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Bengal Election 2026: उत्तर बंगाल के सीमावर्ती गांवों में ‘सुरक्षा’ बना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा, बांग्लादेशी घुसपैठ से डरे हुए हैं ग्रामीण

Bengal Election 2026: इस बार बंगाल विधानसभा चुनाव में जहां एक तरफ विकास, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दे हैं, वहीं उत्तर बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में एक अलग ही तरह की चिंता लोगों को सता रही है। यहां के ग्रामीण रात को चैन की नींद नहीं सो पाते। कारण है भारत-बांग्लादेश के बीच की खुली सीमा, जहां से बांग्लादेशी घुसपैठिए अंधेरे का फायदा उठाकर भारतीय इलाकों में दाखिल हो जाते हैं।

जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, दार्जिलिंग और दक्षिण दिनाजपुर जैसे सीमावर्ती जिलों में रहने वाले लोगों के लिए यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन चुनाव के मौसम में यह मुद्दा एक बार फिर सामने आ गया है। लोगों की मांग साफ और सीधी है जो भी सरकार बने, सबसे पहले हमारी सुरक्षा तय की जाए।

रात के अंधेरे में आते हैं बांग्लादेशी बदमाश, गाय चुराकर भाग जाते हैं

स्थानीय लोगों के मुताबिक, बांग्लादेशी घुसपैठिए रात के वक्त भारतीय सीमा क्षेत्र में घुस आते हैं और गाय व मवेशी चुराकर ले जाते हैं। जब कोई ग्रामीण विरोध करने की कोशिश करता है तो वे हथियारों से डराते हैं और मारपीट करते हैं। इतना ही नहीं, कई बार खेतों में खड़ी फसल को भी बर्बाद कर देते हैं।

साउथ बेरुबाड़ी ग्राम पंचायत के रहने वाले सचिन शील बताते हैं कि उनकी बस एक ही मांग है। वे कहते हैं, “हम चाहते हैं कि खुली सीमा पर कांटेदार बाड़ लगे। हमारी सुरक्षा सुनिश्चित हो। चाहे कोई भी सरकार आए, हमें कांटेदार बाड़ चाहिए। बांग्लादेशी बदमाश उसी रास्ते से गाय ले जाते हैं, वहां बाड़ लगनी चाहिए।

वहीं स्थानीय महिला तुलसी शर्मा ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा- यहां बांग्लादेशी आते हैं। BSF कभी-कभी पकड़ती है, कभी नहीं। हम रात में डर के मारे सो नहीं पाते।

जलपाईगुड़ी जिले के बबलू राय ने बताया कि उनके इलाके में तार की घेराबंदी तो है, लेकिन उसका कोई खास फायदा नहीं हो रहा। वे कहते हैं, अगर यह घेराबंदी जीरो पॉइंट पर लगती तो कुछ राहत मिलती। सरकार से बस एक गुजारिश है, हमारी सुरक्षा तय की जाए।

936 किलोमीटर लंबी सीमा, लेकिन 100 किलोमीटर अभी भी खुली है

Bengal Election 2026

BSF के उत्तर बंगाल फ्रंटियर के तहत कुल 936.4 किलोमीटर लंबी सीमा आती है। इसमें से करीब 100 किलोमीटर की सीमा अब भी पूरी तरह खुली हुई है। कुछ जगहों पर नदियां हैं, तो कुछ जगहों पर जमीन की जटिल बनावट की वजह से कांटेदार तारों की बाड़ लगाना मुमकिन नहीं हो पाया है।

यही खुली सीमा घुसपैठियों के लिए आसान रास्ता बन जाती है। सुरक्षाबलों की मौजूदगी के बावजूद इतनी लंबी सीमा पर हर जगह नजर रखना आसान नहीं है, और इसी का फायदा उठाकर घुसपैठ की घटनाएं होती रहती हैं।

चुनावी मुद्दा बना बांग्लादेशी घुसपैठ, BJP और TMC आमने-सामने

इस मुद्दे पर सियासत भी जोर-शोर से चल रही है। भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को पूरी ताकत से उठा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह अपनी चुनावी सभाओं में लगातार कह रहे हैं कि अगर बंगाल में BJP की सरकार बनती है, तो 45 दिनों के अंदर कैबिनेट में प्रस्ताव लाकर खुली सीमा पर बाड़ लगाने के लिए जमीन देने का फैसला किया जाएगा।

BJP नेताओं का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस सरकार ने पिछले 15 सालों में BSF को बाड़ लगाने के लिए जमीन नहीं दी, जिसकी वजह से सीमा खुली रही और घुसपैठ जारी रहा।

दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस इसे चुनावी हथकंडा बता रही है। उत्तर बंगाल विकास मंत्री और TMC नेता उदयन गुहा ने पलटवार करते हुए कहा, “जो सीमा खुली है, वह नदी से घिरी हुई है। जहां कांटेदार बाड़ है, वहां से गाय तस्करी कैसे हो सकती है? BSF की मिलीभगत के बिना यह सब संभव नहीं है।

Bengal Election 2026: ग्रामीणों को पार्टी से नहीं, सुरक्षा से मतलब

इस सियासी बहस के बीच सबसे ज्यादा परेशान वहां के आम लोग हैं, जो न तो BJP के साथ हैं न TMC के, बल्कि वे बस चाहते हैं कि उनकी जान-माल की हिफाजत हो। इन ग्रामीणों के लिए यह चुनाव किसी पार्टी को जिताने का मौका नहीं बल्कि अपनी सुरक्षा की गुहार लगाने का जरिया है।

सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोग सालों से इस समस्या को झेल रहे हैं। चुनाव आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन उनकी समस्या जस की तस रहती है। इस बार भी वही डर, वही मांग और वही उम्मीद लेकर ये लोग वोट डालने जाएंगे।

2026 चुनाव में सीमा सुरक्षा बन सकती है निर्णायक मुद्दा

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा से लगे विधानसभा क्षेत्रों में यह मुद्दा वोटों को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है। यहां के लोगों का गुस्सा और उनकी मांग किसी भी पार्टी को फायदा या नुकसान पहुंचा सकती है।

जो पार्टी इन ग्रामीणों को यह भरोसा दिला पाएगी कि उनकी सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है, उसे इन इलाकों में बड़ा फायदा मिल सकता है। फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव के बाद जो सरकार सत्ता में आए, वह इस 100 किलोमीटर खुली सीमा के सवाल का क्या जवाब देती है।

निष्कर्ष

उत्तर बंगाल के सीमावर्ती गांवों की यह कहानी महज एक चुनावी मुद्दे की कहानी नहीं है। यह उन हजारों परिवारों की कहानी है जो हर रात डरे-सहमे सोते हैं, जिनकी गाय और फसल लुट जाती है और जो बरसों से सरकारों से गुहार लगा रहे हैं। चाहे BJP हो या TMC, इन लोगों की मांग एक ही है जब तक सीमा पर पूरी बाड़ नहीं लगती, तब तक उनकी नींद और उनका चैन दोनों अधूरे हैं। अब देखना यह है कि 2026 का यह चुनाव उनके लिए बदलाव लेकर आता है या फिर वही पुराने वादे और वही पुराना इंतजार।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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