Bihar Liquor Ban NCAER Report: बिहार में अप्रैल 2016 से लागू शराबबंदी अब एक बार फिर बहस के केंद्र में है। नेशनल काउंसिल ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च यानी एनसीएईआर की एक नई शोध रिपोर्ट ने इस नीति की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में न तो शराब पीने वालों की संख्या घटी है और न ही महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा में कमी आई है। इसके उलट अवैध शराब, तस्करी और नशे के दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ गया है। इसके साथ ही सरकार को राजस्व का भारी नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। यह रिपोर्ट बिहार सरकार की इस बहुचर्चित नीति के मूल उद्देश्यों और उसके वास्तविक जमीनी असर के बीच के बड़े अंतर को उजागर करती है।
Bihar Liquor Ban NCAER Report: 1956 में बने संस्थान की गहन शोध रिपोर्ट
1956 में स्थापित एनसीएईआर देश का सबसे पुराना आर्थिक नीति अनुसंधान संस्थान माना जाता है। अर्थशास्त्री रत्ना सहाय के नेतृत्व में तैयार किए गए इस नए अध्ययन को इंडिया पॉलिसी फोरम में प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट का शीर्षक बिहार के विकास के व्यापक परिप्रेक्ष्य पर केंद्रित है, जिसमें राज्य की उपलब्धियों के साथ-साथ अधूरे एजेंडे और आगे की राह पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। इस शोध में शराबबंदी जैसी महत्वपूर्ण नीति के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का बारीकी से विश्लेषण किया गया है, जो नीति निर्माताओं के लिए भी काफी अहम माना जा रहा है।
शराबबंदी लागू करने के पीछे की मूल सोच
रिपोर्ट के अनुसार बिहार में शराबबंदी लागू करने के पीछे यह विश्वास काम कर रहा था कि शराब घरेलू हिंसा का एक बड़ा कारण है। सरकार का मानना था कि शराब पर रोक लगाने से घरेलू संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा और शराब पर खर्च होने वाला पैसा परिवार की अन्य जरूरी जरूरतों पर लगाया जा सकेगा। इसी सोच के चलते यह उम्मीद जताई गई थी कि इससे शराब से जुड़े दुर्व्यवहार की घटनाओं में भी कमी आएगी। इसी वजह से राज्य की महिलाओं ने इस फैसले का व्यापक स्तर पर समर्थन किया था, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि इससे उनके घरेलू जीवन में सुधार आएगा।
महिलाओं के प्रति अपराध में नहीं आई कमी
हालांकि रिपोर्ट के आंकड़े इस उम्मीद के उलट तस्वीर पेश करते हैं। शोध के मुताबिक शराबबंदी के बाद की अवधि में महिलाओं के प्रति अपराधों में कमी नहीं आई, बल्कि इसमें बढ़ोतरी ही दर्ज की गई है। यह तथ्य उन नीति निर्माताओं के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है, जिन्होंने महिला सुरक्षा और घरेलू हिंसा को कम करने के उद्देश्य से यह कानून लागू किया था। जमीनी स्तर पर भी लोगों का अनुभव कुछ ऐसा ही बताता है। मनेर क्षेत्र के एक स्थानीय निवासी ने बताया कि शुरुआती दिनों में शराबबंदी सख्ती से लागू थी, लेकिन धीरे-धीरे हालात बदल गए और अब शराब खुलेआम भले न दिखे, पर हर जगह उपलब्ध हो जाती है।
प्रशासनिक बयानों से भी झलकती है असल तस्वीर
बिहार के उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में यह स्वीकार किया कि कुछ लोग छिपकर शराब पी लेते हैं, हालांकि सार्वजनिक स्थानों पर पूर्ण शराबबंदी लागू है। इस तरह के बयान भी इस बात का संकेत देते हैं कि राज्य में शराब की उपलब्धता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। एक सब्जी विक्रेता महिला ने भी बताया कि शुरुआती दिनों में हालात ठीक थे, लेकिन अब स्थिति पहले से भी खराब हो गई है, क्योंकि सामान्य कीमत से दोगुने दाम पर अवैध रूप से शराब मिल रही है। मौजूदा कानून के तहत पहली बार शराब पीते पकड़े जाने पर दो हजार से पांच हजार रुपये तक जुर्माना और दूसरी बार पकड़े जाने पर एक साल की सजा का प्रावधान है।
सरकारी राजस्व को हुआ भारी नुकसान
शराबबंदी लागू होने से पहले राज्य के कुल राजस्व का करीब 14 प्रतिशत हिस्सा आबकारी कर से आता था। इस नीति के लागू होने के बाद यह आय पूरी तरह समाप्त हो गई, वहीं दूसरी ओर तस्करी रोकने और निगरानी बनाए रखने में होने वाला खर्च राज्य के खजाने पर अतिरिक्त बोझ बन गया। अवैध शराब के नेटवर्क के फैलने से अपराध और भ्रष्टाचार में भी बढ़ोतरी देखी गई है, जिससे पुलिस-प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौतियां और गहरी हो गई हैं। एनसीएईआर की रिपोर्ट में साफ तौर पर सुझाव दिया गया है कि आबकारी कर को फिर से बहाल करने का समय आ चुका है, जिससे राजस्व में 14 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
Bihar Liquor Ban NCAER Report: पड़ोसी राज्यों की तुलना में बिहार को नुकसान
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि शराब से पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश को करीब 70 हजार करोड़ रुपये, पश्चिम बंगाल को 50 हजार करोड़ रुपये और झारखंड को 25 हजार करोड़ रुपये तक का राजस्व प्राप्त होता है। इसके उलट बिहार को शराबबंदी के चलते 25 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह आंकड़ा दिखाता है कि राज्य की वित्तीय स्थिति पर इस नीति का कितना गहरा असर पड़ा है, जो अंतत: विकास कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधनों को भी सीमित कर देता है।
Bihar Liquor Ban NCAER Report: राजनीतिक हलकों में जारी है बहस
शराबबंदी की प्रासंगिकता को लेकर राजनीतिक बहस भी लगातार तेज बनी हुई है। जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर इस कानून को असफल करार देते हुए आरोप लगाते हैं कि इसकी आड़ में शराब माफिया और भ्रष्ट तंत्र मिलकर एक समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे हैं। विपक्षी दल राजद के नेता तेजस्वी यादव भी लंबे समय से फोन के जरिए शराब की डिलीवरी होने के आरोप लगाते रहे हैं। वहीं केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का कहना है कि नशाबंदी कानून सही है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में प्रशासनिक स्तर पर गंभीर खामियां हैं, जिनका सबसे ज्यादा असर गरीब तबके पर पड़ा है। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि सरकारी खजाने में न जाने वाला यह पैसा भ्रष्ट तंत्र की जेब में जा रहा है, जिसका प्रमाण लगातार होने वाली शराब बरामदगी और जहरीली शराब से होने वाली मौतें हैं।
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