Maternity Leave Women Rights: कामकाजी महिलाओं के लिए एक ऐसी खबर सामने आई है, जो देशभर में मातृत्व अवकाश से जुड़े अधिकारों पर नई बहस छेड़ सकती है। तमिलनाडु सरकार ने तीसरे बच्चे के जन्म पर मिलने वाली मैटरनिटी लीव को 12 हफ्तों से बढ़ाकर सीधे पूरे 1 साल यानी 365 दिन कर दिया है। राज्य के मंत्री डी. सरथकुमार ने विधानसभा में यह ऐलान किया, जिसके बाद से यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि आखिर इस अवधि के दौरान अगर किसी कंपनी ने महिला कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया, तो उसके पास कानूनी तौर पर क्या रास्ते बचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस मामले में भारतीय कानून महिलाओं के पक्ष में बेहद मजबूत खड़ा नजर आता है।
देश में लाखों महिलाएं हर साल मातृत्व अवकाश लेती हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इस दौरान उन्हें कानून की तरफ से कितनी मजबूत सुरक्षा हासिल है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर कानून क्या कहता है और अन्याय होने पर महिलाएं किन दरवाजों पर दस्तक दे सकती हैं।
Maternity Leave Women Rights: गर्भावस्था के दौरान नौकरी से निकालना है गंभीर अपराध
भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 यानी मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट की धारा 12 के तहत गर्भावस्था या मातृत्व अवकाश की अवधि के दौरान किसी भी महिला कर्मचारी को नौकरी से हटाना संगीन अपराध की श्रेणी में आता है। अगर कोई कंपनी सिर्फ इसलिए टर्मिनेशन लेटर थमा देती है क्योंकि महिला ने लीव मांगी या वह गर्भवती है, तो कानून की नजर में वह नोटिस शुरू से ही अमान्य और शून्य माना जाता है। यानी नियोक्ता चाहकर भी इस दौरान किसी महिला की सेवाएं अपनी मर्जी से खत्म नहीं कर सकता।
नियम तोड़ने पर हो सकती है जेल
यहीं पर वह बात आती है, जो शायद ज्यादातर लोगों को चौंका सकती है। कानून का उल्लंघन करने वाली कंपनियों के लिए सजा का प्रावधान काफी सख्त रखा गया है। अगर कोई एम्प्लॉयर गैरकानूनी तरीके से किसी महिला को नौकरी से निकालता है, तो उसे सीधे कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। दोषी पाए जाने पर कंपनी प्रबंधन को 3 महीने से लेकर 1 साल तक की जेल हो सकती है, और साथ ही अदालत भारी आर्थिक जुर्माना भी लगा सकती है। जानकार बताते हैं कि यही सख्ती अन्य कंपनियों को भी ऐसा गैरकानूनी कदम उठाने से रोकती है।
निकाले जाने पर भी मिलेगा पूरा वेतन
कानून सिर्फ नौकरी बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि महिला के आर्थिक हितों की भी पूरी हिफाजत करता है। अगर कोई संस्थान गलत तरीके से महिला कर्मचारी को बाहर कर देता है, तब भी उसे मैटरनिटी लीव की पूरी अवधि का वेतन देना अनिवार्य होगा। मामला कुछ इस तरह से है कि भले ही कागजों पर महिला को कंपनी से हटा दिया गया हो, फिर भी 26 हफ्तों का पूरा वेतन और उससे जुड़े सभी भत्ते उसे हर हाल में मिलेंगे। यह प्रावधान महिलाओं के लिए एक बड़ी आर्थिक राहत की तरह काम करता है।
अन्याय होने पर महिला कर्मचारी के पास हैं ये रास्ते
अगर किसी महिला के साथ ऐसा अन्याय हो जाए, तो घबराने की बजाय कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। सबसे पहला कदम यही होना चाहिए कि अपने संस्थान के एचआर विभाग को लिखित शिकायत भेजी जाए, जिसमें संबंधित कानूनी प्रावधानों का साफ हवाला दिया जाए। अगर बात नहीं बनती, तो किसी अनुभवी लेबर लॉ वकील के माध्यम से कंपनी को लीगल नोटिस भिजवाया जा सकता है। इसके अलावा राज्य या राष्ट्रीय महिला आयोग यानी NCW में ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराना भी एक कारगर विकल्प है। जरूरत पड़ने पर क्षेत्रीय लेबर कमिश्नर कार्यालय, लेबर कोर्ट या इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में शिकायत दर्ज कराकर जल्द न्याय पाया जा सकता है।
किन कंपनियों पर लागू होता है यह कानून
मातृत्व लाभ कानून सिर्फ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी सरकारी और निजी संस्थानों पर पूरी तरह लागू होता है, जहां 10 या उससे ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। पहले दो बच्चों के लिए महिला को 26 हफ्ते की सवैतनिक छुट्टी मिलती है, जबकि तीसरे बच्चे या गोद लेने की स्थिति में यह अवधि 12 हफ्ते रखी गई है। हालांकि इस अधिकार का पूरा फायदा उठाने के लिए एक शर्त भी जुड़ी है, महिला कर्मचारी का पिछले 12 महीनों के भीतर उसी संस्थान में कम से कम 80 दिन काम करना जरूरी है। दुर्भाग्य की बात यह है कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को अभी भी इन अधिकारों का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है, जो एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।
Maternity Leave Women Rights: तमिलनाडु के फैसले से क्यों बढ़ी चर्चा
तमिलनाडु सरकार का तीसरे बच्चे की मैटरनिटी लीव को सीधे 12 हफ्तों से बढ़ाकर 1 साल करना अपने आप में एक बड़ा और अप्रत्याशित कदम माना जा रहा है। इस फैसले के बाद देशभर की कामकाजी महिलाओं में एक नई उम्मीद जगी है कि शायद बाकी राज्य भी आने वाले समय में ऐसे ही महिला-हितैषी कदम उठाएं। हालांकि यह अधिकार तभी असरदार साबित होगा जब कंपनियां इसका ईमानदारी से पालन करें, वरना कानून के बावजूद कई महिलाओं को अब भी चुपचाप अन्याय सहना पड़ता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो मातृत्व अवकाश के दौरान महिला कर्मचारियों को भारतीय कानून से मजबूत सुरक्षा हासिल है, बशर्ते उन्हें अपने अधिकारों की सही जानकारी हो। नौकरी से गलत तरीके से निकाले जाने पर जेल और जुर्माने जैसे सख्त प्रावधान कंपनियों पर लगाम कसने का काम करते हैं। तमिलनाडु के इस फैसले ने एक बार फिर इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। अब देखना यह है कि क्या अन्य राज्य भी महिलाओं के हक में इसी तरह के बड़े फैसले लेते हैं। मामले से जुड़ी आगे की जानकारी अभी आनी बाकी है।
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