Iran Nuclear Weapons: 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमले शुरू किए और उसके बाद से पूरी दुनिया में एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या ईरान के पास परमाणु बम है या नहीं। अगर है तो वह इसका इस्तेमाल करेगा या नहीं। और अगर नहीं है तो वह इसे बनाने के कितने करीब पहुंच चुका था। ये सवाल इसलिए भी अहम हैं क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद कहा है कि अगर उन्होंने 2018 में ईरान परमाणु समझौते को नहीं तोड़ा होता तो ईरान तीन साल पहले ही परमाणु बम बना चुका होता। अब जब ईरान पर हमले हो रहे हैं और उसके परमाणु ठिकाने भी निशाने पर बताए जा रहे हैं तो यह समझना जरूरी है कि आखिर ईरान का परमाणु कार्यक्रम कहां तक पहुंचा था और यह तकनीक उसे कहां से और कैसे मिली।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम कब शुरू हुआ
ईरान का परमाणु कार्यक्रम कोई नई बात नहीं है। इसकी नींव 1950 के दशक में तब पड़ी जब ईरान में शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। उस दौर में अमेरिका ने खुद ईरान को परमाणु तकनीक देने में मदद की थी। यह उस जमाने की बात है जब ईरान अमेरिका का करीबी सहयोगी था और दोनों देशों के बीच गहरे संबंध थे। अमेरिका के Atoms for Peace कार्यक्रम के तहत 1967 में ईरान को एक छोटा रिसर्च रिएक्टर दिया गया था। इसी के साथ ईरान के परमाणु सफर की शुरुआत हुई।
1979 की क्रांति ने बदल दी दिशा
1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति आई और शाह की सरकार गिर गई। आयतुल्लाह खोमेनी के नेतृत्व में नई सरकार बनी और अमेरिका के साथ रिश्ते एकदम पलट गए। शुरुआत में नई इस्लामी सरकार ने परमाणु कार्यक्रम को रोक दिया क्योंकि उनका मानना था कि यह पश्चिमी साम्राज्यवाद का हिस्सा है। लेकिन 1980 में इराक ने ईरान पर हमला कर दिया और आठ साल तक भीषण युद्ध चला। इस युद्ध में इराक ने रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया जिससे हजारों ईरानी मारे गए। इसी दौर में ईरानी नेतृत्व को यह एहसास हुआ कि देश की सुरक्षा के लिए शक्तिशाली हथियार जरूरी हैं।
पाकिस्तान के AQ खान से मिली असली मदद
ईरान के परमाणु कार्यक्रम में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान उर्फ AQ खान का नाम सामने आया। AQ खान को पाकिस्तान का परमाणु बम बनाने वाला व्यक्ति माना जाता है। इन्होंने 1970 के दशक में नीदरलैंड में काम करते हुए यूरेनियम संवर्धन यानी Uranium Enrichment की तकनीक चुरा ली थी। बाद में AQ खान ने एक गुप्त नेटवर्क बनाया जिसके जरिए उन्होंने ईरान, उत्तर कोरिया और लीबिया को परमाणु तकनीक और उपकरण बेचे। 1980 के दशक में ईरान को यूरेनियम संवर्धन से जुड़े सेंट्रीफ्यूज डिजाइन और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां AQ खान नेटवर्क के जरिए मिलीं। यह वही तकनीक थी जो किसी भी देश को परमाणु बम बनाने के करीब ले जा सकती है।
रूस और चीन की भी रही है भूमिका
AQ खान के अलावा रूस और चीन ने भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम में अलग-अलग तरीकों से योगदान दिया। रूस ने 1990 के दशक में ईरान के बुशहर में एक परमाणु बिजली संयंत्र बनाने में मदद की जो बाद में 2011 में चालू हुआ। हालांकि रूस ने हमेशा कहा कि यह केवल नागरिक परमाणु सहयोग है और इसका हथियार कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं। चीन ने भी 1980 और 1990 के दशक में ईरान को कुछ परमाणु तकनीक और उपकरण देने में मदद की हालांकि बाद में अंतरराष्ट्रीय दबाव में उसने यह सहयोग कम कर लिया।
ईरान का यूरेनियम संवर्धन कहां तक पहुंचा
परमाणु बम बनाने के लिए यूरेनियम को 90 प्रतिशत से अधिक शुद्धता तक संवर्धित करना होता है जिसे Weapons-Grade Uranium कहते हैं। परमाणु बिजली के लिए केवल 3 से 5 प्रतिशत संवर्धन काफी होता है। 2015 में हुए परमाणु समझौते यानी JCPOA से पहले ईरान ने अपना यूरेनियम 20 प्रतिशत तक संवर्धित कर लिया था। 2018 में ट्रंप ने इस समझौते को तोड़ा और दोबारा कड़े प्रतिबंध लगाए। इसके बाद ईरान ने अपना संवर्धन कार्यक्रम तेज कर दिया। 2023 तक ईरान ने यूरेनियम को 60 प्रतिशत तक संवर्धित कर लिया था और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी IAEA ने चेतावनी दी थी कि ईरान 90 प्रतिशत संवर्धन से केवल कुछ ही कदम दूर है।
क्या ईरान के पास परमाणु बम है?

यह सबसे बड़ा और सबसे विवादित सवाल है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और IAEA के अनुसार ईरान ने परमाणु हथियार नहीं बनाया है लेकिन वह उसे बनाने की क्षमता के बहुत करीब पहुंच चुका था। विशेषज्ञों का मानना था कि अगर ईरान चाहता तो वह 2024-25 तक परमाणु बम बनाने की स्थिति में आ सकता था। ट्रंप ने खुद माना कि 2018 में समझौता तोड़ने से ईरान की परमाणु क्षमता रुकी। अब हमलों के बाद यह स्थिति और जटिल हो गई है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि ईरान के फोर्दो और नतांज स्थित परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया है।
ईरान के प्रमुख परमाणु ठिकाने कहां हैं?
ईरान के परमाणु कार्यक्रम के कई अहम केंद्र हैं। नतांज में देश का सबसे बड़ा यूरेनियम संवर्धन संयंत्र है जहां हजारों सेंट्रीफ्यूज काम करते हैं। फोर्दो एक भूमिगत परमाणु संयंत्र है जिसे पहाड़ के अंदर बनाया गया है ताकि हवाई हमलों से बचाया जा सके। बुशहर में रूस की मदद से बनाया गया परमाणु बिजली संयंत्र है। इसके अलावा अराक में एक भारी जल रिएक्टर था जिसे 2015 के समझौते के तहत निष्क्रिय कर दिया गया था।
Iran Nuclear Weapons: अब आगे क्या होगा?
अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वास्तविक स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ईरान के परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचा है और अगर पहुंचा है तो कितना। साथ ही यह भी देखना होगा कि ईरान का नया नेतृत्व आगे किस दिशा में जाता है। परमाणु विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही हमलों से ईरान का परमाणु कार्यक्रम कुछ पीछे धकेला गया हो लेकिन जो तकनीकी जानकारी और मानव संसाधन ईरान के पास है उसे नष्ट करना लगभग असंभव है।
बस इतनी सी बात है कि परमाणु तकनीक एक बार जब किसी देश के पास आ जाती है तो वह उससे छुटकारा नहीं पाती। ईरान का परमाणु सवाल इतना आसान नहीं है जितना दिखता है और यह आने वाले दशकों तक दुनिया की राजनीति को प्रभावित करता रहेगा।
Read More Here


