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सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी का ऐतिहासिक कदम, खुद लड़ेंगी अपना केस, एसआईआर प्रक्रिया को दी चुनौती

SIR in West Bengal: सुप्रीम कोर्ट में आज पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का एक ऐतिहासिक पल देखने को मिल सकता है। वे वकील के रूप में खुद अपना पक्ष रख सकती हैं। यह सुनवाई राज्य में चल रही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के खिलाफ उनकी याचिका पर हो रही है। अगर ममता बनर्जी खुद बहस करती हैं, तो वे सुप्रीम कोर्ट में अपना मामला पेश करने वाली पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बन जाएंगी।

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल हैं। यह सुनवाई कोर्ट रूम नंबर 1 में हो रही है। ममता बनर्जी के नाम से गेट पास जारी किया गया है, जिससे उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति की पुष्टि होती है।

ममता बनर्जी की कानूनी योग्यता

SIR in West Bengal
SIR in West Bengal

ममता बनर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के जोगेश चंद्र चौधरी विधि महाविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल की है। वे एक प्रशिक्षित वकील हैं। हालांकि, उनकी आखिरी बार प्रैक्टिस की रिपोर्ट 2003 की है। लेकिन कानूनी योग्यता होने के कारण उन्हें पार्टी इन पर्सन के रूप में अदालत में खुद बहस करने का अधिकार है। उन्होंने एक अंतरिम आवेदन दायर किया है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश से खुद बहस करने की अनुमति मांगी गई है।

याचिका कब और क्यों दायर की गई?

ममता बनर्जी ने यह याचिका 28 जनवरी 2026 को दायर की थी। इसमें निर्वाचन आयोग ऑफ इंडिया (ईसीआई) और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पक्षकार बनाया गया है। याचिका में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। उन्होंने 24 जून 2025 और 27 अक्टूबर 2025 के सभी एसआईआर से जुड़े आदेशों को रद्द करने की मांग की है।

उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया मनमानी, अस्पष्ट, जल्दबाजी में और असंवैधानिक है। इससे लाखों वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, खासकर गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों के। इससे लोकतंत्र की जड़ों पर हमला हो रहा है। वे चाहती हैं कि 2026 के विधानसभा चुनाव मौजूदा 2025 की मतदाता सूची के आधार पर ही हों।

एसआईआर प्रक्रिया क्या है?

एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन मतदाता सूची की गहन जांच की एक प्रक्रिया है। इसका मकसद नकली या गलत नामों को हटाना और सूची को शुद्ध करना है। निर्वाचन आयोग का कहना है कि यह नियमित और पारदर्शी प्रक्रिया है। हर मतदाता को नाम बहाल करने का मौका दिया जाता है।

लेकिन टीएमसी और ममता बनर्जी का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में इसका दुरुपयोग हो रहा है। उनके समर्थकों के नाम जानबूझकर काटे जा रहे हैं। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि 58 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए हैं। प्रक्रिया में एआई टूल्स और पक्षपात का इस्तेमाल होने का भी आरोप है।

सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी 2026 को कहा था कि एसआईआर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। किसी वास्तविक मतदाता को परेशानी नहीं होनी चाहिए। नाम अनुचित तरीके से नहीं काटा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया था कि मतदाताओं को सुविधा दी जाए।

ममता बनर्जी का कहना है कि इन निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं आया। इसलिए उन्होंने सीधे अदालत का रुख किया। इससे पहले टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन तथा मोस्तरी बानू ने भी याचिकाएं दायर की हैं।

राजनीतिक महत्व

यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं है, बल्कि राजनीतिक भी है। पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। मतदाता सूची में बड़े बदलाव से चुनाव पर असर पड़ सकता है। टीएमसी का आरोप है कि यह प्रक्रिया उनके वोट बैंक को कमजोर करने की साजिश है।

ममता बनर्जी की यह रणनीति उनकी मजबूत छवि बनाने वाली है। वे खुद अदालत में लड़ रही हैं, जो उनके साहस और संकल्प को दिखाता है। अगर वे बहस करती हैं, तो यह भारतीय राजनीति में एक अभूतपूर्व घटना होगी। निर्वाचन आयोग का पक्ष है कि एसआईआर लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जरूरी है। सभी नियमों का पालन हो रहा है।

SIR in West Bengal: आज क्या होगा?

आज की सुनवाई से साफ होगा कि अदालत क्या फैसला सुनाती है। अगर ममता बनर्जी को अनुमति मिलती है, तो वे खुद अपना पक्ष रखेंगी। परिणाम से राज्य की राजनीति और चुनाव की निष्पक्षता पर बड़ा असर पड़ सकता है। सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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