Board Exam Tips: 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं का समय नजदीक आते ही हजारों परिवारों में तनाव का माहौल बन जाता है। विद्यार्थी अपने भविष्य को लेकर चिंतित होते हैं तो अभिभावक अपेक्षाओं के बोझ तले दबे रहते हैं। इस स्थिति को देखते हुए पटना के वरिष्ठ मनोचिकित्सकों ने छात्रों और उनके माता-पिता दोनों के लिए महत्वपूर्ण सलाह जारी की है। विशेषज्ञों का मानना है कि बोर्ड परीक्षा सिर्फ अंकों की नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और भावनात्मक सहयोग की भी परीक्षा होती है।
हल्का तनाव बढ़ाता है प्रदर्शन, अधिक तनाव करता है नुकसान
इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के प्राध्यापक डॉ केके सिंह और पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के मनोचिकित्सक डॉ एनपी सिंह ने बताया कि एक निश्चित स्तर का तनाव वास्तव में विद्यार्थियों के प्रदर्शन को बेहतर बनाता है। यह उन्हें केंद्रित और सतर्क रखता है। लेकिन जब तनाव का स्तर इतना बढ़ जाए कि एकाग्रता भंग होने लगे, नींद प्रभावित हो या आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लगे, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।
डॉक्टरों ने कहा कि परीक्षा से पहले के दिनों में कई छात्रों में सिरदर्द, पेट दर्द, घबराहट, अत्यधिक पसीना आना और नींद में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। ये शारीरिक संकेत मानसिक तनाव के परिणाम होते हैं। इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, जो विद्यार्थी अपनी भावनाओं को समझते हैं और तनाव प्रबंधन की तकनीकें अपनाते हैं, वे न केवल बेहतर अंक लाते हैं बल्कि जीवन भर के लिए महत्वपूर्ण कौशल भी सीख लेते हैं।
छात्रों के लिए मनोचिकित्सकों की खास सलाह

पटना के मनोचिकित्सकों ने बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों को कई व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। डॉ केके सिंह ने बताया कि पढ़ाई को छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित करना बेहद जरूरी है। पूरे सिलेबस को एक साथ देखकर घबराने के बजाय हर दिन कुछ निश्चित टॉपिक्स पर फोकस करें।
इस तरीके से पढ़ाई करने से दिमाग में डोपामाइन नामक रसायन का स्राव होता है, जो प्रेरणा और संतोष की भावना देता है। जब कोई छात्र अपना छोटा लक्ष्य पूरा करता है, तो उसे उपलब्धि का अहसास होता है और यह अगले लक्ष्य के लिए ऊर्जा प्रदान करता है।
डॉक्टरों ने कहा कि दूसरों से तुलना करना सबसे बड़ी गलती है। हर विद्यार्थी की सीखने की गति अलग होती है। किसी दोस्त ने कितना पढ़ लिया या कितने अच्छे अंक लाए, यह सोचकर खुद को कमतर समझना आत्मविश्वास को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखें और अपनी रफ्तार से आगे बढ़ें।
नींद और संतुलित आहार है जरूरी
मनोचिकित्सकों ने छात्रों को नींद की महत्ता समझाते हुए कहा कि कम से कम 6 से 7 घंटे की नींद अत्यंत आवश्यक है। रात भर जागकर पढ़ाई करना उल्टा नुकसान करता है। थका हुआ दिमाग सूचनाओं को ठीक से प्रोसेस नहीं कर पाता और लंबे समय तक याद भी नहीं रख पाता।
नींद के दौरान दिमाग दिन भर सीखी गई जानकारी को व्यवस्थित करता है और स्मृति को मजबूत बनाता है। इसलिए परीक्षा से एक रात पहले भी पूरी नींद लेना जरूरी है। साथ ही संतुलित आहार लेना भी महत्वपूर्ण है। फास्ट फूड और अत्यधिक कैफीन से बचें। फल, सब्जियां, दूध, दही और सूखे मेवे मस्तिष्क के लिए पोषक होते हैं।
पानी की पर्याप्त मात्रा भी बनाए रखें क्योंकि निर्जलीकरण एकाग्रता को प्रभावित करता है। नाश्ता कभी न छोड़ें, यह दिन की शुरुआत के लिए ऊर्जा प्रदान करता है।
नियमित ब्रेक लेना न भूलें
डॉ एनपी सिंह ने जोर देकर कहा कि लगातार घंटों तक पढ़ना प्रभावी नहीं होता। हर 30 से 40 मिनट की पढ़ाई के बाद 5 से 10 मिनट का ब्रेक लेना चाहिए। इस ब्रेक के दौरान मोबाइल फोन से दूर रहें क्योंकि सोशल मीडिया देखने से दिमाग को आराम नहीं मिलता, बल्कि और थकान होती है।
