डेस्क – संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक महत्वपूर्ण बैठक में ईरान और अमेरिका एक बार फिर परमाणु कार्यक्रम को लेकर आमने-सामने आ गए। यह बैठक 23 दिसंबर 2025 को हुई, जिसमें दोनों देशों ने कूटनीति की बात तो की, लेकिन समझौते की राह अभी भी दूर दिख रही है। अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाते हुए कहा कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन कुछ शर्तों के साथ। वहीं ईरान ने इन शर्तों को अपनी संप्रभुता पर हमला बताया। आइए समझते हैं इस विवाद की पूरी कहानी।
परमाणु समझौते का पुराना इतिहास
2015 में ईरान और विश्व की बड़ी शक्तियों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी) के बीच ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) नाम का परमाणु समझौता हुआ था। इस समझौते में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने का वादा किया था, जैसे यूरेनियम संवर्धन को कम रखना और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की अनुमति देना। बदले में ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाने थे। लेकिन 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया। ट्रंप का मानना था कि यह समझौता काफी सख्त नहीं है। इसके बाद ईरान ने भी धीरे-धीरे समझौते की शर्तों का पालन करना कम कर दिया। 2025 में ट्रंप के फिर राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत शुरू हुई, लेकिन जून में इस्राइल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले कर दिए। इससे बातचीत रुक गई और तनाव बढ़ गया।
संयुक्त राष्ट्र की बैठक में क्या हुआ?
23 दिसंबर की बैठक में अमेरिका की ओर से मॉर्गन ओर्टागस ने कहा कि अमेरिका ईरान के साथ सीधी और सार्थक बातचीत के लिए तैयार है। लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि कोई भी नया समझौता तभी संभव है जब ईरान अपने देश में यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह रोक दे। ओर्टागस ने ईरान से कहा, “आग से दूर हटो और राष्ट्रपति ट्रंप का कूटनीति का हाथ थामो।” दूसरी तरफ ईरान के राजदूत अमीर सईद इरावानी ने इस शर्त को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि शून्य संवर्धन की मांग ईरान के परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के अधिकारों के खिलाफ है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है और वह हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा। इरावानी ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह पहले से तय नतीजे थोपना चाहता है और दबाव की नीति अपना रहा है। ईरान ने कहा कि वह दबाव और धमकी के आगे नहीं झुकेगा। बैठक में रूस और चीन ने भी ईरान का समर्थन किया, जबकि ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका ने ईरान पर अधिक दबाव बनाने की बात की।
मुख्य पेच कहां फंसा है?
इस विवाद का सबसे बड़ा पेच यूरेनियम संवर्धन का मुद्दा है। अमेरिका और पश्चिमी देश चाहते हैं कि ईरान अपने देश में कोई संवर्धन न करे, क्योंकि इससे परमाणु हथियार बनाने का खतरा बढ़ता है। वे कहते हैं कि ईरान को विदेश से संवर्धित यूरेनियम मिल सकता है, लेकिन खुद न बनाए। ईरान इसे मानने को तैयार नहीं। वह कहता है कि संवर्धन उसका वैध अधिकार है और वह शांतिपूर्ण उद्देश्यों जैसे बिजली उत्पादन और चिकित्सा के लिए इसे जारी रखेगा। ईरान का तर्क है कि NPT संधि के तहत उसे यह अधिकार मिला हुआ है। इसके अलावा, सितंबर 2025 में यूरोपीय देशों ने ‘स्नैपबैक’ तंत्र शुरू कर ईरान पर पुराने प्रतिबंध फिर लगा दिए। इससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर और दबाव पड़ा है। जून के हमलों ने भी बातचीत को जटिल बना दिया। अमेरिका ने इस्राइल के साथ मिलकर ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी की, जिससे ईरान को नुकसान हुआ। ईरान इसे आक्रमण मानता है और कहता है कि ऐसे में विश्वास कैसे बनेगा?
दोनों पक्षों की स्थिति क्या है?
अमेरिका का कहना है कि वह बातचीत चाहता है, लेकिन ईरान को अपनी गतिविधियां रोकनी होंगी। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि पुराना समझौता कमजोर था और अब सख्त शर्तें जरूरी हैं।ईरान कहता है कि वह सिद्धांतों पर आधारित बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अमेरिका को पहले प्रतिबंध हटाने चाहिए और हमलों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने पहले सीधी बातचीत को नकारा था, लेकिन अब ईरान कूटनीति पर जोर दे रहा है।
आगे की राह कैसी दिख रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों पक्ष बातचीत चाहते हैं, लेकिन विश्वास की कमी बड़ा रोड़ा है। अगर अमेरिका अपनी ‘शून्य संवर्धन’ की मांग पर अड़ा रहा तो समझौता मुश्किल है। ईरान भी प्रतिबंध हटाए बिना पीछे नहीं हटेगा। संयुक्त राष्ट्र और IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) निरीक्षण की बात कर रहे हैं, लेकिन ईरान ने हमलों के बाद कुछ निरीक्षण रोक दिए हैं।
निष्कर्ष :
ईरान और अमेरिका का यह विवाद सिर्फ दो देशों का नहीं, बल्कि पूरे विश्व की शांति से जुड़ा है। परमाणु हथियार का खतरा बढ़ने से मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ सकता है। दोनों पक्षों को लचीला रुख अपनाना होगा। अमेरिका को दबाव की बजाय विश्वास बनाने पर जोर देना चाहिए, जबकि ईरान को पारदर्शिता दिखानी होगी। कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है, जो युद्ध के खतरे को रोक सकता है। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में बातचीत फिर शुरू हो और एक नया समझौता बने, जो दोनों के हितों का खयाल रखे। अन्यथा, यह पेच और उलझ सकता है, जिसका नुकसान पूरी दुनिया को उठाना पड़ेगा।



