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लोकसभा सीटें बढ़ाने का बिल गिरा: विकास का मौका चूके या खतरे से बचे? जानें इस पूरी बहस की असली कहानी

Lok Sabha Expansion Debate: संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े बिल पर जो घमासान हुआ, उसने एक बड़ा सवाल सबके सामने खड़ा कर दिया है। लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव विपक्ष के विरोध के कारण आगे नहीं बढ़ सका। सत्तापक्ष ने इसे लोकतंत्र के विस्तार का मौका बताया तो विपक्ष ने इसे सत्ता की राजनीति करार दिया। लेकिन इस पूरी बहस के बीच एक बेहद जरूरी सवाल दब गया कि अगर 300 नए सांसद आते तो क्या सच में देश का भला होता या बस सरकारी खर्च और राजनीतिक ताकत का नया खेल शुरू होता।

543 से 850, सिर्फ संख्या का खेल या कुछ और

सरकार का तर्क था कि देश की आबादी बहुत तेजी से बढ़ी है और आज एक सांसद लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। इतनी बड़ी आबादी में एक नेता के लिए हर इंसान की बात सुनना और हर समस्या को संसद तक पहुंचाना लगभग नामुमकिन है। इसलिए सीटें बढ़ाना एक जरूरत है।

यह तर्क अपनी जगह बिल्कुल सही है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में सांसदों की संख्या आबादी के हिसाब से तय होती है। भारत में यह संख्या दशकों से नहीं बढ़ी जबकि आबादी कई गुना हो गई। इस नजरिए से देखें तो सीटें बढ़ाना सच में जनता की आवाज को संसद में ज्यादा जगह देने का एक तरीका हो सकता है।

लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि सीटें बढ़ानी चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि जो नए सांसद आएंगे, वे सच में जनता की आवाज बनेंगे या बस एक और सरकारी खर्च का बोझ।

गाड़ियां, बंगले और काफिले, यही है असली चिंता

जब भी संसद सदस्यों की संख्या बढ़ने की बात होती है तो एक अलग तस्वीर भी उभरती है। हर नए सांसद के साथ कई गाड़ियां, बड़ा बंगला, सुरक्षाकर्मियों का काफिला और दर्जनों सहायकों की फौज आती है। यह सब सरकारी खजाने से चलता है यानी आम करदाता की जेब से।

300 नए सांसद मान लें तो हजारों नई सरकारी नौकरियां बनेंगी, नई गाड़ियां खरीदी जाएंगी, नए बंगले बनाए जाएंगे और पूरा तामझाम खड़ा होगा। इसमें जो पैसा लगेगा वह अस्पताल, स्कूल और सड़कों पर लग सकता था। अगर यह नए सांसद जनता की असली समस्याओं को संसद में उठाएंगे और सरकार को जवाबदेह बनाएंगे तो यह खर्च सही है। लेकिन अगर यह सिर्फ एक और परत है जो लोकतंत्र को दिखाने के काम आए और असल में कुछ न बदले तो फिर यह खर्च बेकार है।

परिसीमन का असली दांव, दक्षिण बनाम उत्तर

Lok Sabha Expansion Debate
Lok Sabha Expansion Debate

इस पूरी बहस में एक और पहलू है जिसे समझे बिना तस्वीर अधूरी रहती है। नई सीटें 2011 की जनगणना के आधार पर तय होंगी। भारत में उत्तर के राज्यों में जनसंख्या दक्षिण के मुकाबले बहुत तेजी से बढ़ी है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है। लेकिन इस काम की कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है।

जिन राज्यों ने जनसंख्या को काबू में रखा, उनकी लोकसभा सीटें नए परिसीमन में कम हो सकती हैं या उनका अनुपात घट सकता है। जिन राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी, उन्हें ज्यादा सीटें मिलेंगी और इससे संसद में उनकी ताकत बढ़ेगी। यही वह बिंदु है जिसने दक्षिण भारत के राज्यों और उनकी पार्टियों को सबसे ज्यादा परेशान किया।

डीएमके, टीडीपी और अन्य दक्षिणी दलों ने खुलकर कहा कि यह व्यवस्था उनके साथ अन्याय है। जिस राज्य ने जिम्मेदारी दिखाई, उसे इनाम की जगह सजा मिलेगी। यह एक ऐसी नीति है जो गलत उदाहरण पेश करती है।

