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भारत आखिर कहां पीछे रह रहा है?

नई दिल्ली: अमेरिका दौरे पर राम माधव का एक बयान इन दिनों चर्चा में है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की नीतियों का बचाव करते हुए उन्होंने जिस सहजता से ईरान और रूस से तेल खरीद, टैरिफ़ समझौतों और वैश्विक दबावों के सामने “सहमति” और “धैर्य” को गिनाया और फिर सवाल उछाला कि “तो भारत कहां पीछे रह रहा है?” । वह केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं थी। यह दरअसल उस सोच की झलक थी, जिसमें समझौते को रणनीति और चुप्पी को कूटनीति मान लिया गया है।

यहीं से असली सवाल शुरू होता है। क्या भारत वाकई पीछे नहीं रह रहा, या फिर हम अपनी कमज़ोरियों को नए शब्दों में परिभाषित कर उन्हें उपलब्धि की तरह पेश करने लगे हैं?यह सवाल नया नहीं है। वर्षों से पूछा जाता रहा है और लगभग हर बार इसके जवाब भी तयशुदा रहे हैं ।

बढ़ती बेरोज़गारी, गहराती आर्थिक असमानता, सामाजिक तनाव, और एक ऐसे प्रगतिशील एजेंडे का अभाव जो देश की विशाल मानवीय क्षमताओं को दिशा दे सके। यह वह समस्याएं हैं जो दिखती हैं, महसूस होती हैं और जिन पर आंकड़ों के साथ बहस की जा सकती है।

लेकिन यही सवाल जब सत्ता के भीतर से, या सत्ता के निकट खड़े किसी व्यक्ति के मुंह से अलग संदर्भ में निकलता है, तो उसका अर्थ बदल जाता है। हालिया टिप्पणी को केवल एक भाषण मानकर नजरअंदाज कर देना आसान है, लेकिन उसमें छिपे संकेत कहीं अधिक गंभीर हैं।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने खुद को एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। “विश्वगुरु” बनने की आकांक्षा से लेकर आत्मनिर्भरता के दावों तक, एक आत्मविश्वासपूर्ण राष्ट्र की छवि गढ़ी गई है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल नारों और छवियों से नहीं चलती; वहां कठोर यथार्थ होता है, जहां शक्ति संतुलन, आर्थिक निर्भरता और रणनीतिक मजबूरियां निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं के साथ भारत के संबंध इस यथार्थ की एक परीक्षा रहे हैं। कई मौकों पर भारत को ऐसे फैसले लेने पड़े, जिनमें सार्वजनिक रूप से सख्ती दिखाई नहीं दी । चाहे वह तेल आयात के मुद्दे हों या व्यापारिक शर्तें। सरकार इसे कूटनीतिक परिपक्वता और रणनीतिक धैर्य कह सकती है, और कुछ हद तक यह सही भी हो सकता है। हर समझौता आत्मसमर्पण नहीं होता।

लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है। जब हर निर्णय को बिना सवाल किए “रणनीतिक सफलता” के रूप में पेश किया जाता है, तब लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर पड़ने लगता है। असहमति को अक्सर राष्ट्रहित के खिलाफ बताकर खारिज कर दिया जाता है, और यही प्रवृत्ति दीर्घकाल में नीतिगत जवाबदेही को कम करती है।

भारत की असली चुनौती शायद यहीं छिपी है। हम केवल आर्थिक या सामाजिक सूचकांकों में ही पीछे नहीं हैं, बल्कि एक स्वस्थ, खुला और ईमानदार सार्वजनिक संवाद कायम करने में भी पिछड़ रहे हैं। जब नीतियों के फायदे और नुकसान दोनों पर खुलकर चर्चा नहीं होती, तब नागरिकों का भरोसा भी धीरे-धीरे कमज़ोर होता है।

यह मान लेना आसान है कि वैश्विक राजनीति में हर देश को समझौते करने पड़ते हैं। यह सच भी है। लेकिन एक आत्मविश्वासी राष्ट्र वही होता है जो अपने समझौतों को छिपाने की बजाय उन्हें स्पष्टता के साथ स्वीकार करे और उनके पीछे की मजबूरियों को जनता के सामने रखे।

तो सवाल फिर वही है—भारत कहां पीछे रह रहा है?

शायद जवाब यह है कि भारत अपनी अपार संभावनाओं के बावजूद उस राजनीतिक इच्छाशक्ति और बौद्धिक ईमानदारी में पीछे रह रहा है, जो उसे न केवल मजबूत निर्णय लेने में, बल्कि उन निर्णयों की पारदर्शी व्याख्या करने में सक्षम बनाती है।

रणनीतिक धैर्य एक गुण है, लेकिन अगर उसके साथ रणनीतिक स्पष्टता न हो, तो वही धैर्य कमजोरी के रूप में भी देखा जा सकता है।और एक राष्ट्र की असली ताकत केवल उसके फैसलों में नहीं, बल्कि उन फैसलों पर होने वाली खुली और निर्भीक बहस में निहित होती है।

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