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Iran Attack 2026: Donald Trump का ईरान पर हमला, परमाणु नहीं, Bitcoin था असली टारगेट

Iran Attack 2026: 28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला बोला, तो पूरी दुनिया की मीडिया ने इसे परमाणु ठिकानों पर हमले के रूप में दिखाया। कुछ लोगों ने कहा कि यह तेल के कुओं पर कब्जे की कोशिश है। कुछ ने कहा कि यह ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई को कमजोर करने की रणनीति है।

लेकिन इन सबके बीच एक असली कहानी थी जिस पर किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। न तो मुख्यधारा की मीडिया ने इस पर विस्तार से लिखा और न ही आम लोगों तक यह बात पहुँची। असल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का सबसे बड़ा निशाना था ईरान की वह गुप्त डिजिटल तिजोरी जिसने सालों से अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों को बेअसर कर दिया था। और यह तिजोरी थी बिटकॉइन माइनिंग।

Iran Attack 2026: पाबंदियों से बचने का ईरानी फॉर्मूला, तेल से बिजली, बिजली से बिटकॉइन

Iran Attack 2026

2018 में जब अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए तो ईरान की मुद्रा रियाल की कीमत 96 फीसदी तक गिर गई। डॉलर में कारोबार बंद हो गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बेचना मुश्किल हो गया। दुनिया के बड़े बैंकों ने ईरान से नाता तोड़ लिया।

लेकिन ईरान की सरकार और उसकी शक्तिशाली सेना रिवोल्यूशनरी गार्ड यानी IRGC चुप नहीं बैठी। उन्होंने एक ऐसा रास्ता निकाला जिसे दुनिया का कोई देश आसानी से नहीं रोक सकता था। उनकी सोच सीधी थी अगर तेल बाहर नहीं बेच सकते तो उस तेल और गैस से बिजली बनाओ। और उस सस्ती बिजली से बिटकॉइन माइन करो।

बिटकॉइन एक डिजिटल मुद्रा है जिसे कोई बैंक या सरकार रोक नहीं सकती। यह इंटरनेट पर चलती है और इसके जरिए दुनिया के किसी भी कोने में पैसे भेजे और लिए जा सकते हैं। यह वह रास्ता था जिससे सारी पाबंदियाँ बेकार हो जाती थीं।

IRGC के गुप्त बिटकॉइन कारखाने

ईरान की सेना IRGC ने इस काम के लिए देशभर में बड़े-बड़े गोदाम और कारखाने बनाए। इन जगहों पर हजारों की संख्या में बिटकॉइन माइनिंग मशीनें दिन-रात काम करती थीं। इनके लिए अलग बिजली लाइन बिछाई गई थी ताकि कभी बिजली न जाए।

इस पूरे खेल को और फायदेमंद बनाने वाली बात यह थी कि ईरान में बिजली बेहद सस्ती है। जहाँ दुनिया के बाकी देशों में एक बिटकॉइन माइन करने में लाखों रुपये का खर्च आता है, वहीं ईरान की सेना को एक बिटकॉइन बनाने में सिर्फ 1,000 से 3,000 डॉलर का खर्च आता था। और बाजार में उस वक्त एक बिटकॉइन की कीमत 68,000 डॉलर यानी करीब 56 लाख रुपये थी। यानी एक बिटकॉइन पर 65,000 डॉलर तक का सीधा मुनाफा।

फरवरी 2026 में अमेरिका में एक बिटकॉइन माइन करने की औसत लागत करीब 87,000 डॉलर थी, जबकि बाजार में कीमत 70,000 डॉलर के आसपास थी। यानी अमेरिका में बिटकॉइन बनाना घाटे का सौदा था, लेकिन ईरान में यह सोने की खान थी। अमेरिका के मुकाबले यह 67 गुना सस्ती पड़ती थी।

आम लोगों की बत्ती गई, सेना की मशीनें चलती रहीं

इस पूरे खेल का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह था कि जब ईरान में बिजली की कमी होती थी तो आम नागरिकों के घरों और दुकानों की बिजली काट दी जाती थी। लेकिन सेना के इन गुप्त बिटकॉइन कारखानों की मशीनें एक पल के लिए भी नहीं रुकती थीं। CNN और Amuseonx की रिपोर्टों में इस बात का विस्तार से जिक्र किया गया है।

2019 से 2026 तक के पूरे समय का हिसाब लगाएं तो ईरान ने संभवतः 54,000 से 1,26,000 बिटकॉइन माइन किए थे। इनकी कुल कीमत 1.35 अरब से 3.15 अरब डॉलर के बीच बताई जाती है। यह रकम किसी छोटे देश के पूरे साल के बजट से भी ज्यादा है।

