Bengal Politics: कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा संगठनात्मक संघर्ष अब अपने चरम पर पहुंच गया है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खुद को प्रदेश अध्यक्ष घोषित करने के तुरंत बाद, ऋतब्रत बनर्जी गुट ने एक बड़ा सियासी दांव चलते हुए वरिष्ठ नेता बिप्लब मित्र को अपनी ओर से ‘असल’ तृणमूल का नया प्रदेश अध्यक्ष घोषित कर दिया है। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है और अब दोनों गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई खुल कर सामने आ गई है।
Bengal Politics: नई नियुक्तियों से बदली समीकरण
इस बैठक में केवल अध्यक्ष की ही नियुक्ति नहीं हुई, बल्कि संगठन के अन्य महत्वपूर्ण पदों पर भी नए चेहरों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। कसबा के विधायक जावेद खान को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष का पद दिया गया है। इसके अलावा, चंद्रिमा भट्टाचार्य को राष्ट्रीय कार्यसमिति का सदस्य बनाया गया है। पार्टी के विभिन्न मोर्चों पर भी नियुक्तियां की गई हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ऋतब्रत गुट एक समानांतर संगठन खड़ा करने की तैयारी में है।
महिला संगठन की बागडोर सबीना यासमीन और कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में शिउली साहा को दी गई है। छात्र संगठन टीएमसीपी के अध्यक्ष पद पर सुदीप राहा को नियुक्त किया गया है, जबकि कोहिनूर मजूमदार को चेयरमैन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। युवा संगठन का नेतृत्व अनीसुर रहमान विदेश करेंगे। अनुसूचित जाति एवं जनजाति प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी पूर्व विधायक आशीष मार्जित को दी गई है।
Bengal Politics: चुनाव आयोग और कानूनी दांव
इस राजनीतिक घोषणा से पहले, ऋतब्रत बनर्जी और उनके समर्थकों ने तृणमूल कांग्रेस पर अपना दावा पुख्ता करने के लिए निर्वाचन आयोग के समक्ष सभी जरूरी दस्तावेज जमा कर दिए हैं। संगठन की इस नई संरचना के बाद, अब आगामी कार्यक्रमों और पार्टी की रणनीति पर काम शुरू कर दिया गया है।
ऋतब्रत बनर्जी ने आगामी 21 जुलाई के ‘शहीद दिवस’ कार्यक्रम की तैयारियों पर भी जोर दिया है। उन्होंने बताया कि प्रशासन से विक्टोरिया हाउस के सामने कार्यक्रम करने की अनुमति नहीं मिलने के बाद, अब उन्होंने गांधी प्रतिमा के सामने आयोजन की अनुमति मांगी है। उनका दावा है कि हर साल की तरह इस बार भी उनका गुट पूरी भव्यता के साथ शहीद दिवस मनाएगा और उन्हें प्रशासन से सकारात्मक प्रतिक्रिया की उम्मीद है।
Bengal Politics: सियासी गलियारों में चर्चा का विषय
कोलकाता के राजनीतिक हल्कों में इस घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ममता बनर्जी के सीधे नियंत्रण लेने के बाद ऋतब्रत गुट का यह कदम तृणमूल के भविष्य के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। जहाँ एक तरफ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी अपनी पुरानी साख बचाने में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ ऋतब्रत गुट का यह नया ढांचा पार्टी के भीतर विभाजन की गहरी लकीर खींचता दिख रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इस दावे पर क्या रुख अपनाता है और ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ता किस गुट के साथ अपनी निष्ठा जोड़ते हैं। फिलहाल, बंगाल की राजनीति में एक बड़ी उठापटक की पटकथा लिखी जा चुकी है, जिसका असर राज्य के आगामी राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ना तय है।
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