Jharkhand News: झारखंड में सरकारी पैसों की बर्बादी का एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानी CAG ने अपनी ताजा रिपोर्ट में झारखंड रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय के निर्माण को लेकर एक गंभीर खुलासा किया है। खूंटी जिले में इस विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर पर 12.10 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए लेकिन काम सिर्फ 19 फीसदी ही हुआ और उसके बाद निर्माण पूरी तरह बंद हो गया। वह अधूरी इमारत आज भी खूंटी में बेकार खड़ी है।
CAG रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि यह अकेला मामला नहीं है। झारखंड भवन निर्माण कारपोरेशन लिमिटेड की छह और परियोजनाओं में भी इसी तरह कुल 13.32 करोड़ रुपये खर्च करके निर्माण बीच में ही रोक दिया गया। यह रिपोर्ट राज्य में सरकारी निर्माण कार्यों की योजना, निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
जून 2018 में शुरू हुआ काम, मई 2020 में होना था पूरा लेकिन दिसंबर 2022 में हुआ स्थगित

झारखंड रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय की स्थापना झारखंड सरकार ने की थी ताकि राज्य के युवाओं को रक्षा और सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में प्रशिक्षण और शिक्षा मिल सके। इस विश्वविद्यालय के लिए खूंटी में एक स्थायी परिसर बनाने की योजना बनाई गई थी।
CAG रिपोर्ट के मुताबिक इस परिसर का निर्माण जून 2018 में शुरू हुआ था और इसे मई 2020 तक पूरा होना था। यानी सिर्फ दो साल में काम खत्म होना था। लेकिन जुलाई 2021 में ही निर्माण कार्य व्यावहारिक रूप से बंद हो गया और दिसंबर 2022 में आधिकारिक तौर पर इसे स्थगित कर दिया गया।
राज्य सरकार ने कारपोरेशन को यह निर्देश दिया था कि विश्वविद्यालय में लागू पाठ्यक्रमों का पुनर्मूल्यांकन किया जाए और यह भी आकलन किया जाए कि स्थायी परिसर की वाकई जरूरत है या नहीं। इस आदेश के बाद निर्माण रोक दिया गया। लेकिन रोकने से पहले सरकार 12.10 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी थी और काम सिर्फ 19 फीसदी हुआ था।
वित्त और सार्वजनिक नीति के जानकारों के मुताबिक इस तरह के मामलों में सबसे बड़ी गलती यह होती है कि परियोजना की जरूरत का सही आकलन शुरू में नहीं किया जाता। पहले करोड़ों खर्च हो जाते हैं और बाद में यह सवाल उठता है कि यह बनाना जरूरी था भी या नहीं।
Jharkhand News: विभाग से कोई निर्देश नहीं आया और अधूरी इमारत खड़ी रह गई
CAG रिपोर्ट में एक और अहम बात सामने आई है। निर्माण स्थगित करने के बाद विभाग की तरफ से कोई आगे का निर्देश नहीं दिया गया। न तो यह बताया गया कि काम दोबारा कब शुरू होगा और न ही यह स्पष्ट किया गया कि अधूरी संरचना के साथ आगे क्या करना है।
नतीजा यह हुआ कि 12.10 करोड़ रुपये की लागत से बनी अधूरी इमारत खूंटी में बेकार खड़ी है। बारिश, धूप और मौसम की मार से यह संरचना धीरे-धीरे खराब होती जा रही है। जितने रुपये खर्च हुए उनका कोई नतीजा नहीं निकला और जनता के पैसे बर्बाद हुए।
यह मामला यह भी बताता है कि सरकारी परियोजनाओं में एक बार काम रुकने के बाद उन्हें दोबारा शुरू करने या बंद करने का कोई स्पष्ट तंत्र नहीं है। न कोई समयसीमा है, न कोई जवाबदेही है और न ही खर्च हुए पैसों की वसूली का कोई रास्ता।
पिठौरिया का मामला और भी गंभीर, ठेकेदार ने झूठा दावा किया और कार्रवाई भी नहीं हुई
रक्षा विश्वविद्यालय के अलावा CAG रिपोर्ट में रांची के पिठौरिया स्थित सुतियांबे पहाड़ के विकास का मामला भी सामने आया है। इस परियोजना में जो हुआ वो और भी ज्यादा चिंताजनक है।
इस काम को कारपोरेशन को अक्टूबर 2017 तक पूरा करना था लेकिन उस समयसीमा तक सिर्फ 8 फीसदी ही काम हुआ था। काम की यह धीमी रफ्तार साफ दिख रही थी लेकिन कारपोरेशन ने इसमें तेजी लाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।
अगस्त 2020 में ठेकेदार ने दावा किया कि उसने 58 फीसदी काम पूरा कर लिया है और बिल का भुगतान मांगा। कारपोरेशन ने एक महीने में बाकी काम पूरा करने की शर्त पर बिल का भुगतान कर दिया। लेकिन ठेकेदार ने वह शर्त पूरी नहीं की और उसके बावजूद उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। आंशिक रूप से बनी यह संरचना तीन साल से ज्यादा वक्त से बेकार पड़ी है और इस पर 2.16 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
सार्वजनिक जवाबदेही के जानकारों का मानना है कि जब ठेकेदार शर्तें पूरी नहीं करता और फिर भी कोई कार्रवाई नहीं होती तो यह सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी है। इससे भविष्य में भी ऐसे ठेकेदारों का हौसला बढ़ता है।
CAG क्या है और इसकी रिपोर्ट का क्या मतलब होता है
CAG यानी नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक भारत का एक संवैधानिक पद है जो केंद्र और राज्य सरकारों के सभी खर्चों का ऑडिट करता है। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 148 के तहत काम करता है। CAG की रिपोर्ट संसद और राज्य विधानसभाओं में रखी जाती है और यह पूरी तरह स्वतंत्र संस्था है।
जब CAG किसी परियोजना पर सवाल उठाता है तो इसका मतलब है कि वहां सरकारी पैसों का सही इस्तेमाल नहीं हुआ। इस रिपोर्ट के आधार पर संबंधित विभाग को जवाब देना होता है और सार्वजनिक लेखा समिति इसकी जांच करती है।
झारखंड भवन निर्माण कारपोरेशन लिमिटेड पर यह पहली बार नहीं है जब सवाल उठे हों। पहले भी कई परियोजनाओं में देरी और खर्चों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन इस बार CAG ने एक साथ कई परियोजनाओं में खामियां उजागर की हैं जो पूरे तंत्र पर सवाल खड़े करती हैं।
आगे क्या होगा, क्या जनता के पैसों का हिसाब मिलेगा
CAG रिपोर्ट सामने आने के बाद अब राज्य सरकार और झारखंड भवन निर्माण कारपोरेशन पर दबाव होगा कि वे इन परियोजनाओं पर अपना पक्ष स्पष्ट करें। झारखंड विधानसभा की सार्वजनिक लेखा समिति इस रिपोर्ट की समीक्षा करेगी। जिन परियोजनाओं में ठेकेदारों ने शर्तें नहीं मानीं उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग भी उठेगी।
रक्षा विश्वविद्यालय के मामले में सबसे जरूरी यह है कि सरकार यह फैसला करे कि वह परिसर आगे बनाया जाएगा या नहीं। अगर नहीं बनाना है तो जो अधूरी संरचना खड़ी है उसका क्या होगा। और अगर बनाना है तो फिर देरी क्यों हो रही है। 12.10 करोड़ रुपये जनता की गाढ़ी कमाई से आए हैं और उनका हिसाब देना सरकार की जिम्मेदारी है।
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