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मुनीर के लिए अमेरिकी लंच बना जहर: गाजा में सैनिक भेजने का दबाव, पाकिस्तान कैसे फंसा अपनी नीति में?

डेस्क – पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इन दिनों एक बड़ी मुश्किल में फंस गए हैं। एक तरफ अमेरिका का दबाव है कि पाकिस्तान गाजा में अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल में अपनी सेना भेजे, दूसरी तरफ देश के अंदर विरोध की आंधी उठने का डर। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 20-सूत्रीय गाजा शांति योजना के तहत मुस्लिम देशों से सैनिक मांगे जा रहे हैं। पाकिस्तान पर यह दबाव क्यों बढ़ रहा है और मुनीर कैसे अपने ही बिछाए जाल में फंसते नजर आ रहे हैं? आइए सरल शब्दों में समझते हैं।

अमेरिका से बढ़ती नजदीकी और ट्रंप का प्लान

पिछले कुछ महीनों में आसिम मुनीर ने अमेरिका के साथ रिश्ते काफी मजबूत किए हैं। जून 2025 में ट्रंप ने उन्हें व्हाइट हाउस में अकेले लंच पर बुलाया था – यह पहली बार था जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख को बिना किसी नागरिक नेता के साथ मिला। इसके बाद सितंबर में भी मुलाकात हुई। अब मुनीर जल्द ही तीसरी बार अमेरिका जा रहे हैं, जहां गाजा मिशन पर बात होगी। ट्रंप की योजना है कि गाजा में युद्ध के बाद स्थिरता लाने के लिए मुस्लिम देशों की सेना तैनात की जाए। यह बल गाजा की सुरक्षा संभालेगा, पुनर्निर्माण में मदद करेगा और हमास को निहत्था करने में भूमिका निभाएगा। अमेरिका खुद सैनिक नहीं भेजेगा, लेकिन कमांड में उसका प्रभाव रहेगा। पाकिस्तान की मजबूत सेना होने की वजह से वॉशिंगटन की नजर उस पर है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा है कि शांति मिशन में मदद पर विचार हो सकता है, लेकिन हमास को निरस्त्र करना पाकिस्तान का काम नहीं। फिर भी दबाव बढ़ रहा है।

घरेलू विरोध की बड़ी चुनौती

पाकिस्तान में फिलिस्तीन के प्रति हमदर्दी बहुत मजबूत है। लोग इजरायल को दुश्मन मानते हैं और अमेरिका को भी संदेह की नजर से देखते हैं। अगर पाकिस्तानी सैनिक गाजा भेजे गए, तो इसे इजरायल की मदद समझा जाएगा। इस्लामी पार्टियां सड़कों पर उतर सकती हैं और बड़ा प्रदर्शन कर सकती हैं। हाल में एक कट्टर इस्लामी पार्टी पर बैन लगा है, लेकिन उसकी विचारधारा अभी भी जिंदा है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी के समर्थक भी मुनीर से नाराज हैं। वे इसे मौका मानकर विरोध कर सकते हैं। विश्लेषक कहते हैं कि अगर गाजा में स्थिति बिगड़ी, तो पाकिस्तान में लोग कहेंगे कि मुनीर इजरायल की मदद कर रहे हैं। यह मुनीर की साख को बड़ा झटका दे सकता है। मुनीर खुद को धार्मिक और इस्लाम का रक्षक दिखाते हैं, ऐसे में यह फैसला उनके लिए और मुश्किल हो जाता है।

मुनीर की मुस्लिम देशों से बातचीत

मुनीर ने हाल के हफ्तों में इंडोनेशिया, मलेशिया, सऊदी अरब, तुर्की, जॉर्डन, मिस्र और कतर जैसे देशों के नेताओं से मुलाकात की है। विश्लेषकों का मानना है कि यह गाजा मिशन पर सलाह लेने के लिए था। कई मुस्लिम देश इस मिशन से दूर रहना चाहते हैं, क्योंकि हमास को निहत्था करना जोखिम भरा है। इससे उनके देश में भी विरोध हो सकता है। पाकिस्तान अकेला पड़ सकता है अगर वह हां कह दे।

आर्थिक जरूरतें और अमेरिका की लालच

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कमजोर है। अमेरिका से निवेश और सुरक्षा मदद की उम्मीद है। मुनीर ने ट्रंप से रिश्ते सुधारकर यह दरवाजा खोला है। अगर गाजा मिशन में ना कहा, तो ट्रंप नाराज हो सकते हैं और मदद रुक सकती है। लेकिन हां कहने पर घरेलू संकट बढ़ेगा। यह दोहरी तलवार है।

पाकिस्तान का अभी तक का रुख

पाकिस्तान ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। विदेश मंत्रालय कहता है कि सभी पहलुओं पर विचार चल रहा है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि पाकिस्तान ने शामिल होने की इच्छा जताई है, लेकिन अमेरिका ने स्पष्ट किया कि अभी पक्का कमिटमेंट नहीं है। करीब 19 देशों ने मदद की बात कही है, लेकिन ज्यादातर अरब देश दूर रहना चाहते हैं।

निष्कर्ष :

आसिम मुनीर ने अमेरिका से दोस्ती बढ़ाकर पाकिस्तान के लिए नए दरवाजे खोले, लेकिन अब यही दोस्ती उनके गले की फांस बन गई है। गाजा में सेना भेजना आसान नहीं – एक तरफ अमेरिका की नाराजगी का डर, दूसरी तरफ देश के अंदर विरोध और अस्थिरता का खतरा। पाकिस्तान हमेशा से विदेशी ताकतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है, लेकिन इस बार वह अपने ही जाल में फंसता नजर आ रहा है। अगर मुनीर ने गलत फैसला लिया, तो न सिर्फ उनकी सत्ता को झटका लगेगा, बल्कि पाकिस्तान की विदेश नीति और घरेलू स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है। आने वाले दिन बताएंगे कि मुनीर इस मुश्किल परीक्षा में कैसे पास होते हैं।

PRAGATI DIXIT
Author: PRAGATI DIXIT

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