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सांख्य दर्शन: वो खोया हुआ सोना है जिसे हम आज भी ढूँढ रहे हैं – लेकिन नाम भूल गए

वाराणसी: वो समय जब सांख्य पूरे भारत की हवा में था वैदिक काल में सांख्य सबसे ज़्यादा पढ़ाया जाने वाला दर्शन था। उपनिषदों में इसका ज़िक्र, महाभारत में कृष्ण अर्जुन को सांख्य बता रहे हैं। कपिल मुनि ने कहा – “जिंदगी दो चीज़ों का खेल है – प्रकृति (जो बदलती है) और पुरुष (जो देखता है)।” जब तक दोनों अलग नहीं होंगे, दुख बना रहेगा।

सांख्य का सबसे सादा और गहरा सूत्र

कपिल मुनि ने 25 तत्व बताए – पहले 24 प्रकृति के (महत्व, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, पंचमहाभूत) 25वाँ पुरुष – शुद्ध चेतना। “तुम वो 25वाँ हो। बाकी सब तुम्हारा शरीर, मन, दुनिया – सिर्फ़ कपड़े हैं।” जब कपड़े बदलते हो तो तुम नहीं बदलते।

फिर सांख्य क्यों खो गया?

तीन बड़े कारण थे – पहला – बाद में अद्वैत वेदांत आया। शंकराचार्य ने कहा “सब ब्रह्म है”। लोगों को वो ज़्यादा आसान लगा। दूसरा – सांख्य में ईश्वर की ज़रूरत नहीं। लोग बिना भगवान के मोक्ष से डर गए। तीसरा – सांख्य बहुत तर्कपूर्ण था, बहुत गहरा था। आम आदमी को योग और भक्ति आसान लगी। “जो सबसे सच्चा होता है, वो अक्सर सबसे पहले भुलाया जाता है।”

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आज भी सांख्य हमारे अंदर ज़िंदा है – बस नाम भूल गए

तुम जब कहते हो – “ये मेरा शरीर नहीं मैं हूँ” तुम जब गुस्से में भी कहते हो – “ये मेरा मन बोल रहा है, मैं नहीं” तुम जब सपने से उठकर कहते हो – “सब झूठा था” वो सांख्य बोल रहा है। “हमने दर्शन नहीं छोड़ा, दर्शन हमें छोड़कर कहीं नहीं गया।”

मनोविज्ञान का सबसे पुराना मॉडल सांख्य ही है

आज का साइकोलॉजी कहता है – तुम observer हो, तुम्हारा मन अलग है। ये सांख्य का पुरुष और प्रकृति का खेल है। CBT, माइंडफुलनेस, डिटैचमेंट – सब सांख्य से निकले हैं। “पश्चिम ने सांख्य को नया नाम देकर बेच दिया, हमने पुराना भूल गए।”

कपिल मुनि की वो आखिरी बात जो आज भी गूँजती है

कहा जाता है कपिल मुनि ने अंत में कहा – “जब तक तुम प्रकृति को खुद समझोगे, तब तक दुख रहेगा। जब अलग हो जाओगे, वही मोक्ष है।” ईश्वर की ज़रूरत नहीं, गुरु की ज़रूरत नहीं। बस खुद को देखो।

आज रात सिर्फ़ एक छोटा सा प्रयोग करो

फोन बंद कर दो। 5 मिनट बैठो। साँसें देखो, विचार देखो, शरीर देखो। और खुद से पूछो – “ये सब मैं हूँ या मैं इनसे अलग हूँ?” शायद पहली बार तुम्हें वो 25वाँ तत्व मिल जाए। जो कभी खोया ही नहीं था।

सांख्य खोया नहीं, हम खुद से खो गए थे। अब लौटने का वक्त है। कपिल मुनि को प्रणाम। और तुम्हें – याद दिलाने का शुक्रिया। ॐ शांति।

PRAGATI DIXIT
Author: PRAGATI DIXIT

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