Assam Politics: असम विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अब पूरे जोर पर है और इस बार चुनावी मैदान में एक ऐसा चेहरा उतरा है जो किसी और राज्य का मुख्यमंत्री होते हुए भी असम के आदिवासियों के दर्द को अपना दर्द बता रहा है। झारखंड के मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष हेमंत सोरेन इन दिनों असम में जोरदार चुनाव प्रचार कर रहे हैं। सोमवार को जब उन्होंने चाय बागान में रहने वाले आदिवासी मजदूरों के घरों का हाल अपनी आंखों से देखा, तो वे भावुक हो गए और असम की सरकारों पर जमकर निशाना साधा।
चाय बागान में क्या देखा हेमंत सोरेन ने?
हेमंत सोरेन सोमवार को डिब्रूगढ़ जिले के टिपलिंक टी एस्टेट के लेन नंबर-सात में पहुंचे। यह इलाका असम के उन चाय बागानों में से एक है जहां दशकों से आदिवासी मजदूर काम करते आए हैं। ये वही लोग हैं जिनके पुरखे झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे राज्यों से यहां काम की तलाश में आए थे और फिर यहीं के होकर रह गए।
जब मुख्यमंत्री सोरेन ने इन मजदूरों के घरों की हालत देखी तो वे अंदर तक हिल गए। जर्जर दीवारें, टूटी छतें, तंग और अंधेरे कमरे यही हाल था उन घरों का जिनमें पीढ़ियों से ये मजदूर परिवार रह रहे हैं। हेमंत सोरेन ने वहां मौजूद लोगों से उनकी तकलीफें सुनीं, उनके हालात जाने।
हेमंत सोरेन ने क्या कहा असम सरकार पर?

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बेबाकी से कहा कि असम का यह चुनाव कोई आम चुनाव नहीं है। उनके शब्दों में यह चुनाव पहचान के लिए है, जमीन और आवास के हक के लिए है और उन तमाम अधिकारों के लिए है जो इन आदिवासी भाई-बहनों को आजादी के इतने सालों बाद भी नहीं मिले।
उन्होंने सीधे सवाल उठाया कि जब झारखंड जैसा छोटा राज्य अपने गरीब लोगों को तीन कमरे का पक्का मकान दे सकता है, जब झारखंड की 50 लाख महिलाओं को हर महीने 2500 रुपए की सम्मान राशि दी जा सकती है, तो असम में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? असम एक बड़ा राज्य है, यहां संसाधनों की कमी नहीं है, फिर भी यहां के आदिवासी इस हाल में क्यों जी रहे हैं?
सभी सरकारों ने बारी-बारी से ठगा
हेमंत सोरेन का सबसे तीखा हमला असम में अब तक बनी सभी सरकारों पर था। उन्होंने कहा कि चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में आई हो, असम के आदिवासियों के साथ हमेशा धोखा हुआ है। उन्हें वोट की जरूरत के वक्त याद किया गया और चुनाव जीतने के बाद भुला दिया गया। उनके अधिकारों की बात तो होती रही लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला।
उन्होंने आगे कहा कि जिस तरह के घरों में ये आदिवासी भाई-बहन रहने को मजबूर हैं, वह सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के साथ किया गया अन्याय है जिन्होंने इस धरती को अपने पसीने से सींचा है। लेकिन अब यह सब बदलेगा और इस बदलाव की शुरुआत इसी चुनाव से होगी।
दुलियाजान विधानसभा में किया प्रचार
हेमंत सोरेन टिपलिंक टी एस्टेट में झामुमो समर्थित दुलियाजान विधानसभा प्रत्याशी पीटर मिंज के पक्ष में प्रचार करने पहुंचे थे। उन्होंने वहां मौजूद लोगों से पीटर मिंज को वोट देने की अपील की और कहा कि इस बार एक ऐसे प्रतिनिधि को चुनें जो सच में आपके बीच से है और आपके दर्द को समझता है।
उन्होंने कहा कि झामुमो का मकसद सिर्फ सीटें जीतना नहीं है। यह पार्टी हमेशा से आदिवासियों, वनवासियों और मेहनतकश लोगों की आवाज रही है और असम में भी वही काम करेगी।
झारखंड मॉडल को असम में लागू करने की मांग
हेमंत सोरेन ने झारखंड में अपनी सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का जिक्र करते हुए लोगों को बताया कि अगर इरादा हो तो गरीबों की जिंदगी बदली जा सकती है। झारखंड में तीन कमरे का पक्का आवास, महिलाओं को सम्मान राशि, और अन्य सरकारी सुविधाएं आदिवासी तबके तक पहुंचाई जा रही हैं।
चाय बागान मजदूरों की समस्या कोई नई नहीं
असम के चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी मजदूरों की समस्या कोई नई नहीं है। देश की आजादी से पहले से ये मजदूर इन बागानों में काम कर रहे हैं। लेकिन दशकों बाद भी उनके जीवन स्तर में कोई बड़ा सुधार नहीं आया। रहने के लिए ढंग का मकान नहीं, बच्चों के लिए अच्छे स्कूल नहीं, इलाज के लिए पास में अस्पताल नहीं।
इन बागानों में काम करने वाले ज्यादातर परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी उसी हाल में जी रहे हैं। बागान मालिकों पर उनकी निर्भरता इतनी गहरी हो चुकी है कि वे आवाज उठाने से भी डरते हैं। राजनीतिक दलों ने हर चुनाव में इनका इस्तेमाल किया लेकिन सत्ता में आने के बाद इनकी तरफ मुड़कर नहीं देखा।
असम चुनाव में आदिवासी वोट कितने अहम?
असम में चाय बागान मजदूरों और आदिवासी समुदाय की आबादी काफी बड़ी है। ये लोग कई विधानसभा सीटों पर जीत-हार तय करने की ताकत रखते हैं। यही वजह है कि हर पार्टी इन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिश में लगी रहती है। इस बार हेमंत सोरेन का आना और उनका सीधे चाय बागान में जाकर लोगों से मिलना इस समुदाय में एक अलग संदेश दे रहा है।
झामुमो की कोशिश है कि झारखंड में आदिवासियों के बीच बनाई गई अपनी साख को असम में भी भुनाया जाए। हेमंत सोरेन खुद एक आदिवासी नेता हैं और उनकी बात इस समुदाय में ज्यादा असर करती है।
आगे की राह क्या होगी?
असम का यह चुनाव कई मायनों में खास है। एक तरफ सत्तारूढ़ पार्टी अपने विकास के दावे कर रही है, तो दूसरी तरफ विपक्षी दल आदिवासियों, चाय बागान मजदूरों और वंचित तबके की आवाज उठाकर सत्ता बदलने की कोशिश में हैं। हेमंत सोरेन जैसे नेता का इस चुनाव में उतरना इस लड़ाई को और धार देता है।
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