हमले का पहला निशाना, बिजलीघर और इंटरनेट

28 फरवरी को जब हमला हुआ तो अमेरिका ने सिर्फ इमारतें नहीं उड़ाईं। सबसे पहले ईरान के उन बिजलीघरों को निशाना बनाया गया जहाँ से इन बिटकॉइन मशीनों को बिजली मिलती थी। साथ ही इंटरनेट के उन रास्तों को भी तोड़ा गया जिनसे यह डिजिटल कारोबार चलता था।

जैसे ही हमला शुरू हुआ, ब्लॉकचेन विश्लेषकों को ईरान के डिजिटल बाजारों में असामान्य हलचल दिखने लगी। लोगों ने डर के मारे अपना डिजिटल पैसा निकालना शुरू कर दिया। हमले के कुछ ही मिनटों में पैसा निकालने की रफ्तार 700 फीसदी तक बढ़ गई।

नेशनल काउंसिल ऑफ रेसिस्टेंस ऑफ ईरान की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के सबसे बड़े क्रिप्टो एक्सचेंज Nobitex से 28 फरवरी से 2 मार्च के बीच 10.3 मिलियन डॉलर निकाले गए और प्रति घंटे होने वाले लेनदेन की मात्रा 2026 के औसत से 873 फीसदी ऊपर चली गई।

बंद इंटरनेट के बावजूद 1,100 मशीनें चलती रहीं

ईरान की सरकार ने हमले के बाद पूरे देश का इंटरनेट बंद कर दिया ताकि दुनिया को पता न चले कि अंदर क्या हो रहा है। NetBlocks के आंकड़ों के मुताबिक देश की इंटरनेट कनेक्टिविटी सामान्य स्तर के महज 1 फीसदी पर आ गई।

लेकिन इसके बावजूद साइबर इंटेलिजेंस फर्म RAKIA के शोधकर्ताओं ने ईरान के भीतर 1,100 से ज्यादा सक्रिय क्रिप्टोकरेंसी नोड्स का पता लगाया। MEXC की एक रिपोर्ट में साइबर विशेषज्ञ टॉम माल्का के हवाले से लिखा गया कि जब पूरे देश का इंटरनेट बंद हो और फिर भी हजारों कंप्यूटर काम कर रहे हों, तो यह साफ है कि यह आम जनता का काम नहीं बल्कि सरकार या सेना का काम है।

ट्रंप की तीन तरफा घेराबंदी बम, पैसा और कानून

ट्रंप ने ईरान को घुटनों पर लाने के लिए सिर्फ सैन्य ताकत का इस्तेमाल नहीं किया बल्कि तीन अलग-अलग तरीकों से एक साथ हमला किया।

पहला: सैन्य हमले में ईरान के उन बिजलीघरों को तबाह किया गया जहाँ से बिटकॉइन मशीनों को बिजली मिलती थी। बिजली कटते ही मशीनें ठंडी पड़ गईं और बिटकॉइन बनाना बंद हो गया।

दूसरा: जनवरी 2026 में ही अमेरिका के खजाना विभाग ने दो बड़े डिजिटल बाजारों यानी क्रिप्टो एक्सचेंज पर ताला लगा दिया था। ये वही जगहें थीं जहाँ से ईरान की सेना चुपके से अरबों डॉलर का लेनदेन कर रही थी।

तीसरा:  CoinGeek की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के न्याय विभाग ने दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजार Binance की भी जाँच शुरू कर दी ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या ईरान ने इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अपनी सेना को पैसे पहुँचाने के लिए किया था।

ईरान की तबाही, बाकी दुनिया की कमाई

जब ईरान के बिटकॉइन कारखाने बंद हुए तो इसका सीधा असर पूरी दुनिया के डिजिटल बाजार पर पड़ा। 1 मार्च 2026 को दुनियाभर में बिटकॉइन माइनिंग की रफ्तार अपने सबसे ऊँचे स्तर 1,083 EH/s पर थी। लेकिन हमलों के बाद 16 मार्च तक यह गिरकर 954 EH/s पर आ गई यानी 12 फीसदी की बड़ी गिरावट।

इस गिरावट का एक दिलचस्प नतीजा यह निकला कि जो बिटकॉइन पहले ईरान को मिलते थे, वे अब दुनिया के बाकी देशों के माइनर्स में बंटने लगे। अमेरिका के टेक्सास, रूस और कजाकिस्तान के बिटकॉइन बनाने वालों की कमाई बिना कुछ किए घर बैठे बढ़ गई।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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