विपक्ष का डर या जायज सवाल

सत्तापक्ष का कहना है कि विपक्ष सिर्फ इसलिए विरोध कर रहा है क्योंकि नए परिसीमन में उसकी ताकत कमजोर पड़ सकती है। यह बात पूरी तरह गलत भी नहीं है। जब भी कोई बड़ा राजनीतिक फेरबदल होता है तो हर पार्टी पहले अपना नफा-नुकसान देखती है।

लेकिन विपक्ष की कुछ चिंताएं सच में जायज हैं। महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने का कोई तार्किक कारण नहीं था। 2023 में जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास हुआ था तब भी इसे टाला गया और अब फिर से नई शर्तें जोड़ी जा रही हैं। अगर सरकार सच में महिलाओं को उनका हक देना चाहती है तो आज और अभी 543 सीटों में 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जा सकता है। इसके लिए परिसीमन का इंतजार क्यों।

लोकतंत्र की असली ताकत संख्या में नहीं

एक और गहरा सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र की गुणवत्ता सांसदों की संख्या से तय होती है। अगर हां, तो भारत में पहले से ही 543 सांसद हैं। लेकिन संसद में कितनी बार असली बहस होती है, कितनी बार बिल बिना चर्चा के पास हो जाते हैं और कितनी बार सांसद अपने क्षेत्र की असली समस्याएं संसद में उठा पाते हैं। अगर 543 सांसद यह काम ठीक से नहीं कर पाए तो 850 करने से क्या बदलेगा।

जर्मनी, ब्रिटेन और अन्य विकसित लोकतंत्रों में संसद सदस्यों की संख्या भारत से कम है लेकिन वहां लोकतंत्र ज्यादा मजबूत और जवाबदेह है। इसकी वजह संख्या नहीं, संस्थाओं की मजबूती और पारदर्शिता है।

जवाबदेही बिना विस्तार बेकार

अगर भारत की संसद को सच में मजबूत बनाना है तो सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि मौजूदा सांसद ज्यादा जवाबदेह हों। हर सांसद के काम का हर साल मूल्यांकन हो। संसद में कितने दिन उपस्थित रहे, कितने सवाल पूछे, कितने बिलों पर बोले, यह सब सार्वजनिक हो और जनता इस आधार पर फैसला करे।

इसके साथ ही उन खर्चों पर भी लगाम लगाना जरूरी है जो जनप्रतिनिधियों की जिंदगी को आम आदमी से बिल्कुल अलग बना देते हैं। जब एक सांसद की जीवनशैली उसके क्षेत्र के आम मतदाता से इतनी अलग हो जाए तो वह प्रतिनिधित्व का असल मतलब भूल जाता है।

असली विकास क्या है, यही है बड़ा सवाल

इस पूरी बहस का सार एक सवाल में है और वह यह कि विकास किसे कहते हैं। अगर ज्यादा सांसद, ज्यादा गाड़ियां, ज्यादा बंगले और ज्यादा सरकारी नौकरियां विकास हैं तो यह बिल न पास होना सच में एक चूका हुआ मौका है। लेकिन अगर विकास का मतलब बेहतर स्कूल, अच्छे अस्पताल, साफ पानी, रोजगार और एक ऐसी सरकार है जो सच में जनता के प्रति जवाबदेह हो, तो फिर यह बहस पूरी तरह भटकी हुई लगती है।

300 नए सांसद अगर 300 नई जवाबदेह, सक्रिय और ईमानदार आवाजें बनते तो यह लोकतंत्र के लिए वाकई एक बड़ा कदम होता। लेकिन अगर यह सिर्फ 300 नए काफिले, 300 नए सायरन और 300 नए खर्च बनते, तो विपक्ष ने इसे रोककर कोई गलती नहीं की।

असली सुधार संख्या में नहीं, नीयत और नीति में है। और यह सुधार तब तक नहीं आएगा जब तक हम यह तय नहीं करते कि हमारे लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि सच में जनता के लिए काम करते हैं या सिर्फ सत्ता के लिए।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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