Sawan 2026: भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र महीना सावन शुरू हो चुका है। इस पावन अवसर पर देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। भक्त बाबा भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित कर रहे हैं। धार्मिक ग्रंथों में सावन मास के दौरान जलाभिषेक का विशेष आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दौरान सच्चे मन से की गई पूजा तुरंत फल देती है।
हालांकि, शिव पूजा के दौरान कुछ विशेष सावधानियां और शास्त्र सम्मत नियम बनाए गए हैं। कई बार जानकारी के अभाव में भक्त अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे पूजा का पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता है। इसलिए जलाभिषेक करते समय पात्र के चयन से लेकर जल अर्पित करने की दिशा तक का विशेष ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। आइए जानते हैं सावन में जलाभिषेक से जुड़े उन प्रमुख नियमों के बारे में जिनका ध्यान हर शिवभक्त को रखना चाहिए।
Sawan 2026: शंख से कभी न करें शिवलिंग पर जलाभिषेक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव की पूजा में शंख का उपयोग पूरी तरह वर्जित माना गया है। पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि महादेव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था।
इसी कारण शंख से जल अर्पित करना अनुचित माना जाता है। जलाभिषेक के लिए हमेशा तांबे, पीतल, चांदी या कांसे के पात्र का ही प्रयोग करना शुभ और फलदायी होता है।
जलाभिषेक के दौरान सही दिशा का रखें ध्यान
पूजा के समय दिशा का चयन धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय कभी भी पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर मुख करके न खड़े हों।
शास्त्रों में उत्तर दिशा की ओर मुख करके जल अर्पित करना सबसे उत्तम बताया गया है। उत्तर दिशा को भगवान शिव का वाम अंग माना जाता है, जो देवी पार्वती का स्थान है।
जल की धार और गति को रखें शांत
शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय जल्दबाजी बिल्कुल न करें और न ही बहुत तेजी से जल उंडेलें। जल हमेशा बहुत शांत भाव से और एक पतली धारा के रूप में अर्पित करना चाहिए।
जल अर्पित करते समय मन ही मन ॐ नमः शिवाय या महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जप करते रहें। शांत मन से की गई आराधना से महादेव शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
जल पात्र में अन्य सामग्रियां मिलाने से बचें
अक्सर लोग जल के पात्र में ही रोली, अक्षत या अन्य पूजन सामग्रियां मिला देते हैं। शास्त्रों के अनुसार जल की शुद्धता बनाए रखना बहुत आवश्यक होता है।
तांबे के पात्र में दूध मिलाकर चढ़ाना भी वर्जित माना गया है। यदि आप दूध से अभिषेक करना चाहते हैं, तो इसके लिए अलग पात्र का उपयोग करें और बाद में शुद्ध जल चढ़ाएं।
शिवलिंग की आधी परिक्रमा का ही है नियम
शिवलिंग पर जल चढ़ाने के बाद जब परिक्रमा की जाए, तो इस बात का ध्यान रखें कि जलहरी यानी सोमसूत्र को कभी लांघा न जाए। जलाभिषेक का जल जिस मार्ग से बाहर निकलता है, उसे लांघना अशुभ माना जाता है।
इसलिए हमेशा आधी परिक्रमा करके वापस लौट आना चाहिए। इसे शास्त्रों में चंद्राकार परिक्रमा कहा जाता है और यही शिव पूजा की सही विधि मानी जाती है।
Sawan 2026: अर्पित जल का आचमन और चरणामृत ग्रहण करने का तरीका
जलाभिषेक के बाद शिवलिंग से बहने वाले जल को बहुत पवित्र माना जाता है। इस जल का आचमन करने से शारीरिक और मानसिक शुद्धि होती है।
हालांकि, ध्यान रहे कि जलहरी के स्पर्श से पहले बह रहे जल की बूंदों को ही लें। जल अर्पित करने के बाद शिव परिवार का ध्यान करते हुए उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
सावन का यह पावन महीना महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे उत्तम समय माना जाता है। शिवलिंग पर जलाभिषेक करते समय भक्ति भाव के साथ-साथ शास्त्रों में बताए गए नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। सही दिशा, उपयुक्त पात्र और शांत मन से अर्पित किया गया एक लोटा जल भी भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होता है। इन सरल और महत्वपूर्ण नियमों का ध्यान रखकर की गई पूजा से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है तथा शिवजी की कृपा सदा बनी रहती है।
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