वाराणसी: चीन के साथ व्यापार का वो बड़ा चित्र जो हर भारतीय को समझना चाहिए चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है – 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 100 बिलियन डॉलर के पार पहुँच चुका है। लेकिन इसमें आयात 80-85% है – इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल पार्ट्स, मशीनरी, केमिकल्स, दवाइयाँ का कच्चा माल। निर्यात सिर्फ़ 15-20% – आयरन ओर, कॉटन, सीफूड। इससे ट्रेड डेफिसिट 70-80 बिलियन डॉलर तक पहुँच जाता है। सरकार PLI स्कीम, मेक इन इंडिया से लोकल मैन्युफैक्चरिंग बढ़ा रही है ताकि आयात कम हो। “व्यापार वो नहीं जो सिर्फ़ खरीद-बेच हो, वो वो है जो देश को मजबूत बनाए।”
आयात पर निर्भरता – फायदा और जोखिम दोनों
चीन से सस्ता और तेज़ माल मिलता है – मोबाइल, लैपटॉप, खिलौने सब सस्ते। इससे उपभोक्ता को फायदा, इंडस्ट्री को कच्चा माल। लेकिन जोखिम भी – सप्लाई चेन बाधित हो (जैसे कोविड में हुआ) तो पूरी इंडस्ट्री ठप। “सस्ता माल आज खुशी देता है, लेकिन निर्भरता कल चिंता देती है।”
हम क्यों ज़्यादा आयात करते हैं
मनोविज्ञान में “इमीडिएट ग्रैटिफिकेशन” कहते हैं – हमें तुरंत सस्ता चाहिए, भविष्य की चिंता बाद में। चीन की मैन्युफैक्चरिंग स्केल इतनी बड़ी कि सस्ता देता है। लेकिन लंबे में लोकल इंडस्ट्री कमज़ोर हो जाती है। “तुरंत का फायदा लंबे का नुकसान बन जाता है।”
भारत की कोशिशें – आत्मनिर्भर बनने की राह
सरकार ने चाइनीज़ ऐप्स बैन किए, FDI पर पाबंदी लगाई, PLI से मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स में लोकल प्रोडक्शन बढ़ाया। Apple, Samsung भारत में असेंबल कर रहे हैं। आयात कम हो रहा है। “जब हम खुद बनाते हैं, तो न सिर्फ़ पैसा बचता है, गर्व भी बढ़ता है।”
व्यापार में बैलेंस क्यों ज़रूरी है
चीन से व्यापार फायदा देता है, लेकिन बैलेंस न हो तो निर्भरता बढ़ती है। भारत निर्यात बढ़ा रहा है – फार्मा, टेक्सटाइल, एग्रीकल्चर। “अच्छा व्यापार वो है जहाँ दोनों तरफ़ बराबर लाभ हो।”
छोटे व्यापारियों और उपभोक्ताओं का नज़रिया
छोटे दुकानदार चाइनीज़ माल सस्ता होने से बेचते हैं, लेकिन लोकल माल महँगा पड़ता है। उपभोक्ता को सस्ता चाहिए। लेकिन लंबे में लोकल जॉब्स बढ़ेंगी। “सस्ता आज अच्छा लगता है, लेकिन आत्मनिर्भर कल बेहतर बनाता है।”
आखिरी बात –
चीन से व्यापार जारी रहेगा, लेकिन सावधानी से। आत्मनिर्भर भारत का सपना सच हो रहा है। “व्यापार वो नहीं जो सिर्फ़ कमाए, वो वो है जो देश को मजबूत बनाए।”



