भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रहा है, बल्कि यह परिवार, समाज और पीढ़ियों को जोड़ने वाला एक पवित्र संस्कार माना गया है। परंतु बीते कुछ दशकों में विवाह की अवधारणा तेजी से बदली है। आज विवाह को संस्कार के बजाय व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति के रूप में देखा जाने लगा है। प्रेम विवाह को साहस और स्वतंत्रता का प्रतीक बताया जा रहा है, जबकि पारिवारिक सहमति से होने वाले विवाह को पिछड़ी सोच कहा जाने लगा है। यह बदलाव केवल रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक और मानसिक परिणाम भी सामने आ रहे हैं, जिनसे परिवार व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।
वैदिक परंपरा में विवाह की भूमिका

वैदिक संस्कृति में विवाह को जीवन का सबसे जिम्मेदार चरण माना गया है। ब्रह्म विवाह, जिसमें परिवार, समाज और धर्म की सहमति शामिल होती है, इसलिए श्रेष्ठ कहा गया क्योंकि इसमें केवल भावनाओं नहीं, बल्कि भविष्य, संतति और सामाजिक संतुलन का भी ध्यान रखा जाता था। शास्त्रों में गंधर्व विवाह का उल्लेख अवश्य है, पर उसे श्रेष्ठ नहीं माना गया, क्योंकि वह केवल व्यक्तिगत आकर्षण पर आधारित होता है। वैदिक दृष्टि विवाह को अनुशासन, त्याग और उत्तरदायित्व से जोड़ती है, ताकि गृहस्थ जीवन समाज की नींव को मजबूत कर सके।
आधुनिकता की दौड़ और प्रेम विवाह का प्रभाव
आधुनिक समय में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च मूल्य माना जाने लगा है। “यह मेरी ज़िंदगी है” जैसे वाक्य समाज में सामान्य हो गए हैं। प्रेम विवाह को आधुनिक सोच का प्रतीक बताया जाता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणामों पर कम चर्चा होती है। प्रारंभिक वर्षों में भावनात्मक उत्साह और सामाजिक दिखावा आकर्षक लगता है, पर समय के साथ संस्कारों का टकराव, पारिवारिक दूरी और जिम्मेदारियों का बोझ सामने आने लगता है। कई मामलों में यही टकराव मानसिक तनाव, पारिवारिक कलह और संबंधों में स्थायी कड़वाहट का कारण बनता है।
माता-पिता की भूमिका और गार्जियनशिप का संकट
पहले माता-पिता परिवार के मार्गदर्शक होते थे। वे प्रेम को समझते थे, पर निर्णय संस्कार और अनुभव के आधार पर लेते थे। आज स्थिति बदल गई है। माता-पिता संतान को नाराज़ करने के डर से चुप रह जाते हैं। समाज का दबाव और भावनात्मक ब्लैकमेल उन्हें निर्णायक भूमिका से पीछे हटा देता है। परिणामस्वरूप संतान निर्णयकर्ता बन जाती है और माता-पिता दर्शक। यह स्थिति केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आगे आने वाली पीढ़ियों में भी अनुशासन और सम्मान की कमी पैदा करती है।
विवाह के बाद के सामाजिक और मानसिक परिणाम
प्रेम विवाह के बाद शुरुआती समय में सब कुछ सहज लगता है, लेकिन जैसे-जैसे जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, वास्तविकता सामने आती है। परिवारों के बीच दूरी बढ़ती है, सास-बहू के रिश्ते में तनाव उत्पन्न होता है और माता-पिता भावनात्मक रूप से अलग-थलग पड़ जाते हैं। बच्चों की परवरिश में भी यह असंतुलन दिखाई देता है, क्योंकि वे दो अलग-अलग संस्कारों और विचारधाराओं के बीच झूलते रहते हैं। मानसिक तनाव, अवसाद और पारिवारिक विवाद आज के शहरी समाज में आम होते जा रहे हैं, जिनकी जड़ में यही असंतुलन छिपा है।
शास्त्रीय चेतावनी और आज का यथार्थ

भगवद गीता में स्पष्ट कहा गया है कि कुलधर्म के नष्ट होने से संकर संतति उत्पन्न होती है, जिससे समाज पतन की ओर बढ़ता है। यह चेतावनी किसी युग विशेष के लिए नहीं थी, बल्कि हर समय के लिए प्रासंगिक है। जब परिवार की परंपराएँ टूटती हैं और उत्तरदायित्व की जगह केवल अधिकार को महत्व दिया जाता है, तब सामाजिक ढांचा कमजोर होता है। आज समाज में बढ़ते पारिवारिक विवाद, वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा और बच्चों में अनुशासन की कमी इसी चेतावनी को सत्य सिद्ध करती है।
अंतर-धार्मिक विवाह और पहचान का प्रश्न

आज के समय में अंतर-धार्मिक प्रेम विवाह भी एक संवेदनशील विषय बन चुका है। यह किसी समुदाय पर आरोप का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक परिणामों पर विचार का प्रश्न है। ऐसे विवाहों में अक्सर संतान की पहचान, पर्व-परंपरा और सांस्कृतिक जुड़ाव को लेकर असमंजस की स्थिति बनती है। प्रारंभ में सहमति और उत्साह रहता है, लेकिन समय के साथ परिवारों में दूरी और भावनात्मक टूटन देखने को मिलती है। यह स्थिति माता-पिता के लिए मानसिक पीड़ा का कारण बनती है, जो अक्सर समाज की चकाचौंध में अनदेखी रह जाती है।
प्रेम, त्याग और जिम्मेदारी का संतुलन

प्रेम को नकारा नहीं जा सकता, पर उसे मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। प्रेम यदि संस्कार और परंपरा के साथ चले तो वह परिवार को मजबूत करता है। माता-पिता का कर्तव्य है कि वे प्रेम को समझें, पर हर जिद को स्वीकार करना भी समाधान नहीं है। कभी-कभी अस्थायी कठोरता, स्थायी विनाश से बचा सकती है। समाज को यह समझना होगा कि स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है।
निष्कर्ष: समाज के लिए अंतिम आग्रह
विवाह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है। ब्रह्म विवाह जैसी व्यवस्थाएँ समाज को जोड़ने का कार्य करती हैं, जबकि अविवेकी निर्णय परिवारों को तोड़ सकते हैं। यह लेख किसी के विरोध में नहीं, बल्कि समाज को चेताने के उद्देश्य से लिखा गया है। यदि आज माता-पिता, गार्जियन और समाज अपनी भूमिका को समझें और संतुलित निर्णय लें, तो आने वाली पीढ़ियों को एक मजबूत और संस्कारित समाज दिया जा सकता है। कड़वा सत्य यही है कि परंपरा से कटकर आधुनिकता अपनाने की अंधी दौड़, अंततः समाज को ही नुकसान पहुँचाती है।



