Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने सीनियर एडवोकेट पदनाम के लिए महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी वकील का आवेदन किसी भी कोर्ट ने खारिज कर दिया है तो वह सीनियर एडवोकेट नहीं बन सकता। यह टिप्पणी एक याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें वकील ने सीनियर एडवोकेट का दर्जा मांगा था। चीफ जस्टिस की बेंच ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के नियमों के अनुसार, एक बार आवेदन खारिज होने पर दोबारा विचार नहीं किया जाता। छोटे शहरों और गांवों के वकील जो सीनियर एडवोकेट बनने का सपना देखते हैं, उनके लिए यह फैसला बड़ा सबक है। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि नियमों का पालन जरूरी है।
मामला क्या था: आवेदन खारिज होने पर दोबारा याचिका
याचिकाकर्ता वकील ने सीनियर एडवोकेट का दर्जा मांगते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। जांच में पता चला कि उनका आवेदन पहले ही किसी कोर्ट ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार, एक बार खारिज आवेदन पर दोबारा विचार नहीं होता। चीफ जस्टिस ने कहा, “अगर कोई कोर्ट आवेदन डिसमिस कर दे तो व्यक्ति सीनियर एडवोकेट नहीं बन सकता।” कोर्ट ने याचिका को निराधार बताकर खारिज कर दिया।
Jharkhand High Court: सीनियर एडवोकेट पदनाम के नियम
सीनियर एडवोकेट का दर्जा सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट देता है। इसके लिए कम से कम 10 साल का अनुभव, कानूनी ज्ञान और नैतिकता जरूरी है। आवेदन फुल कोर्ट या चीफ जस्टिस की कमेटी देखती है। अगर आवेदन खारिज हो जाए तो दोबारा नहीं दायर किया जा सकता। यह नियम वकीलों में अनुशासन बनाए रखने के लिए है। झारखंड हाईकोर्ट ने इस फैसले से नियमों की सख्ती दिखाई है।
फैसले का महत्व: न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता
यह फैसला सीनियर एडवोकेट पदनाम की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाता है। कोर्ट ने कहा कि बार-बार आवेदन से न्यायिक समय बर्बाद होता है। याचिकाकर्ता को नियमों का पालन करने की सलाह दी गई। यह फैसला अन्य हाईकोर्ट्स के लिए भी उदाहरण बनेगा। वकीलों को अब आवेदन दायर करने से पहले पूरी तैयारी करनी होगी। झारखंड हाईकोर्ट ने न्यायिक अनुशासन को मजबूत किया है।



