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पलामू में खनन विभाग का चौंकाने वाला कारनामा, जहां बालू है ही नहीं वहां 7 जगहों को बना दिया Category-1 बालू घाट, मुखियाओं ने खोली पोल, जिला खनन पदाधिकारी ने दी सफाई

Jharkhand News: झारखंड के पलामू जिले में खनन विभाग की एक ऐसी चौंकाने वाली कार्यप्रणाली सामने आई है जिसने स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को हैरान कर दिया है। सतबरवा प्रखंड में जिला खनन कार्यालय पलामू ने एक आदेश जारी करके ऐसे 7 स्थलों को Category-1 बालू घाट घोषित कर दिया है जहां वास्तव में बालू का कोई अस्तित्व ही नहीं है। न वहां कोई नदी है और न ही बालू का कोई स्थायी स्रोत। इस पूरे मामले को जिले में एक गंभीर प्रशासनिक चूक माना जा रहा है। बकोरिया, घुटुआ और रेवारातू तीनों पंचायतों की मुखियाओं ने खुलकर विभाग के इस निर्णय की पोल खोली है और कहा है कि इन स्थलों पर एक ट्रैक्टर बालू निकालना भी संभव नहीं है। यह मामला अब प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत की ओर इशारा कर रहा है।

क्या है पूरा मामला?

Jharkhand News - Palamu Sand Controversy
Jharkhand News – Palamu Sand Controversy

जिला खनन कार्यालय पलामू ने पत्रांक 382/एमओ दिनांक 13 फरवरी 2026 के तहत सतबरवा प्रखंड की बकोरिया, घुटुआ और रेवारातू पंचायतों के 7 स्थलों को बालू घाट के रूप में आधिकारिक रूप से सूचीबद्ध किया है। इनमें घुटुआ पंचायत में 4 स्थल, बकोरिया पंचायत में 2 स्थल और रेवारातू पंचायत में 1 स्थल शामिल है।

लेकिन जब स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जानकारों ने इन स्थलों का भौगोलिक सत्यापन किया तो एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। इनमें से किसी भी स्थल पर न तो नदी बहती है और न ही बालू का कोई स्थायी और पर्याप्त स्रोत मौजूद है। क्षेत्र में बालू का एकमात्र स्रोत औरंगा नदी है जो इन चिह्नित स्थलों से बिल्कुल अलग पंचायतों से होकर गुजरती है।

तीनों पंचायत मुखियाओं ने खोली पोल

इस मामले में तीनों प्रभावित पंचायतों की मुखियाओं ने खुलकर विभाग के इस फैसले का विरोध किया है और जमीनी हकीकत बताई है।

बकोरिया पंचायत की मुखिया संतोष उरांव ने कहा कि जिन स्थानों पर बालू उठाव की बात की जा रही है वहां एक ट्रैक्टर बालू निकालना भी संभव नहीं है। उनका यह बयान इस पूरे मामले की गंभीरता को स्पष्ट करता है। यदि एक ट्रैक्टर भी बालू नहीं निकाली जा सकती तो इन स्थलों को Category-1 बालू घाट घोषित करना किस आधार पर किया गया यह बड़ा सवाल है।

घुटुआ पंचायत की मुखिया मनीता देवी ने बताया कि सोहड़ी नाला में वर्षों पहले बालू था लेकिन अब वहां बालू नाममात्र बची है जो किसी भी निर्माण कार्य के योग्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान जमीनी स्थिति का सर्वेक्षण किए बिना इस तरह का निर्णय लेना पूरी तरह अनुचित है।

रेवारातू पंचायत की मुखिया अनिता देवी ने कहा कि चपराना नाला में अब बालू नहीं बची है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्थल जांच किए बिना लिया गया यह निर्णय पूरी तरह गलत है और इसे तत्काल रद्द किया जाना चाहिए।

तीन साल पुरानी रिपोर्ट पर लिया गया निर्णय

इस पूरे विवाद पर जिला खनन पदाधिकारी सुनील कुमार ने सफाई देते हुए कहा कि यह निर्णय तीन वर्ष पूर्व की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि स्थल पर बालू उपलब्ध होगी तो उठाव किया जाएगा अन्यथा संभवतः उठाव नहीं होगा।

लेकिन यह सफाई खुद ही कई सवाल खड़े करती है। तीन साल पुरानी रिपोर्ट के आधार पर बालू घाट घोषित करना और वर्तमान जमीनी स्थिति की जांच न करना प्रशासनिक जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं है। बालू की उपलब्धता एक बदलती हुई भौगोलिक स्थिति है जो नदियों के मार्ग परिवर्तन, मौसम और खनन से प्रभावित होती है। ऐसे में पुरानी रिपोर्ट के आधार पर घाट घोषित करना और बाद में देखा जाएगा जैसा रवैया अपनाना जिम्मेदारी से बचने जैसा है।

प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत का आरोप

स्थानीय जानकार और जनप्रतिनिधि इस पूरे मामले को दो नजरियों से देख रहे हैं। पहला नजरिया यह है कि यह महज एक प्रशासनिक लापरवाही और जल्दबाजी में लिया गया गलत निर्णय है जो बिना जमीनी सत्यापन के लिया गया।

दूसरा नजरिया यह है कि बिना बालू वाले स्थलों को बालू घाट घोषित करने के पीछे कोई सुनियोजित मंशा हो सकती है। जब एक बार किसी स्थल को आधिकारिक रूप से बालू घाट घोषित कर दिया जाता है तो उस क्षेत्र में अवैध बालू खनन के लिए एक कानूनी आड़ मिल जाती है। ऐसे में संदेह स्वाभाविक है कि क्या यह पूरी प्रक्रिया किसी अवैध खनन माफिया की सुविधा के लिए तो नहीं की गई।

झारखंड में अवैध बालू खनन की बड़ी समस्या

पलामू का यह मामला अकेला नहीं है। झारखंड में अवैध बालू खनन एक बड़ी और गंभीर समस्या बन चुकी है। नदियों से अंधाधुंध बालू खनन न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है बल्कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को भी बाधित करता है। इससे नदियों का जल स्तर कम होता है, भूमिगत जल का संकट बढ़ता है और किसानों की सिंचाई व्यवस्था प्रभावित होती है।

पलामू जिले में पहले भी फोरलेन सड़क निर्माण के नाम पर अवैध मिट्टी खनन की खबरें आई हैं जिसमें चार एकड़ भूमि नष्ट हो गई और दर्जनों पेड़ उखाड़ दिए गए थे। इससे स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में खनन से जुड़े मामलों में लापरवाही और अनियमितता एक बड़ी समस्या है।

Jharkhand News: क्या होनी चाहिए कार्रवाई?

इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करना जरूरी है। सबसे पहले जिला खनन कार्यालय को इन सातों स्थलों का तत्काल जमीनी सर्वेक्षण कराना चाहिए। यदि वास्तव में वहां पर्याप्त बालू नहीं है तो इन स्थलों को बालू घाट की सूची से हटाया जाना चाहिए। इसके अलावा तीन साल पुरानी रिपोर्ट के आधार पर घाट घोषित करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। झारखंड सरकार को इस मामले की उच्च स्तरीय जांच करानी चाहिए ताकि यदि कोई अवैध खनन की साजिश है तो वह उजागर हो सके।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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