Jharkhand Politics: झारखंड निकाय चुनाव के परिणाम आने के बाद प्रदेश भाजपा गहरे असमंजस में है। एक तरफ पार्टी समर्थित प्रत्याशियों की जीत का जश्न मनाया जा रहा है तो दूसरी तरफ उन बागी प्रत्याशियों को भी बधाई दी जा रही है जिन्हें पार्टी ने चुनाव से पहले अनुशासनहीनता का नोटिस भेजा था। पाकुड़ नगर परिषद से जीतीं सबरी पाल और जामताड़ा नगर पंचायत से अध्यक्ष बनीं आशा गुप्ता दोनों को नोटिस मिला था और दोनों जीत गईं। अब भाजपा के वरिष्ठ नेता उन्हें बधाई दे रहे हैं। यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि भाजपा अपने जीते हुए कार्यकर्ताओं को खोना नहीं चाहती और अब बीच का रास्ता निकालकर उन्हें अपने साथ बनाए रखने की कोशिश करेगी।
बागी जीते तो पलटी मारी भाजपा ने
झारखंड निकाय चुनाव में भाजपा का एक बड़ा आंतरिक संकट सामने आया। पार्टी ने चुनाव से पहले कई ऐसे प्रत्याशियों को अनुशासनहीनता का नोटिस भेजा था जो पार्टी का समर्थन नहीं मिलने के बाद भी चुनाव मैदान में डटे रहे। लेकिन जब चुनाव परिणाम आए और इनमें से कई बागी जीत गए तो भाजपा का रुख एकदम बदल गया।
पाकुड़ नगर परिषद से सबरी पाल ने 2,353 वोट के अंतर से जीत दर्ज की। इन्हें पार्टी ने सप्ताह भर पहले अनुशासनहीनता का नोटिस दिया था। लेकिन जीत के बाद प्रदेश भाजपा के नेताओं ने उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दीं। इसी तरह जामताड़ा नगर पंचायत की नई अध्यक्ष आशा गुप्ता भी अनुशासनहीनता का नोटिस पाने वालों में थीं। उन्होंने 974 वोट के अंतर से जीत हासिल की और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें भी बधाई दी।
प्रदेश अध्यक्ष का बयान, नोटिस का मामला टाला

जब इस मामले पर सवाल उठे तो प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि नोटिस का जवाब आने पर आगे की कार्रवाई होगी। यह बयान साफ तौर पर बताता है कि भाजपा जीते हुए बागी प्रत्याशियों के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करना चाहती। पार्टी का असली इरादा अब इन जीते हुए नेताओं को दोबारा अपने साथ जोड़ना है ताकि निकाय स्तर पर पार्टी की पकड़ बनी रहे।
हजारीबाग से मेयर का चुनाव जीतने वाले गैर-दलीय प्रत्याशी को भी भाजपा नेता राष्ट्रवादी विचारधारा का बताने लगे हैं। यह पूरा घटनाक्रम भाजपा की उस रणनीति को दर्शाता है जिसमें जीत के बाद बागियों को नरमी से वापस लाने की कोशिश होती है।
रांची और पलामू की जीत ने बचाई इज्जत
इस चुनाव में भाजपा को मजबूत माना जा रहा था लेकिन धनबाद, मानगो, देवघर और गिरिडीह जैसे प्रमुख शहरी क्षेत्रों में पार्टी समर्थित प्रत्याशियों की हार ने पार्टी को बड़ा झटका दिया। ऐसे में रांची नगर निगम में रोशनी खलखो की 14,363 वोट से हुई जीत और पलामू यानी मेदिनीनगर में अरुणा शंकर की 3,122 वोट से जीत ने पार्टी को थोड़ी राहत दी और उसकी लाज बचाई।
कोल्हान क्षेत्र में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और रघुवर दास जैसे बड़े नेताओं की सक्रियता के बावजूद पार्टी केवल आदित्यपुर नगर निगम से ही जीत हासिल कर सकी। यह पार्टी के लिए एक बड़ा संदेश है कि बड़े नेताओं की मौजूदगी मात्र से चुनावी जीत सुनिश्चित नहीं होती।
प्रत्याशी चयन की गलती पड़ी भारी
देवघर और गिरिडीह दोनों ऐसी सीटें थीं जहां भाजपा को जीत की पूरी उम्मीद थी। लेकिन कमजोर प्रत्याशी चयन ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
देवघर में भाजपा ने रीता चौरसिया को मेयर पद के लिए समर्थन दिया जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे नागेंद्र बलियासे लंबे समय से इस चुनाव की तैयारी कर रहे थे और उनकी जमीनी पकड़ भी मजबूत थी। देवघर में झामुमो के रवि राउत ने 5,148 वोट से जीत दर्ज की। चुनाव परिणाम में रीता चौरसिया और नागेंद्र बलियासे को मिले मतों में ज्यादा अंतर नहीं था, जो यह बताता है कि अगर एकजुटता होती तो परिणाम अलग हो सकता था।
गिरिडीह में भी मेयर प्रत्याशी चयन को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी थी। इसी आंतरिक कलह का फायदा झामुमो की प्रमिला मेहरा ने उठाया और 14,599 वोट के बड़े अंतर से जीत हासिल की। गिरिडीह जैसी अहम सीट गंवाना भाजपा के लिए सबसे बड़ा झटका रहा।
धनबाद में बागी को मिली सहानुभूति
झरिया से भाजपा विधायक रागिनी सिंह के पति संजीव सिंह ने धनबाद नगर निगम से चुनाव लड़ा। पार्टी ने उन पर चुनाव लड़ने के कारण नोटिस भेजा था। लेकिन अब पार्टी नेता उन्हें अपना बताने लगे हैं। यह प्रकरण दर्शाता है कि जब बागी एक प्रभावशाली नेता के परिजन हों तो पार्टी की कार्रवाई कितनी नरम पड़ जाती है।
अनुभवहीन नेताओं को मिली जिम्मेदारी बनी हार का कारण
प्रदेश भाजपा के आंतरिक मूल्यांकन में यह बात सामने आई है कि प्रदेश अध्यक्ष ने कई ऐसे नेताओं को चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी जिनके पास पर्याप्त अनुभव नहीं था। इससे जमीनी स्तर पर पार्टी की तैयारी कमजोर रही और प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशियों ने इसका भरपूर फायदा उठाया।
Jharkhand Politics: भाजपा के सामने क्या है चुनौती?
इस चुनाव परिणाम के बाद भाजपा के सामने कई चुनौतियां हैं। पहली चुनौती यह है कि बागी होकर जीते प्रत्याशियों को कैसे वापस मुख्यधारा में लाया जाए। दूसरी चुनौती यह है कि आंतरिक कलह को दूर करके पार्टी में एकजुटता कैसे लाई जाए। तीसरी और सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शहरी मतदाताओं में पार्टी की घटती पकड़ को कैसे दोबारा मजबूत किया जाए। 2018 की 21 सीटों से घटकर 12 पर आना भाजपा के लिए एक गंभीर चेतावनी है जिस पर पार्टी को गंभीरता से विचार करना होगा।
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