वाराणसी – आजकल हर कोई स्वस्थ रहने के लिए अच्छी डाइट पर ध्यान देता है। हम सलाद खाते हैं, जिम जाते हैं और जंक फूड से दूर रहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी रसोई में इस्तेमाल होने वाले बर्तन भी आपकी सेहत को प्रभावित कर सकते हैं? जी हां, खासकर नॉन-स्टिक बर्तन, जो आसानी से उपलब्ध हैं और कम तेल में खाना बनाने का वादा करते हैं, लेकिन इनमें छुपे खतरे सेहत के लिए गंभीर हो सकते हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि नॉन-स्टिक बर्तनों से दूरी बनाना जरूरी है। आइए इस बारे में विस्तार से समझते हैं।
नॉन-स्टिक बर्तन क्या हैं और क्यों पॉपुलर हैं?
नॉन-स्टिक बर्तन टेफ्लॉन कोटिंग से बने होते हैं, जिसे पॉलीटेट्राफ्लूरोएथिलीन (PTFE) कहते हैं। इस कोटिंग की वजह से खाना बर्तन में चिपकता नहीं है, कम तेल लगता है और साफ करना आसान होता है। घरों में डोसा, परांठा, ऑमलेट जैसी चीजें बनाने के लिए ये बहुत पसंद किए जाते हैं। लेकिन सुविधा के साथ खतरा भी आता है।
एक्सपर्ट की चेतावनी: इनमें छुपे हैं जहरीले केमिकल
ICMR की नई डाइटरी गाइडलाइंस में साफ कहा गया है कि नॉन-स्टिक बर्तनों में खाना बनाना सेहत के लिए ठीक नहीं है। इनकी कोटिंग में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स, जैसे PFAS (पर और पॉलीफ्लूरोअल्काइल सब्सटेंस) और पहले इस्तेमाल होने वाला PFOA, उच्च तापमान पर जहरीले धुएं छोड़ते हैं। हालांकि PFOA को अब ज्यादातर बर्तनों से हटा दिया गया है, लेकिन नए केमिकल्स भी उतने ही खतरनाक हैं।विशेषज्ञों के अनुसार, जब ये बर्तन ज्यादा गर्म होते हैं या कोटिंग खराब हो जाती है, तो छोटे-छोटे पार्टिकल्स खाने में मिल जाते हैं। ये शरीर में जमा होकर हार्मोन असंतुलन, थायरॉइड समस्या, किडनी-लिवर की बीमारियां और यहां तक कि कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं। अमेरिकन कैंसर सोसाइटी और अन्य स्टडीज भी यही कहती हैं कि लंबे समय तक इनका इस्तेमाल जोखिम भरा है।
नॉन-स्टिक बर्तनों के मुख्य नुकसान
जहरीले धुएं का खतरा: 260 डिग्री से ज्यादा तापमान पर ये धुआं छोड़ते हैं, जिससे ‘टेफ्लॉन फ्लू’ जैसी बीमारी हो सकती है। इसमें बुखार, सिरदर्द और सांस की तकलीफ होती है।
कैंसर और हार्मोन समस्या: PFAS केमिकल्स शरीर में जमा होकर ब्रेस्ट, प्रोस्टेट या किडनी कैंसर का कारण बन सकते हैं। महिलाओं में फर्टिलिटी प्रभावित होती है।
इम्यून सिस्टम कमजोर: ये केमिकल्स रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करते हैं, जिससे संक्रमण आसानी से होता है।
खराब कोटिंग का खतरा: अगर बर्तन पुराना हो या खरोंच लग जाए, तो कोटिंग खाने में मिल जाती है, जो लंबे समय में लीवर और थायरॉइड को नुकसान पहुंचाती है।
पर्यावरण को भी नुकसान: ये केमिकल्स पर्यावरण में नहीं घुलते, इसलिए ‘फॉरएवर केमिकल्स’ कहलाते हैं।
अगर इस्तेमाल कर रहे हैं तो ये सावधानियां बरतें अगर आप अभी नॉन-स्टिक बर्तन इस्तेमाल कर रहे हैं, तो पूरी तरह छोड़ने से पहले कुछ नियम अपनाएं:
. मध्यम आंच पर ही खाना बनाएं, कभी खाली बर्तन को ज्यादा गर्म न करें।
. लकड़ी या सिलिकॉन की कलछी इस्तेमाल करें, धातु की नहीं।
. कोटिंग खराब हो जाए तो तुरंत बदल दें।
. ज्यादा तापमान वाली चीजें जैसे तलना या भूनना इनमें न करें।
. लेकिन सबसे अच्छा है कि धीरे-धीरे इनसे दूरी बनाएं।
बेहतर विकल्प: पारंपरिक बर्तनों की वापसी एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि पुराने भारतीय बर्तनों की ओर लौटें, जो न सिर्फ सुरक्षित हैं बल्कि सेहत के लिए फायदेमंद भी:
. लोहे के बर्तन: एनीमिया दूर करते हैं, क्योंकि खाने में आयरन मिलता है।
. स्टेनलेस स्टील: मजबूत, साफ और कोई केमिकल नहीं रिसता।
. मिट्टी के बर्तन: सबसे सुरक्षित, खाना स्वादिष्ट बनता है और पोषक तत्व बरकरार रहते हैं।
. कास्ट आयरन या ग्रेनाइट कोटिंग वाले: अच्छे विकल्प, लेकिन कोटिंग फ्री चुनें।
. पीतल या कांसा: पुराने समय में इस्तेमाल होते थे, एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं।
ICMR भी मिट्टी, स्टील और ग्रेनाइट बर्तनों की सिफारिश करता है।
निष्कर्ष: छोटा बदलाव, बड़ी सेहत
अच्छी सेहत सिर्फ अच्छा खाना खाने से नहीं मिलती, बल्कि उसे कैसे पकाया जाता है, यह भी मायने रखता है। नॉन-स्टिक बर्तनों की सुविधा आकर्षक है, लेकिन लंबे समय में ये आपकी सेहत को चुपके से नुकसान पहुंचा सकते हैं। एक्सपर्ट्स की सलाह मानें और पारंपरिक बर्तनों की ओर मुड़ें। आज से ही अपनी रसोई में बदलाव शुरू करें – कम तेल की जगह सुरक्षित बर्तन चुनें। इससे न सिर्फ आप स्वस्थ रहेंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी सुरक्षित रहेंगी। याद रखें, सेहत का राज डाइट के साथ-साथ सही बर्तनों में भी छुपा है!