ब्रेक के समय हल्की स्ट्रेचिंग करें, कमरे में टहलें या खिड़की से बाहर देखें। इससे आंखों को भी आराम मिलता है। गहरी सांस लेने की तकनीक भी तनाव कम करने में सहायक होती है। 5 सेकंड सांस लें, 5 सेकंड रोकें और फिर 5 सेकंड में छोड़ें। यह व्यायाम घबराहट को कम करता है।
हल्का व्यायाम या योग भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। रोजाना 20 से 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि एंडोर्फिन हार्मोन का स्राव बढ़ाती है, जो प्राकृतिक तनाव निवारक है।
अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी
मनोचिकित्सक डॉ निश्का सिन्हा ने कहा कि कई बार माता-पिता की चिंता बच्चों पर अतिरिक्त दबाव बनकर गिरती है। जब बच्चा पहले से ही परीक्षा को लेकर तनावग्रस्त हो, तो माता-पिता की अत्यधिक अपेक्षाएं उसे भीतर से तोड़ सकती हैं। अभिभावकों को समझना होगा कि अंक ही सब कुछ नहीं हैं।
बोर्ड के नंबर निश्चित रूप से भविष्य का एक रास्ता तय करते हैं, लेकिन वे किसी बच्चे की संपूर्ण क्षमता का पैमाना नहीं हो सकते। हर बच्चे में अलग-अलग प्रतिभाएं होती हैं और वे अपने समय पर खिलती हैं। इसलिए धैर्य रखना और बच्चे का साथ देना जरूरी है।
डॉक्टरों ने कहा कि “पड़ोसी के बेटे को देखो” या “तुम्हारे दोस्त ने कितना अच्छा किया” जैसे वाक्य बच्चों के आत्मविश्वास को गहरी चोट पहुंचाते हैं। ऐसी तुलनाएं बच्चे में हीनभावना पैदा करती हैं और वह खुद को असफल मानने लगता है। प्रत्येक बच्चा अपनी अनूठी विशेषताओं के साथ आगे बढ़ता है, इसे स्वीकार करना आवश्यक है।
घर का माहौल रखें सकारात्मक
विशेषज्ञों ने अभिभावकों को सलाह दी कि घर का वातावरण सकारात्मक और सहयोगपूर्ण रखें। छोटी-छोटी बातों पर डांटने-फटकारने के बजाय बच्चे के प्रयासों की सराहना करें। परिणाम से ज्यादा प्रक्रिया पर ध्यान दें। अगर बच्चा मेहनत कर रहा है तो उसे प्रोत्साहित करें।
डॉ सिन्हा ने कहा कि कई बार बच्चों को समाधान नहीं, सिर्फ एक धैर्यपूर्वक सुनने वाला चाहिए होता है। जब बच्चा अपनी परेशानी या डर साझा करना चाहे, तो पहले उसे पूरी तरह सुनें। बीच में न टोकें और न ही तुरंत सलाह देना शुरू करें। कभी-कभी सिर्फ सुन लेना ही बच्चे को हल्का महसूस करा देता है।
माता-पिता को चाहिए कि वे खुद भी शांत रहें। अगर आप तनावग्रस्त दिखेंगे तो बच्चा भी वैसा ही महसूस करेगा। अपनी चिंताओं को बच्चे पर न थोपें। उसे यह विश्वास दिलाएं कि परिणाम चाहे जो भी हो, आप उसके साथ हैं।
परीक्षा से पहले की रात विशेष तैयारी
मनोचिकित्सकों ने कहा कि परीक्षा से एक रात पहले कुछ नया पढ़ने की कोशिश न करें। उस समय पहले से पढ़े हुए विषयों को हल्के से दोहराएं। सुबह परीक्षा केंद्र जाने से पहले पौष्टिक नाश्ता जरूर करें। परीक्षा हॉल में जाने से कुछ मिनट पहले गहरी सांस लें और सकारात्मक सोच रखें।
अगर किसी प्रश्न का उत्तर नहीं आ रहा तो घबराएं नहीं। पहले आसान प्रश्नों को हल करें, इससे आत्मविश्वास बढ़ेगा। समय प्रबंधन पर ध्यान दें और हर प्रश्न को उचित समय दें।
Board Exam Tips: कब लें पेशेवर मदद
डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि अगर बच्चे में अत्यधिक घबराहट, लगातार रोना, खाना न खाना, आत्महत्या जैसे विचार या किसी भी तरह का आत्म-नुकसान करने की प्रवृत्ति दिखे, तो तुरंत मनोचिकित्सक से परामर्श लें। मानसिक स्वास्थ्य शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण है और इसमें किसी तरह की शर्म या झिझक की जगह नहीं है।
पटना के विशेषज्ञों ने अंत में कहा कि बोर्ड परीक्षा जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक पड़ाव है। सफलता और असफलता दोनों से सीखना है। महत्वपूर्ण यह है कि बच्चा मानसिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहे। अभिभावक और छात्र दोनों मिलकर सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ इस चुनौती का सामना करें तो बेहतर परिणाम मिलते हैं।



