्रेस ब्रीफिंग में केंद्रीय मंत्री ने दोनों सदनों की उत्पादकता से जुड़े आंकड़े भी साझा किए। उन्होंने बताया कि लोकसभा में निर्धारित समय की तुलना में केवल 19 प्रतिशत उत्पादकता ही हासिल हो पाई, जबकि राज्यसभा में यह आंकड़ा 39 प्रतिशत रहा। राज्यसभा में भी विपक्षी दलों ने कई बार हंगामा कर सदन से वॉकआउट किया। यह आंकड़े इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि पूरे सत्र के दौरान संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित होती रही, जिसका सीधा असर विधायी कामकाज की गुणवत्ता पर पड़ा।
सिर्फ एक बिल पर हो पाई सार्थक चर्चा
किरेन रिजिजू ने यह भी खुलासा किया कि पूरे मॉनसून सत्र के दौरान लोकसभा में केवल एक ही बिल पर विस्तृत चर्चा हो पाई। यह बिल नकल रोकने से जुड़ा था, जिस पर सदन में गंभीर बहस देखने को मिली। इसके अलावा किसी अन्य विधेयक पर लोकसभा में कोई सार्थक चर्चा नहीं हो सकी। मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चर्चा की दृष्टि से सरकार इस सत्र से बिल्कुल संतुष्ट नहीं है, क्योंकि संसद का मूल उद्देश्य ही बहस और विचार-विमर्श के जरिए बेहतर कानून बनाना होता है, जो इस बार बड़े पैमाने पर पूरा नहीं हो सका।
तीन दशक में पहली बार दिखा ऐसा नजारा
विपक्ष के रवैये पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि उन्हें संसद का करीब तीन दशकों का अनुभव है, लेकिन इतने लंबे राजनीतिक करियर में उन्होंने पहली बार ऐसा नजारा देखा जब विपक्ष खुद चर्चा से पीछे हटता नजर आया। उन्होंने कहा कि यह पहला मौका था जब सरकार बार-बार चर्चा के लिए तैयार होने की बात कहती रही, लेकिन विपक्ष सदन से गायब हो गया। रिजिजू के मुताबिक यह स्थिति पूरी तरह अप्रत्याशित थी और उनकी कल्पना से भी परे थी, जिसे उन्होंने संसदीय इतिहास में एक नई और असामान्य घटना करार दिया।
कांग्रेस पर भी साधा तीखा निशाना
केंद्रीय मंत्री ने अपनी प्रतिक्रिया में कांग्रेस पार्टी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी के सांसद अब संसद में सिर्फ नारेबाजी और हंगामे को ही अपना मुख्य काम मानने लगे हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के सांसद सुबह उठते ही संसद पहुंचते हैं और नारे लगाना शुरू कर देते हैं, जिससे सदन की गरिमा और कामकाज दोनों प्रभावित होते हैं। हालांकि इसी दौरान उन्होंने कांग्रेस के नए सांसदों के प्रति सहानुभूति भी जताई। रिजिजू ने कहा कि उन्हें नए सांसदों की स्थिति पर बुरा लगता है, क्योंकि अगर सदन में चर्चा ही नहीं होगी, तो नए जनप्रतिनिधि संसदीय प्रक्रिया को समझना और सीखना कैसे शुरू करेंगे।
विपक्ष के हंगामे का संसद की कार्यप्रणाली पर असर
पूरे मॉनसून सत्र के दौरान विपक्ष का हंगामा और सरकार की तरफ से बार-बार चर्चा की पेशकश, यह दोनों ही स्थितियां संसद की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती हैं। जहां एक तरफ सरकार का दावा है कि वह हर मुद्दे पर बहस के लिए तैयार थी, वहीं विपक्ष के लगातार हंगामे और वॉकआउट के कारण कई महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर चर्चा नहीं हो पाई। इससे यह स्पष्ट होता है कि आने वाले सत्रों में संसद की उत्पादकता बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों को अपनी रणनीति और रवैये में बदलाव लाने की आवश्यकता होगी।
Monsoon Session 2026: आने वाले सत्रों पर टिकी निगाहें
मॉनसून सत्र के समापन के साथ ही अब सभी की निगाहें आगामी शीतकालीन सत्र पर टिक गई हैं, जहां उम्मीद जताई जा रही है कि सरकार और विपक्ष दोनों मिलकर संसदीय कार्यवाही को अधिक सार्थक और उत्पादक बनाने की दिशा में प्रयास करेंगे। संसदीय कार्य मंत्री के बयान से यह भी संकेत मिलता है कि सरकार आगे भी विधायी कामकाज को प्राथमिकता देती रहेगी, भले ही विपक्ष के साथ राजनीतिक टकराव जारी रहे। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में संसद के भीतर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच का यह टकराव किस दिशा में आगे बढ़ता है।
कुल मिलाकर मॉनसून सत्र का यह समापन भारतीय संसदीय राजनीति के लिए कई सवाल छोड़ गया है। सरकार ने भले ही 12 बिल पारित कराकर कामकाज के मोर्चे पर सफलता का दावा किया हो, लेकिन चर्चा और बहस की कमी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए चिंता का विषय जरूर बनी रहेगी। संसद केवल कानून पारित करने का मंच नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों के बीच गंभीर विचार-विमर्श का भी केंद्र होता है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि आगामी सत्रों में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर संसद की गरिमा और उत्पादकता को बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाएंगे, ताकि जनता के मुद्दों पर सार्थक बहस हो सके।
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