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नेताओं के सामने चुनावी मुद्दे हो गए हैं बौने !

भारतीय राजनीति का यह दौर शायद सबसे दिलचस्प है और खतरनाक भी है । क्योंकि जहाँ नेता लगातार बड़े होते जा रहे हैं और चुनावी मुद्दे लगातार छोटे। इस दौर के आने से पहले राजनीति सिर्फ मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती थी और नेता उन मुद्दों को उठाने का माध्यम होते थे। आज स्थिति उलट गई है कि मुद्दे नेताओं के इर्द-गिर्द घूमते हैं, और कई बार तो उनकी मौजूदगी ही नेताओं की ज़रूरत पर निर्भर करती है।

आज की राजनीति में बहस इस बात पर नहीं होती कि बेरोज़गारी कितनी बढ़ी, महंगाई ने किस हद तक आम आदमी की कमर तोड़ी, या शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति क्या है। बहस इस बात पर होती है कि किस नेता ने क्या कहा, किसने किसे जवाब दिया, किसकी रैली में कितनी भीड़ आई, और किसने किस अंदाज़ में जनता को संबोधित किया। मुद्दे अब पृष्ठभूमि में हैं, चेहरे मुख्य मंच पर।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस नई राजनीति के सबसे प्रभावशाली प्रतीक बन चुके हैं। उनकी हर गतिविधि—चाहे वह किसी राज्य का दौरा हो, किसी विशेष वेशभूषा में दिखना हो, या किसी लोकल व्यंजन के साथ तस्वीर—अपने आप में एक राजनीतिक संदेश बन जाती है। यह उनकी व्यक्तिगत क्षमता भी है और एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति भी। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस रणनीति ने मुद्दों को पीछे धकेल दिया है?

यह सिर्फ एक नेता तक सीमित नहीं है। विपक्ष भी अब उसी रास्ते पर चलता दिखता है। राहुल गांधी की यात्राएँ हों या अन्य क्षेत्रीय नेताओं के बड़े-बड़े अभियान सबमें फोकस व्यक्ति पर है, मुद्दों पर नहीं। फर्क बस इतना है कि कोई इसे बेहतर तरीके से करता है, कोई कम प्रभावी ढंग से।

इस प्रवृत्ति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि जनता भी धीरे-धीरे उसी ढर्रे पर ढलने लगती है। हम मुद्दों पर नहीं, व्यक्तियों पर राय बनाने लगते हैं। हमें यह ज़्यादा याद रहता है कि किस नेता ने क्या कहा, यह कम याद रहता है कि उसने क्या किया। राजनीति एक तरह का “परफॉर्मेंस” बन जाती है, जहाँ असली काम से ज्यादा उसकी प्रस्तुति मायने रखती है।

मीडिया की भूमिका भी इसमें कम जिम्मेदार नहीं है। प्राइम टाइम की बहसों में आंकड़ों और नीतियों की जगह बयानबाज़ी और टकराव ने ले ली है। जो सबसे ज़्यादा शोर मचाता है, वही सबसे ज़्यादा दिखाई देता है। ऐसे में गंभीर मुद्दे धीरे-धीरे “कम टीआरपी” वाले विषय बन जाते हैं।

इस पूरे खेल में सबसे खतरनाक चीज़ है ,सवाल पूछने की संस्कृति का कमजोर होना। जब नेता बहुत बड़े हो जाते हैं, तो उन पर सवाल पूछना भी कई बार “असम्मान” या “विरोध” के रूप में देखा जाने लगता है। आलोचना को देश-विरोध या साजिश का हिस्सा बताना आसान हो जाता है। और यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे खोखला होने लगता है।

लोकतंत्र में नेता बड़े नहीं होते, मुद्दे बड़े होते हैं। नेता तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन मुद्दे स्थायी होते हैं, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, समानता। अगर इन मुद्दों की जगह चेहरों ने ले ली, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ना तय है।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम फिर से मुद्दों को केंद्र में लाएँ। नेताओं को उनके कद से नहीं, उनके काम से आँकें। उनकी छवि से नहीं, उनकी नीतियों से सवाल करें।

क्योंकि जिस दिन मुद्दे पूरी तरह छोटे पड़ गए, उस दिन नेता भले कितने भी बड़े क्यों न हो जाएँ लोकतंत्र छोटा हो जाएगा। अगर ऐसा हो हो गया तो आने वाली पीढ़ियां आपके कभी भी माफ नहीं करेंगी।

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