Resham Fatima: रांची की 29 वर्षीय रेशम फातिमा की कहानी हौसले और संघर्ष की एक ऐसी मिसाल बन गई है, जो देशभर की लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है। रेशम फातिमा ब्रिटेन की प्रतिष्ठित चिवनिंग स्कॉलरशिप हासिल करने वाली भारत की पहली एसिड अटैक पीड़िता बनी हैं। यह उपलब्धि उन्होंने उस भयावह हादसे के करीब 12 साल बाद हासिल की है, जिसने उनका चेहरा तो झुलसा दिया था, लेकिन उनके हौसले को कभी कमजोर नहीं कर सका। अब वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में जेंडर, डेवलपमेंट एंड ग्लोबलाइजेशन विषय में एमएससी करने जा रही हैं।
Resham Fatima: 2014 में हुआ था रूह कंपा देने वाला हमला
रेशम फातिमा का जन्म वर्ष 1997 में जमशेदपुर में हुआ था। वर्ष 2014 में वह लखनऊ में अपने नाना-नानी के साथ रहकर 11वीं की पढ़ाई कर रही थीं। इसी दौरान उनकी मां के रिश्ते के भाई रियाज, जो उम्र में रेशम से करीब बीस साल बड़े थे, ने उनके सामने शादी का प्रस्ताव रखा। रेशम ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, जिससे नाराज होकर आरोपित ने फरवरी 2014 में कोचिंग क्लास छोड़ने के बहाने उन्हें कार में बैठाया और लखनऊ-रायबरेली हाईवे पर ले जाकर उनके सिर पर तेजाब की पूरी बोतल उड़ेल दी।
बहादुरी से बची जान, अस्पताल में बीता लंबा समय
रेशम के अनुसार हमले के बाद आरोपित ने उनकी गर्दन पर चाकू भी रख दिया था, लेकिन उन्होंने साहस दिखाते हुए उसे धक्का दिया और वहां से भाग निकलीं। एक ऑटो चालक ने उन्हें सहारा दिया, जबकि एक बुजुर्ग व्यक्ति ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। हमले में उनका चेहरा बुरी तरह झुलस गया और इसके बाद उनकी जिंदगी लंबे समय तक अस्पताल और ऑपरेशन थिएटर के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई।
2015 में मिला था राष्ट्रीय वीरता सम्मान
हादसे के बावजूद रेशम ने पढ़ाई जारी रखी और विज्ञान संकाय से 12वीं की परीक्षा 87 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की। उनके साहस को देखते हुए वर्ष 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त रूप से उन्हें बच्चों के सर्वोच्च राष्ट्रीय बाल वीरता सम्मान भारत अवार्ड से सम्मानित किया था। इसके बाद वर्ष 2018 में उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया से बीएससी फिजिक्स ऑनर्स की डिग्री पूरी की और बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पॉलिटिक्स एंड इंटरनेशनल रिलेशंस में स्नातकोत्तर किया।
मध्यम वर्गीय परिवार से है रेशम का नाता
रेशम फातिमा एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार से आती हैं। उनके पिता शमशुल हसन पहले सेकेंड हैंड कारों की खरीद-बिक्री का काम किया करते थे, जो अब उम्र बढ़ने के साथ थोड़े अस्वस्थ रहते हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं। तीन भाई-बहनों में रेशम सबसे बड़ी हैं, उनकी छोटी बहन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से रूरल डेवलपमेंट में स्नातकोत्तर कर रही हैं और छोटा भाई अभी दसवीं कक्षा में पढ़ता है। रेशम फिलहाल अपने पति असगर के साथ रांची के बरियातू इलाके में रहती हैं।
हिम्मत नहीं हारने का लिया था संकल्प
दैनिक जागरण से बातचीत में रेशम ने बताया कि हमले के बाद उनके सामने दो रास्ते थे, या तो वह खुद को घर के किसी कोने में कैद कर लें, या फिर ऐसा काम करें कि हर लड़की के लिए मिसाल बन जाएं। उन्होंने बताया कि उस कठिन समय में परिवार और कुछ करीबी मित्रों का प्यार और प्रेरणा उनका सबसे बड़ा संबल बना। दो साल पहले हुई शादी के बाद उनके पति असगर भी उनकी इस यात्रा में मजबूत सहारा बने और उन्हें स्कॉलरशिप के लिए आवेदन करने के लिए प्रेरित किया।
Resham Fatima: कैसे मिली प्रतिष्ठित चिवनिंग स्कॉलरशिप
रेशम बताती हैं कि चिवनिंग स्कॉलरशिप केवल अकादमिक रिकॉर्ड के आधार पर नहीं मिलती, बल्कि इसके लिए नेतृत्व क्षमता, सामाजिक प्रभाव और स्पष्ट सोच जैसी बातें भी अहम भूमिका निभाती हैं। उन्होंने अपने आवेदन में सामाजिक कार्यों, महिला शिक्षा के लिए किए गए प्रयासों और अपनी व्यक्तिगत यात्रा को पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत किया। साक्षात्कार की गंभीरता से तैयारी करने के बाद जून में उन्हें स्कॉलरशिप की आधिकारिक पुष्टि मिली और अब सितंबर के दूसरे सप्ताह में उनका लंदन जाने का कार्यक्रम है।
शिक्षा के जरिए समाज में बदलाव लाने का सपना
रेशम का लक्ष्य केवल एक डिग्री हासिल करना नहीं है। उन्होंने वर्ष 2023 में जेएनयू में पढ़ाई के दौरान इब्राह फाउंडेशन नामक संगठन की स्थापना की थी, जिसके माध्यम से वह वंचित समुदायों की महिलाओं के लिए शिक्षा, करियर मार्गदर्शन और नेतृत्व विकास के क्षेत्र में काम करना चाहती हैं। उनका सपना है कि अधिक से अधिक लड़कियां उच्च शिक्षा, सिविल सेवा और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तक पहुंच बना सकें।
Resham Fatima: आरोपित को मिली थी सजा, बाद में की आत्महत्या
रेशम के अनुसार घटना के एक सप्ताह के भीतर ही आरोपित रियाज को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था और उस पर पोक्सो सहित कई गंभीर धाराएं लगाई गई थीं। घटना के उसी वर्ष दिसंबर महीने में आरोपित ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। रेशम के पिता शमशुल हसन कहते हैं कि बेटी के साथ जो हुआ वह बेहद पीड़ादायक था, लेकिन उसकी हिम्मत और उपलब्धियों को देखकर उन्हें पिता होने पर गर्व महसूस होता है।
रेशम फातिमा की कहानी यह साबित करती है कि हौसला और शिक्षा किसी भी विपरीत परिस्थिति को पार करने की सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं। एसिड अटैक जैसे भयावह हादसे के बावजूद उन्होंने न सिर्फ अपनी पढ़ाई जारी रखी, बल्कि आज देश की पहली तेजाब पीड़िता के रूप में चिवनिंग स्कॉलरशिप हासिल कर एक नई मिसाल कायम की है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में उनकी आगामी पढ़ाई और महिला सशक्तिकरण की दिशा में उनके प्रयास निश्चित रूप से समाज के लिए प्रेरणादायक साबित होंगे।
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