डेस्क: आज यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि शादियाँ इसलिए नहीं टूट रहीं क्योंकि लड़के या लड़कियाँ गलत हैं, बल्कि इसलिए टूट रही हैं क्योंकि समाज ने विवाह को संस्कार से हटाकर प्रदर्शन बना दिया है। बीते कुछ समय में जिस तेजी से तलाक और पारिवारिक विवाद बढ़े हैं, वह किसी एक परिवार या पीढ़ी की असफलता नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच का आईना है। चालीस दिनों में डेढ़ सौ शादियों का टूटना कोई सामान्य आँकड़ा नहीं, बल्कि यह चेतावनी है कि विवाह की मौलिक भावना को हमने खो दिया है।
आज विवाह का मूल्य प्रेम, समझ और सहमति से नहीं, बल्कि खर्च, दिखावे और सामाजिक दबाव से तय होने लगा है। ऐसे में जब रिश्ते बोझ बन जाते हैं, तो उनका टूटना स्वाभाविक हो जाता है। अदालतों में बढ़ते पारिवारिक मुकदमे इस बात का प्रमाण हैं कि समाज ने अपने ही बनाए नियमों से परिवारों को तोड़ने का काम किया है।
शास्त्रों की मर्यादा और समाज की मनमानी

भारतीय शास्त्रों में विवाह को जीवन का सबसे पवित्र संस्कार माना गया है। मनुस्मृति, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र स्पष्ट रूप से कहते हैं कि विवाह सामर्थ्य के अनुसार होना चाहिए, न कि दिखावे और प्रतिस्पर्धा के अनुसार। शास्त्रों के अनुसार वर-वधू की स्वेच्छा, कन्यादान, अग्नि साक्षी, सप्तपदी, सिंदूर-मंगलसूत्र और आशीर्वाद से विवाह पूर्ण होता है। इसके आगे किसी प्रकार का आडंबर या दबाव शास्त्रसम्मत नहीं है।
लेकिन समाज ने इन सीमाओं को कब का तोड़ दिया है। विवाह अब संस्कार नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का मंच बन गया है, जहाँ परिवार अपनी हैसियत साबित करने की होड़ में उतर जाते हैं। शास्त्रों की सादगी और मर्यादा की जगह समाज की मनमानी ने ले ली है, जिसका सीधा असर रिश्तों की मजबूती पर पड़ा है।
आडंबर की परंपरा और दिखावे का दबाव
आज जिस चीज़ को परंपरा कहा जा रहा है, वह दरअसल शोर, खर्च और दिखावे का गठजोड़ है। डीजे का कान फोड़ू संगीत, जयमाला का मंचीय तमाशा, सड़क पर बारात और जाम, लेज़र लाइट, प्री-वेडिंग शूट, सोशल मीडिया पर रील्स और फोटो प्रदर्शन—इनमें से किसी का भी उल्लेख शास्त्रों में नहीं मिलता। इसके बावजूद इन्हें विवाह का अनिवार्य हिस्सा बना दिया गया है। समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब यह दिखावा सामर्थ्य से बाहर चला जाता है। लोग कर्ज़ लेकर विवाह करते हैं, जीवन भर की कमाई एक रात में खर्च कर देते हैं और फिर उसी विवाह से उपजे तनाव में रिश्ते टूट जाते हैं। यह स्थिति न केवल आर्थिक संकट पैदा करती है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक दबाव भी बढ़ाती है।
कन्या और वर पक्ष पर समाज का मानसिक अत्याचार

विवाह के नाम पर समाज दोनों पक्षों पर एक अदृश्य दबाव बनाता है। कन्या पक्ष से अपेक्षा की जाती है कि हर वस्तु “समाज के हिसाब” से हो—चाहे उसकी जरूरत हो या नहीं। पलंग कम हो जाए तो कंजूसी का ठप्पा, साधारण फ्रिज हो तो औकात पर सवाल, बाइक न हो तो रिश्ते को कमतर समझा जाता है।
दूसरी ओर वर पक्ष भी कम दोषी नहीं है। गहने हल्के हों तो लड़की को खाली हाथ आई कहा जाता है, साड़ियों की संख्या कम हो तो इज्जत न रखने का आरोप लगाया जाता है। यह सब परंपरा नहीं, बल्कि मानसिक उत्पीड़न है, जो विवाह के पहले दिन से ही रिश्ते में कड़वाहट घोल देता है।
समाज की भाषा और रिश्तों का जहर
समाज द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द—कंजूस, लालची, भिखारी, नाक कट गई—सिर्फ शब्द नहीं होते, बल्कि वे जहर होते हैं जो धीरे-धीरे रिश्तों को खत्म कर देते हैं। यही शब्द आगे चलकर झगड़े, ताने और अंततः अदालत तक पहुँचने का कारण बनते हैं।
अक्सर देखा जाता है कि विवाह के समय जो अपमान सहन किया जाता है, वही भविष्य में तलाक की नींव बनता है। समाज शायद यह भूल जाता है कि उसके बोले गए शब्द किसी परिवार की पूरी जिंदगी को प्रभावित कर सकते हैं।
दहेज: परंपरा नहीं, अपराध
शास्त्रों में दहेज को स्पष्ट रूप से कन्या विक्रय और महापाप बताया गया है। इसके बावजूद समाज इसे परंपरा का नाम देकर स्वीकार करता रहा है। यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। दहेज न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि यह धर्म और मानवता दोनों का अपमान है।
जब तक दहेज को सामाजिक स्वीकृति मिलती रहेगी, तब तक विवाह एक सौदा बना रहेगा। और जहाँ सौदा होगा, वहाँ रिश्ते टिक नहीं सकते। दहेज ने विवाह को प्रेम और साझेदारी से हटाकर लेन-देन का माध्यम बना दिया है।
विदेशी समाजों से सीख और भारतीय विडंबना
दुनिया के कई देशों में विवाह सादगी और समझ का प्रतीक है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और जर्मनी जैसे देशों में विवाह सीमित खर्च और सरल प्रक्रिया के साथ होता है। वहाँ विवाह जीवन की शुरुआत माना जाता है, न कि आर्थिक बोझ।
इसके विपरीत भारत में पूरी जिंदगी की कमाई, कर्ज़ और सामाजिक दबाव एक विवाह पर लाद दिया जाता है। फिर आश्चर्य जताया जाता है कि रिश्ते क्यों टूट रहे हैं। यह विडंबना नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक असफलता है।
समाज के नाम अंतिम चेतावनी
यदि समाज आज भी नहीं संभला, तो कल हालात और भयावह होंगे। आज किसी और की बेटी को तानों से अपमानित किया जा रहा है, कल वही समाज अपने ही दरवाज़े पर खड़ा होगा। तब अदालतें और भरी होंगी, रिश्ते और टूटेंगे, और समाज फिर मौन रहेगा। विवाह सामर्थ्य के अनुसार होगा, समाज-भूज के अनुसार नहीं—यह फैसला अब समाज को करना है। या तो वह शास्त्रों की मर्यादा अपनाए, या फिर अपने बनाए बोझ के नीचे दबता चला जाए।
निष्कर्ष: संस्कार बचाइए, समाज बचेगा
विवाह संस्कार है, किसी की सामाजिक हैसियत साबित करने का ठेका नहीं। जब तक यह बात समाज नहीं समझेगा, तब तक शादियों का टूटना नहीं रुकेगा। आज भी समय है कि विवाह को उसकी मूल गरिमा लौटाई जाए—सादगी, सहमति और सम्मान के साथ।


